कम अश्लील पन्ना

लड़कियाँ उस माल की तरह होती हैं, जिन्हें कभी लड़कों के द्वारा भोगा जाना है. यहाँ इस आपतिजनक शब्द की जगह कोई अधिक मानवीय, स्त्रैण शब्द का इस्तेमाल भी किया जा सकता है. पर उससे इसके अर्थ में किसी प्रकार की तबदीली आएगी, कह नहीं सकता. इस दुनिया में, और शर्तिया यह मेरी या मेरे आसपास की दुनिया ही है, जहाँ से यह सब मैं कह पा रहा हूँ और इस बात को रोज़ अपने सामने घटित होता देखता हूँ. वह अपने मन में कब इस बिंदु पर पहुँचकर थम गयी होगी, कि होंठों को किसी चीज़ से रंगने पर वह कुछ और सुन्दर ‘लगने लगेगी’? यह ‘लगने का भाव’ ही किसी ‘बाहरी’ दबाव को रेखांकित करता है. हम सारी जिंदगी इस ‘लगने’ में गुज़ार देने के लिए ख़ुद को उन खाँचों में बंद करते रहते हैं. हम लड़के भी कभी इस तरह ‘मैनेज’ कर दिए गए होंगे? उनमें कैसे हम यह झाँकते हुए देखते हैं कि हम उन्हीं होंठों की तरफ़ झुके जा रहे हैं? इसका एक सीधा सा अर्थ है, कोई बाहर से हमें हमारे मानक गढ़ने में मदद कर रहा है. जिसे मैं ‘मदद’ कह रहा हूँ, उसे योजनाबद्ध तरीके से किसी गुप्त योजना का हिस्सा भी कहा जा सकता हैं. नाम लेने की ज़रूरत नहीं हैं. मैं अपने बगल में खड़ी लड़की के स्तनों को देख कर उसके भविष्य को नहीं बताने जा रहा, फ़िर क्यों उन कपड़ों के पीछे झाँक रहा हूँ, यह हम सबको मिलकर सोचना होगा. 

ऐसा नहीं होगा कि कभी कोई लड़की भी इसी तरह कुछ लिख दे और तुम मुझे उस हवाले से कह दो कि देखो, दूसरी तरफ़ भी यह विचार समानुपातिक रूप से तैरता पाया गया है. इसलिए हम जो कर रहे थे या अभी भी कर रहे हैं, वह एक तार्किक परिणिति की तरफ़ बढ़ते क़दमों को वैध बनता है. मैं कह रहा हूँ, थोड़ा रुककर देखते हैं. यह कहीं सत्ता के ख़िसक जाने का डर तो नहीं है कि दूसरी तरफ़ भी इस विचार की व्याप्ति अपने अस्तित्व को बचाए रखने के मातहत ज़रूरी हो गया कदम भर है? कुछ भी हो सकता है, जैसे किसी भी तरह हम इतिहास को पीछे मोड़ते हुए मोबाइल स्क्रीन पर आते मैसेज को पढ़ने में तब्दील कर लेते हैं. वहाँ लिखा है, आज से अच्छे तो हम पहले थे, गुफाओं में रहना होता था, जहाँ सम्भोग और बच्चे पैदा करने के अलावे कोई काम नहीं था. हम इस तरह भी ‘डिजिटल’ हुए जा रहे हैं कि कोई हमें बर्बर होता देख ही नहीं पा रहा. शायद कोई देखना ही नहीं चाहता होगा.

{इसी साल कभी लिखा था, एक पन्ना अश्लील. तब भी कहने की हिम्मत नहीं थी, यहाँ किसी की.}

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