संदेश

दोनों

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जबसे लौटा हूँ, तुम दोनों पर लिखना टाल रहा हूँ। पता नहीं ऐसा क्या कह देना चाहता हूँ, जो कहा नहीं जा रहा? कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी । बहुत सारी छोटी-छोटी बातें होंगी । वह उस गाँव की तरह ठहरी होंगी, जहाँ इन दिनों तुम रह रहे हो । उसे उदासी नहीं कहूँगा । वह उदासी के करीब तो है, पर उदास नहीं है । वह एकांत जैसा कुछ है । तुम जब बाहर होते हो, तब वह घर के अंदर ही नहीं अपने अंदर उन सवालों को ढूँढ रही होती हैं । मैं इन अंदर जाती साँसों को पहले इतना नहीं महसूस कर पाता । जब अकेला था, तब तो बिलकुल भी नहीं । जब हम दो हुए तब मुझे समझ आया, जितना हम दोनों बाहर दिखते हैं, उससे अनुपात में कई गुना अपने अंदर खुद को बुन रहे होते हैं । इसमें धागा न चिटक जाए, इसका ध्यान रखना होता है । बहरहाल ।

कोई एक-दूसरे में कितना डूब सकता है, यह पहली बार मैंने अपने इतनी पास देखा । इसे तुम्हारे शादी के साल तो बिलकुल भी महसूस नहीं कर सकता था । यह भी एक गुण है । धीरे-धीरे हमारे अंदर विकसित होता है । वक़्त लगता है । पर हो जाता है । मेरे मन में तो था, इस बार हमारी न हो पायी बातों पर लिखता । पर नहीं । जब तुम घर पर नहीं थे । हमने…

दिन तुम्हारा

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जन्मदिन किसी का भी हो, उसकी सबसे कोमलतम स्मृतियाँ माँ के पास होती हैं । वह जो हमें नौ महीने गर्भ में रखती है । एक-एक क्षण अंदर पल रहे बच्चे के गर्भ से बाहर आने का इंतज़ार कर रही होती है । इस प्रतीक्षा में गेहूँ की सुनहरी होती बालियों की दमक भी है और उसे छूने की लालसा भी । आज तुम कितने साल के हो गए कल पूछ नहीं पाया ? तुमने बस इतना कहा, कल गायब रहना चाहता हूँ । तभी आज कोई बात नहीं की है । बस हमने तुम्हारे गायब होने में मदद की है । तुम्हारी यह इच्छा पता नहीं मुझे कैसा कर गयी है ? अँधेरा शाम ढलने के बाद छत पर बिखर गया है । कोई दिख नहीं रहा है । मैं बस इस क्षण में तुम्हारे बनने के सालों को याद कर लेना चाहता होऊंगा । बहुत सारी बातें एक साथ ऊपर गले तक आकर बाहर आ जाना चाहती होंगी । पता नहीं यह कैसा भाव है ? इसमें भावुकता भी है या नहीं कह नहीं सकता?

तुमसे तुम्हारे घर के छोटे-छोटे किस्से सुनते रहना चाहता हूँ । ख़ुद उन मुलाक़ातों में चुप रहने की इच्छा को अभी पास नहीं धरा है पर तुमसे कुछ कहलवाने के लिए उन किस्सों की तरफ तुम्हें जाते हुए देखना अच्छा लगता है । कोई है, जिसमें भावुकता बची हुई है । तु…

हत्या

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मुझे एक हत्या पर क्या लिखना चाहिए ? यह हत्या जिनकी एवज़ में की जाती है, जिन्हें ढाल बनाकर किसी को मारा जाता है, वह इस पर क्या कहना चाहेंगे ? यह दो तरह की दुनिया का टकराना है या जिस खोल से हत्यारे निकल कर आए हैं, उसे दुनिया कहा जा सकता है ? वह जो डर गए हैं, उनका डर स्वाभाविक है । उन्हें पता है, कोई ऐसा प्रति विचार भी है, जो उनकी आस्था के समानान्तर चल रहा है और एक शाम ऐसी भी आ सकती है, जब उनकी यह दुनिया भरभरा का गिर भी सकती है । कहीं कोई बारिश नहीं होगी । कोई बिजली भी नहीं गिरेगी । बस दीमक लग चुकी हैं । वह नहीं चाहते कि कोई उस दुनिया पर अपने तफ़सरे कहे । उन पर की गयी व्यक्तिगत टिप्पणियाँ एक ख़तरा हैं । वह किसी संभावित भविष्य में ऐसा नहीं होने देना चाहते ।

मुझे लगता है, अगर वह किसी युक्ति से हमारे अतीत में पीछे जा सकते, तब यह उन सबकी हत्या की इच्छा से भर जाते, जो इनके मुताबिक ठीक नहीं होता । मुझे यह भी पता है, उनके पास पीछे जाने के कई तरीके हैं । तभी हमें इसी क्षण से आगामी अतीत में होने वाली संभावित हत्याओं का इतिहास लिखना शुरू कर देना चाहिए । वह किसी की भी हत्या कर सकते हैं । वह कर भी …

