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शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

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किताब का कवर  जो सब लोग मेरे लिखे हुए को एक जिल्द में पढ़ने की इच्छा से बहुत समय से भरे हुए थे, भले उनकी संख्या उंगली पर गिने जाने लायक हो, यह किताब की शक्ल में अब सबके सामने है । इस जटिल वाक्य की संरचना की तरह हमारे आस-पास की दुनिया भी है । मैं उसे यहाँ दोहराना नहीं चाहता । चाहता तो था, यह किताब कागज़ पर छप कर आती । खैर, उस तफसरे में भी जाने का अब मन नहीं है । इस किताब को डायरी में लिखे हुए ‘आत्मपरक गद्य’ की तरह माना जा सकता है । ‘पर्सनल ऐसे’ होते हैं जैसे । इसमें कुछ इस शहर की बातें हैं । कुछ इस दुनिया के किस्से हैं । छोटे-छोटे अंशों में स्मृतियाँ हैं, उनकी कोमलता में थोड़ी नमी भी है । कुछ उन सपनों के टूट जाने और बिखर जाने की टीस भी रही होगी । जो वहाँ लिखते हुए मेरे शब्दों और वाक्यों में उतर आए हैं । आप इसे इस समय पर एक बयान भी मान सकते हैं । जहाँ कोई मुझे देख नहीं रहा था, अपने समय और काल पर नियमित अंतरालों में कुछ-कुछ दर्ज करता हुआ चलता रहा । हो सकता है, भाषा कहीं-कहीं वास्तविकताओं की तरह जटिल हो गयी हो । इसे मेरे दोष की तरह नहीं देखा जाना चाहिए । इसी छोटी-सी भूमिका के साथ अपने

हिंदी छापेखाने की दुनिया

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इन दिनों कई सवाल मेरे मन में अचानक घर नहीं कर गए हैं, बस वह थोड़ा अधिक तीव्रता से दिमाग में चल रहे हैं । बस अगले कुछ मिनट इन्हीं सवालों से दो-चार होता हुआ कुछ बातें याद करते हुए लिख रहा हूँ । कोई उन्हें अन्यथा लेना चाहे, वह उन्हें वैसा लेने के लिए स्वतंत्र है । बात तब की है, जब हम दिल्ली विश्वविद्यालय से लगभग चौदह पंद्रह साल पहले एमए (हिन्दी) करने आए, तब जैसा कि होना चाहिए, उसका कोई निर्धारित पाठ्यक्रम था । उसमें निर्धारित पुस्तकों को किन्हीं लेखकों ने लिखा था और वह किसी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित थी । यह पाठ्यक्रम उन किताबों तक पहुँचने का पहला जरिया बना । वहीं अगर यह पाठ्यक्रम न होते तो कितने प्रकाशन गृहों का क्या होता, कुछ समझ नहीं आता । उनकी आमदनी का बहुत बड़ा जरिया यह बीए, एमए में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थी हैं, जो अंततः ग्राहक या उपभोक्ता बन कर रह जाते हैं । प्रकाशक सीधे ‘ग्राहक’ कहेगा, थोड़ा अच्छा नहीं लगता, इसलिए उसे ‘पाठक’ संज्ञा दे दी जाती है । वही उसका एकमात्र ‘विशेषण’ बनकर रह जाता है । अब आप इस प्रक्रिया के दूसरी तरफ़ चलकर देखते हैं । जिसमें छोटे-छोटे दो तीन प्रश्न हैं । पहला

बेतरतीब

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किसी भी तरह तो इस वक़्त को कह नहीं पा रह हूँ । अंदर ही अंदर कितना कुछ बीतते हुए यह महसूस न होना कि भाषा भी साथ नहीं देती । लगातार कोशिशों से उसे इस लायक बनाया जा सकता था । एक अभ्यास जो हरदम किए जाने की माँग करता है, उसमें पीछे छूट जाने या किसी से आगे निकल जाने का कोई सवाल नहीं है । बात सिर्फ इतनी सी है, जहाँ से हम चीजों को देख सकते हैं, वह क्यों देख कर वैसी नहीं कही गई ? यह कभी-कभी तो मुझे ऐसा समय लगता है, जहाँ जो जैसा है, उसे वैसा कह पाना भी बहुत मुश्किल है । यह जो 'अभिधा' में न कह पाना है या ऐसे दबाव से घिर जाना है, जो प्रकट रूप से दिख भी रहा है और कुछ कह न पाने की कमजोरी में उसे छिपा ले जाने की चालाकी भर बनकर रह जाता है । इसे चालाकी के अलावे क्या कह सकते हैं? यह जो न लिख पाना है, इसे भी दर्ज किया जाना चाहिए । दर्ज इसलिए के जब यह साल बीत जाएँगे, तब हमारे पास एक याद की तरह कुछ सबूत होंगे । एक दिन, एक शाम, एक पल ऐसा भी था, जब हम भीतर-ही-भीतर कुढ़ रहे थे । जो कहना था, उसे न कहकर बहुत कुछ ऐसी भूमिका को बनाने में खर्च कर चुके थे, जिसकी कोई ज़रूरत भी नहीं थी । इसे किस तरह तो