कागज पर लौटकर

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इन दिनों मैं डायरी पर वापस आया हूँ । अच्छा लग रहा है । कागज़ पर यहाँ लिखने जैसी तकनीकी सुलभता नहीं है, फिर वहाँ लिखना अपने आप में चुनौती भरा अनुभव है । आप तरतीब से नहीं लिखते । लिखते हुए बस लिख रहे होते हैं । पता नहीं आपने यह अनुभव किया है या नहीं पर मेरे साथ यही होता है । जब मैं लिख रहा होता हूँ तो वह शब्द अंदर दोहरा रहा होता हूँ । उसे चुपचाप बोल रहा होता हूँ । इन शब्दों को सुनने में जो धैर्य है, वह यहीं महसूस किया जा सकता है । डायरी पर एक छूट है । यहाँ भी एक छूट है । दोनों दो तरह की छूटें हैं । एक में मन को थोड़ा अवकाश मिलता है । यहाँ हमें स्याही न भरने की आज़ादी है । वहाँ और भी कई बन्दिशें हैं लेकिन खयाल को कहने में जितनी दूर धागे जा सकते हैं, वह जाते हैं । यहाँ भाषा में कृत्रिमता तो नहीं पर एक तरह की दूरी का खयाल रख़ता हूँ । जो कह रहा हूँ उसके क्या-क्या मायने जा सकते हैं ? जब तक मेरे मन में है, वह किसी भी तरह रहे पर जब उसे बाहर आना है, एक तरह की सतर्कता बगल में बैठ जाती है । इसे सचेत हो जाना नहीं कह सकता क्योंकि वह ऐसा भाव नहीं है । फ़िर पता नहीं जो मैं यह सब कह रहा हूँ, उसको सही स…

इधर

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अगर मैं चित्रकार होता, तब अभी तक चाँद को घेरे हुए बादलों को दर्ज़ कर चुका होता। वह छितरे हुए हैं मगर चाँद छिप सा गया है। आसमान में रौशनी छनछन कर इस तरफ़ आ रही है। यह फ्रेम मुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है। क्या मैं भी कभी किसी को इसी तरह नज़र आता होऊंगा? मुझसे रौशनी आर-पार नहीं हो सकती। पर कहने के लिए ऐसे ही कह जाता। सितंबर की इन गरम होती रातों में इस मौसम को हमें इसी तरह लिखे जाने की कोशिश करनी चाहिए। इन कोशिशों में जो ब्योरे इकट्ठा होंगे, उन सबको मैं कभी ऐसी ही किसी रात को पढ़ जाऊँगा। जब मुझे पता नहीं चलेगा, बाबा पिछले हफ़्ते किसी दिन पिछवाड़े जाते हुए गिर गए। जहाँ गिरे हैं, वहाँ से कोई नहीं बताता, कितनी चोट लगी है। इसी गिरने के बाद उनकी भूख शायद कहीं चली गयी है। तीन दिन तक वह खाना नहीं खाते हैं। यह बादलों के उन बिखरे टुकड़ों की तरह हैं। इनमें कोई क्रम नहीं है। बेज़ार होना इसी को कहा गया है। दिल में कई बातें एक साथ अखर रही हैं। उनका अखरना काँटों की तरह चुभ रहा है। कितनी बातों को यहाँ कहा जा सकता है, उससे ज़्यादा ज़रूरी सवाल है, कितनी बातों को यहाँ नहीं कहा जा सकता। कहने के लिए लबादों की ज़रूरत होगी…

दो अलग-अलग बातें

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1. कभी-कभी सोचता हूँ, मेट्रो में यह दृश्य न जाने मेरी अनुपस्थिति में कितनी बार घटित होता होगा। यह कोई आश्चर्यजनक दृश्य नहीं है। बस इसमें होता यह है कि एक बैठे हुए लड़के के पास पिछले स्टेशन पर चढ़े बुजुर्ग व्यक्ति आकर खड़े हो जाते हैं। अब लड़का क्या करे? वह पास में बैठी या पास में खड़ी लड़की की तरफ़ देखता है। उसे लगता है, वह पहले से ही उसे देख रही है। बेचारा बैठा हुआ लड़का पहले ज़मीन में नज़रें गढ़ाता है, फिर चुपचाप शालीनता को अपने चेहरे पर ओढ़ते हुए, मुस्कुराकर अपनी सीट उन उम्र दराज़ व्यक्ति के लिए 'अंकल आप बैठिए' कहकर छोड़ देता है। मुझे तो यहाँ तक लगता है, हमें किसी भी अधेड़, बूढ़े व्यक्ति के लिए अपनी सीट नहीं छोड़नी चाहिए।