आबू रोड, 2007

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बहुत पुरानी बात है । हम आबू रोड रेलवे स्टेशन पर गरीब नवाज़ एक्सप्रेस का इंतज़ार कर रहे हैं । रात बारह बजे के लगभग रेलगाड़ी को आना है । हम तीन लोग लगभग सात बजे से ही प्लेटफॉर्म पर तैनात हैं । हमारी टिकट कनफर्म नहीं है । न स्लीपर है न वेटिंग । हम सोच रहे हैं आबू घूम लिए अब यहाँ से आगे चले जाएँगे । बताने वाले बताते रह गए । हम अंबाजी नहीं गए । हम अजमेर जा रहे हैं या वहाँ से होकर आए हैं, यह याद नहीं कर पा रहा हूँ । हम हिमेश रेशमिया की एक खराब फ़िल्म अजमेर में देख चुके हैं या वहाँ पहुँचकर देखने वाले हैं, यह भी अब भूल चुका हूँ । बस यह याद है, इस सबमें हमारा ‘अढ़ाई दिन का झोपड़ा’ रह गया है । फिर इधर जहाँ अभी हम हैं, वह प्लेटफॉर्म नंबर एक है । प्लेटफॉर्म जहाँ ख़त्म हो रहा है, उस तरफ़ एक वेटिंग रूम है । उसमें एक परिवार है । पति पत्नी और उनके दो बच्चे । एक लड़का, एक लड़की । उन दिनों ट्रकों और टेम्पो के पीछे लिखे हुए वाक्य की तरह दिखाई देने वाला यह आदर्श परिवार कितने गर्भपात के बाद संभव हो पाया, यह आज तक एक प्रश्न की तरह बना हुआ है । बहरहाल । वह लड़का जो अपनी बहन से छोटा है, कान में हेडफ़ोन लगाए, पैरों से

बाबा

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तीन दिन तक डायरी में पैन ऐसे ही पड़ा रहा । कुछ लिखते न बना । लिख जाने से भी वह दुख कम हो जाता, ऐसा कह नहीं सकता । यह तब से रिस रहा है । इतवार की सुबह थी । साल का पहला इतवार । पाँच जनवरी । ठीक से साढ़े नौ भी नहीं बजे थे । फोन बजा । बाबा नहीं रहे । इस वाक्य को सुन लेने के बाद कुछ नहीं सूझा । दिमाग शून्य या मृत्युबोध से भर गया हो ऐसा भी नहीं है । हमारे बाबा अब इस दुनिया में नहीं हैं । इसके बाद कुछ चल ही नहीं पाया । अतीत की जैसी भी स्मृतियाँ हमारे पास हों वह इतनी घुली मिली होती हैं, उसमें से किसी पात्र के लिए आप कुछ अलगा पाएँ, ऐसा तुरंत हो पाना तो बिलकुल भी संभव नहीं है । अभी भी ऐसा कुछ कर जाऊंगा, लगता नहीं है । बाबा के साथ के सभी लोग, जैसा सब कह रहे हैं, उनसे छोटे उनसे बड़े, यहाँ तक आते-आते (कबके) उनसे छूट गए इसका कोई ब्यौरा मेरे पास नहीं है । वही बता रहे हैं, कोई नहीं बचा । सब एक-एक करके चले गए । आगरा होते हुए हम पहले लखनऊ पहुंचे । फिर लखनऊ से बहराइच । अभी सुबह हुई नहीं है । साढ़े तीन बज रहे हैं । सब एक तसले में लकड़ी जलाए उसे घेर कर बैठे हुए हैं । सब मतलब दो बड़े भाई । उनके पिता । हमारे ताऊ

हिंदी ब्लॉग की बात

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क्या यह वह दौर नहीं है, जब हम विधा के संकट से जूझ रहे हैं? हिंदी की सतह पर किसी को भी ऐसा कुछ भी होता नज़र नहीं आ रहा होगा. ‘हिंदी की सतह’ माने ‘भाषा का साहित्य’ किसी उधेड़बुन में स्वयं को व्यस्त नहीं कर पा रहा होगा. क्या जितनी भी विधाओं का आविष्कार होना था, वह या तो हिंदी साहित्य का हिस्सा बन चुकी हैं या फ़िर हम उन्हीं खांचों में अपने लिखे हुए को ‘फिट’ करने की गरज से भर गए हैं? जिन्हें आलोचक और समीक्षक कहा जाता है, वह शायद भाषा में हो रहे इन परिवर्तनों को लेकर इतने उदासीन हो चुके हैं कि उनकी नज़र इधर पड़ ही नहीं रही. साल दो हज़ार चार रहा होगा. हिंदी का पहला ब्लॉग कहीं किसी ने बनाया होगा. नाम रखा, ‘नौ दो ग्यारह’. चूँकि ‘ब्लॉग’ थोड़ा तकनीकी और अपरचित सा पद है इसलिए यह बताते चलें कि यह अंग्रेज़ी भाषा के ‘वेब लॉग’ का संक्षिप्त रुप है. तथा इसका सरल सा अर्थ है, एक ऐसी वेबसाइट, जिसे आप ब्लॉगर या वर्डप्रेस के डोमेन (वेब पते) पर अपने मेल अकाउंट की सहायता से कुछ ही मिनटों में बना सकते हैं. साहित्य के समाजशास्त्र में इस घटना को कैसे देखा जायेगा, यह बहुत मुश्किल काम नहीं है. इसे ‘लेखन का लोकतांत

जगह

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क्या किसी भी जगह को हम खाली स्थान की तरह चिन्हित कर सकते हैं ? यदि हाँ तो कब और अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो कब हम ऐसा करने की हैसियत में नहीं होते ? यह सवाल बहुत बड़े हलके में बहस का हिस्सा बना हुआ है । कब, कौन, कहाँ से चलकर किधर आ गया, यह अन्वेषण से अधिक संदेह का विषय बन गया है । यह उस समाजशास्त्रीय प्रश्न की उत्पत्ति भी करता है जिसमें हम किसी स्थान, भाव, स्वाद आदि से निकटता या दूरी बनाना चाहते हैं । यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । लेकिन सिर्फ़ व्यक्ति के स्तर पर । एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति में कुछ ऐसे बिन्दुओं को जान लेना चाहता है, जिससे वह यह तय कर पाये कि भविष्य में उनके संबंध कैसे रह पाएंगे । यहाँ सवाल यह भी उठता है, इसमें किस प्रकार वह संचालित होता है, यह देखने लायक बात होगी । जैसे ही कोई निश्चित भूगोल को अपने लिए एक सीमा मान कर ख़ुद को एक शासन के अधीन लाता है, वह किसी राज्य की उत्पत्ति या उसके जन्म का बिन्दु हो जाता है । जितनी सरलता से एक पंक्ति पहले राज्य नहीं था और एक ही पंक्ति में कुछ ऐसा घटित हुआ कि भूगोल, सीमांकन, राज्य और शासन प्रणाली का उदय होता हुआ दिखने लगा, वास्तविकता

अधूरी बातें..

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खाली पन्ने : लिखने से पहले खाली पन्ने को देखा है ? सादा । जिसपर कुछ भी न लिखा हो । बिलकुल कोरा । मेरे दिमाग में यह सवाल नहीं आता, अगर इतनी देर तक यहाँ आँख गड़ाकर न देख रहा होता । इस बहुत देर तक देखने के बाद भी कुछ खास दिख नहीं रहा । वह सफ़ेद का सफ़ेद दिखता रहा । पिछले दस सालों का लेखा-जोखा मेरे सामने मेज़ पर पड़ा हुआ है । कुल पंद्रह जिल्द हैं । इसमें कुछ ऐसा वक़्त भी गुज़रा, जिसमें तीन-तीन महीनों में दो सौ पन्नों को भर दिया करता । वह भी क्या गति थी । एकदम करिने से लिखते हुए आप बहुत दूर तक चले आते हैं । एक ऐसे बिन्दु के पास जब आप उन लिखे हुए पन्नों की तरफ़ देखते भी नहीं हैं । ऐसा मेरे साथ क्यों हुआ ? क्या यह असमान्य सी घटना है या इसमें उस अतीत से भागते रहने और कभी पिछले दिनों पर कभी न लौटने की कोई इच्छा ? अभी कुछ भी दावे के सार्थ नहीं कह सकता । बुदबुदाहट : आज तारीख है, इकतीस जुलाई । साल दो हज़ार उन्नीस । दोपहर दो बजकर इक्यावन मिनट । डेरावाल नगर । बहुत सालों बाद आज वर्ड पर टाइप कर रहा हूँ । मुझे लगता है इसे भी लिख कर रख लेना चाहिए । एक पायरेटिड वर्ड फ़ाइल को ढाई सौ रुपये में इनस्टाल करव

जैसा हमने चाहा

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कुछ भी तो वैसा नहीं है, जैसा हमने चाहा । यह रंगों वाली बेरंग दुनिया । रूप, गंध, स्वाद कुछ भी नहीं । लगता रहा है, जिनके पास उसकी मर्जी नहीं है, उनके लिए यह दुनिया जीने लायक नहीं है । हम बस एक दिन से अगले दिन और अगले से फिर आने वाले दिन के इंतज़ार में घुट रहे हैं । जो जैसा होना था, उसमें रद्दोबदल की ताकत जितनी लग सकती थी, वह भी नहीं लग पा रही । ताकत जैसे कहीं है ही नहीं । वह जितनी तेज़ी से अपनी शक्ल बदलने में माहिर है । हम उस अनुपात में बहुत मंथर गति से चल रहे हैं । सब ताकत वाले उसे तय कर रहे हैं । ताकत ‘पूंजी’ से है लेकिन उसके पीछे एक पूरा तंत्र है । हम बेबस हैं । इतने बेबस कि उसके समांतर कुछ भी खड़ा करने के लिए लगभग वही अवयव चाहिए । पूंजी । यहीं हमारी भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है । यहाँ हमें सपने चाहिए । कुछ पढ़ी हुई किताबें । कुछ पहले के समय में आजमाए हुए नुस्खे । वह लोग जो खुद को बचा सके । उनके लिखे हुए कागज । यही तय करेगा, हम कितनी लंबी लड़ाई करने के लिए खुद को तय्यार कर रहे हैं । जो दोहराया हुआ है, उसे उसी तरह दोहराया नहीं जा सकता । उससे हम कुछ अंदाज़ा लगा पाएंगे । वह जिससे हमारी मुठ

वापसी

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यह जो शीर्षक है, इसे इसी तरह क्यों लिख रहा हूँ । यह कहाँ से लौटना है? मैं कहाँ आ गया हूँ? क्या आना नहीं था ? क्या इसे पड़ाव भी नहीं माना जा सकता ? पड़ाव किसी आगे आने वाले कल की तयारी में हो तो सबकी आँखें चुभने लगेंगी । वह घूरते हुए आगे बढ़ जाने जैसा होगा । ऐसा नहीं है, जिस जगह हूँ जहाँ से मुझे वापस चल पड़ना है । यह सतह पर मेरी शिथिलता को दिखाता है । जैसा अनमने होकर कुछ भी न कहने का मन न करता हो । यह छूट जाना है । जो सिलसिला कभी अंदर लगातार चलता रहता था, उसे क्यों रुक जाना पड़ा । यह अब पूछे जाने लायक नहीं रह गया है । मुझे लगता नहीं था, मेरे न कहने से इतनी सारी चीज़ें खुद मुझसे मेरी पकड़ से छूटती गईं । नज़र का चुक जाना इसी को कहते हैं । यह मेरा खुद को किसी दूसरी दिशा में चले जाना है । यह ऐसा समय है, जब कोई नहीं चाहता, आप लिखें । कुछ भी सोचें । कारखानों में इतिहास और भविष्य का नक़्शा बनाया जा रहा है । सब वहीं से नियंत्रित है । समझने के लिए जो रिक्त स्थान हो सकते थे, उन्हें भरा जा चुका है । जब सारी जगहों पर पहले से ज्ञान की प्रक्रिया सम्पन्न हो चुकी है, वहाँ किसी विवेक की क्या ज़रूरत ? नशाखोरों की क

लिखने और न लिखने के बीच की खाली जगह

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कोई चार-पाँच महीने बाद कुछ तरतीब से लिखने बैठा हूँ । जिसे तरतीब कह रहा हूँ उसका कोई सिरा अभी खुल नहीं रहा है । नए कैलेंडर में तीसरा दिन है, मन में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं दिख रहा । वही ढर्रा । बिलकुल उसी तरह से लिखने के लिए बैठ जाने जैसा । जैसे कोई क्रम कभी टूटा ही न हो और मेरे अंदर कितनी ही बातें बाहर आने के लिए आतुर खड़ी हों । इन बीत गए दिनों का आग्रह कुछ इस तरह हर पल मुझे घेरे रहता है, जैसे उन्हें कहें बिना वह मुझे छोड़ना ही न चाहते हों । हर दिन कुछ ऐसा जो लिख लिया जाना था, जिसे कहे बिना सोने के लिए लेटना नहीं था । फिर भी कुछ कहा नहीं । कुछ भी नहीं कहा ऐसा नहीं है । कागज पर थोड़ा बहुत लिखता रहा हूँ । पर उसे आज से बहुत दिन बाद के लिए अपने पास रख लेने की आदत में कभी किसी से कहता नहीं । कुछ कह देना कभी ज़रूरी भी नहीं लगता । क्या यह ज़रूरी है, हम बीत जाने के बाद ही ऐसे किसी दिन अचानक पीछे मुड़े और पीछे देखते हुए जो बीत गया वह साफ़ साफ़ दिख जाये ? मुझे यही काम सबसे मुश्किल लगता है । कौन से एहसास मुझे बना रहे थे और जो यह साल अब किसी तारीख़ में ख़ुद को समेटे रहेगा, उसमें मैं कितना रह गया

हंस में आना

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यह बात लगभग दो हज़ार छह-सात के आस पास की रही होगी, जब हमने ‘हंस’ को शिवाजी स्टेडियम पर अखबारों के साथ पत्रिकाओं के बीच देखा। प्रेमचंद ने इस नाम से पत्रिका निकालना शुरू किया था, यह पता था, लेकिन यह नहीं पता था, सन् 86 से राजेन्द्र यादव इस पत्रिका का पुनर्प्रकाशन और सम्पादन कर रहे हैं। तब हम लोग ग्रेजुएशन के आखिरी साल में थे। यह तय नहीं था, आगे क्या करेंगे। बस दो साल के लिए एम ए हिंदी में चले आये। तब लगता, पढ़ेंगे नहीं तो लिख कैसे पाएंगे। क्या लिखेंगे, कैसे लिखेंगे कुछ नहीं पता था। बस एक ही ख़याल था, लिखेंगे।  वह कुछ वक्त भी ऐसा था, जब मन किये रहता, लिखो और उसे कहीं छपने के लिए भेज दो। शायद अपने लिखे हुए को सबके साथ बाँटने की इच्छा तब बहुत रही होगी। फिर जैसा होता है, जो पढ़ता, जिस विधा में पढ़ता वैसा ही लिखने के लिए सोच कर कुछ दिन लगा देता। एक डायरी में कविताओं के ख़ाके बनाये, आज वह पता नहीं कहाँ होगी। वह कहीं खो गयी । उसे कभी ढूँढने की कोशिश नहीं की। एक कहानी लिखकर किसी पत्रिका के द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में भेजी। वहां से जवाबी खत में सदस्यता लेने को कहा गया। कहानी वहीं छूट गयी। फ

आठवीं सालगिरह

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पता नहीं क्यों आज लिखने का मन हो गया । जब से यहाँ आया हूँ, यहाँ ढलने और इस वक़्त को पकड़ने में बहुत सा वक़्त खर्च होने के बाद भी ज़्यादा कुछ समझ आया हो, कह नहीं सकता । यह दो दिन, एक पिछला और एक आज का, दोनों दिन मेरे अंदर इसी तरह उतरते से लगते हैं । मेरी पहली जगह, जहाँ सबके सामने कहने का सहूर सीख रहा था, अगर वहाँ लगातार कहता रहता तो आज आठ साल पूरे हो जाते और नवें साल में प्रवेश कर जाता । कितना तो कभी कह ही नहीं पाया । कहा भी क्या, ख़ुद को आईने के सामने रखकर कहने और ख़ुद को संभालने में ही सारे शब्द खर्च हो गए ।  आज सोचता हूँ, वह ताप कहाँ चला गया ? उसकी तासीर में कुछ ऐसा था, जिसमें कहने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं था । नाम भी क्या ख़ूब था उस जगह का । करनी चापरकरन । कुल पाँच साल (2010-2015) वहाँ लगाए और जैसे होता है, हम बिन बताए कहीं के लिए निकल पड़ते हैं, मैं भी उसे छोड़कर आगे बढ़ गया । आज मैं उन वजहों को बहुत पास से महसूस करता हूँ तो लगता है ठीक ही था वहाँ से चले आना । क्या करता वहाँ रुके रहकर । मेरे लिए यह भावुकता आत्म प्रगल्भता का दिन भी है । कहाँ से लाता था कहने का कच्चा माल ? क्या

शहर और दुनिया के बीच

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शहर / शहर को कोई लड़का कैसे देखेगा? कौन सी उसकी स्मृतियाँ बनेंगी जो उसे एक लड़के की तरह शहर को उसके सामने प्याज की तरह उसकी तहें खोलता जाएगा ? क्या वह हाथ में लाख की लाल चूड़ियाँ पहने लड़की की कमर होगी या उसके स्तनों की वक्रता ? या उसकी आँखें उस लड़के को देख रही होंगी, जो उस लड़की को उसकी कलाइयों, हथेलियों और जहाँ चाहे वहाँ से पकड़ लेने की उसकी इच्छा को टटोलता हुआ कुछ अपने दिनों की तरफ़ लौट रहा होगा? शहर जितना बड़ा होगा, बाजार उतना ही घर से दूर होगा और पहचाने जाने का कोई भय या डर नहीं होगा । इस बात के पहले सिर्फ़ छू लेने का ऐसा चित्र उसके सामने कब घटित हुआ होगा, वह याद नहीं कर पाएगा । क्या उसके माता पिता उसके सामने कभी ऐसे आए होंगे या भौजाई के साथ भाई को कभी इस तरह इच्छाओं में सार्वजनिक रूप से तैरते हुए देखा होगा ? जितना इन बातों को पढ़ लेना अश्लील लग रहा है, क्या कभी शहर में चहलकदमी करते हुए उन हाथों, होंठों, बालों को कभी इसी तरह देखते हुए तब आप कुछ फ़र्क करते हुए चलते हैं ? क्या आपने इस लड़के में अपनी छवियाँ नहीं देखिन ? भले यहाँ लड़का लिखा है, क्या यहाँ लड़की लिखा होता, तब कुछ और प्रस्थान ब

टूटने से पहले

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कभी-कभी तो मुझे लगता है, किसी को भी कुछ कहने की ज़रूरत ही क्यों आन पड़ी है ? क्या जो कहा जाना है, वह उनके भीतर खुद कभी नहीं उतरेगा ? उसे, उस कहने को किसी सहारे की क्या ज़रूरत ? क्या ऐसे आने में वह स्वाभाविकता थोड़ी स्थगित नहीं हो जाएगी ? तब अगले ही क्षण यह भी महसूस होने लगता है, कोई किसी को कितना भी कह ले, वह तभी लिख पाएगा, जब कोई बात उसके अंदर बेचैन होती हुई अपने आप उगने लगेगी । अभी अगर देखूँ, तब पिछली बातें चाहते न चाहते किसे लिखी गयी हैं, वह बहुत साफ़ तौर पर दिख रहा है । एक लड़का है, जो वह लिख सकता है, जैसा लिख पाने की इच्छा को उसमें देखता हूँ, उसके बाद भी वह कागज़ के बाहर कह पाने में एक अजीब तरह के दबाव को महसूस करता प्रतीत होता है । यह सामाजिक बंधन हैं या उन अकथित अनुभवों के बाहर आ जाने के बाद अपनी छवि के टूट जाने का डर, इसे वह मुझसे अधिक जानता होगा । यह उसे तय करना है, कब और कैसे उन अकथित ब्यौरों को सबके सामने आना चाहिए । मैं उन पंक्तियों के लिखते हुए भी बराबर यह बात महसूस कर रहा था, कि एक लड़का अगर इस तरह से अपने मन को नहीं बता पा रहा तब उस स्थिति में क्या होता, जब उसकी जगह को