कभी हम यह सोचते हैं, उन्होंने यह कैसा समाज बनाया है? क्या कभी इसकी इस जटिल संरचना पर कोई प्रहार भी किया है? अगर किया होता, तब यह दुनिया शायद रहने के लिए कुछ बेहतर जगह होती। यह वही अकड़ में डूबे हुए लोग हैं, जो आज के लड़के-लड़कियों द्वारा अर्जित स्वतंत्रताओं पर औपचारिक अनौपचारिक रूप से अनर्गल बातें किया करते हैं। ऐसे पुरुषों की वजह से ही हम पता नहीं कितनी अंतर्विरोधी ज़िंदगिय…

मोहन राकेश की डायरी

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कोई किसी किताब का कितना इंतज़ार कर सकता है, कह नहीं सकता। मेरा यह अनुभव अभी तक सिर्फ मुझतक सीमित है। मोहन राकेश को मैंने उनके नाटकों से नहीं जाना। उनकी डायरी से मिलकर मुझे लगा, यही वह व्यक्ति है जो मुझे, मुझसे मिलवा सकता है। यह बात रही होगी ग्रेजुएशन के खत्म होने वाले साल की। तब व्यवस्थित तरीके से लिखना शुरू नहीं किया था। कुछ भी नहीं। डायरी की शक्ल में तो बिलकुल भी नहीं। मोहन राकेश की डायरी ने बताया, लिखना सिर्फ लिखना नहीं होता। मैं सोचता, अगर यह डायरी अपने पास रखने के लिए मिल जाये, तो क्या बात होती। यह कोरी भावुकता में लिपटी हुई व्यक्तिगत इच्छा नहीं है। बस कुछ था, जो ऐसा लगता रहा। साल बीते हम एमए में आ गए। एमए खत्म हो गया। मोहन राकेश का नाटक 'आधे-अधूरे' पढ़कर लगता रहा डायरी में इसके हवाले ज़रूर होंगे। पर कुछ कर नहीं पाया। कुछ करना था ही नहीं। छात्र अक्सर कुछ कर भी कहाँ पाते हैं? सब कहते 'आपका बंटी' मोहन राकेश के पारिवारिक ज़िंदगी की कहानी है। उसमें जो बंटी है, वही उनका बेटा है। मैं ऐसा कहते हुए कोई नयी बात नहीं कह रहा। बस उन बातों को अपने अंदर फिर से दोहरा लेना चाहता हू…

गाँधी के साथ एक दिन

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कोई भी व्यक्ति अपने देश काल से बाहर नहीं हो सकता, ऐसा नहीं है. हम कल्पना में अक्सर ऐसा करते हैं. सपनों में हमारे साथ यही होता है. हम उस वक़्त जहाँ खड़े थे, वह महात्मा गाँधी की समाधी के बिलकुल पास मुझे मिला. उसने गुजराती लहजे में मुझसे पूछा, 'यह क्या है’? यह पहला व्यक्ति था, जो मेरे सामने इन ऊपर कही सीमाओं से परे चला गया. उसने अपनी महिला साथी को पुकारा और कहा, 'रास्ता नीचे से है, ऊपर से नहीं’. उनके लिए यह दिल्ली आने पर घूमने की एक जगह है. शायद हम जगहों को पहली बार इसी तरह अपने अन्दर रचते हैं. यह 'घोषित' ऐतिहासिक स्थल उनके मन में कब 'स्थापित' होगा, कहा नहीं जा सकता? 
गाँधी नोट पर हैं, जो उनकी जेबों बटुओं में होंगे. जो उम्मीद करते हैं, उसके साथ विचार भी पहुँच रहे होंगे, वह अभी सोचना भी शुरू नहीं करना चाहते. उस पर ऐसी कोई तथ्यात्मक बात नहीं है, जो बताती हो उनकी मृत्यु कैसे हुई थी? उसे मृत्यु नहीं हत्या ही कहा जाना चाहिए. जैसे यह सूचना रिज़र्व बैंक के किसी नोट पर नहीं है, राजघाट भी नोट बन जाता है. यहाँ ऐसा कोई सूचनात्मक बोर्ड नहीं है. यह स्थल अपने आप उम्मीद करता है कि…

टॉयलेट: एक प्रेमकथा

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यह फिल्म हमें किस तरह गढ़ रही है, यह सबसे पहले देखने वाली बात है। एक लड़का, जिसे अधेड़ कहना उचित होगा, उसकी शादी अभी तक नहीं हुई है। वह किस तरह प्रेम को अपने अंदर पाता है? कैसे प्रेम किया जा सकता है? उसके प्रेम को यह फिल्म 'प्रेमकथा' कहती है। यह कैसा प्यार है, जिसमें लड़का लड़की का पीछा करता है। साइकिल, मोटर साइकिल, बस, ट्रेन, टेम्पो, यातायात के सभी उपलब्ध साधनों से लड़की का पीछा ही नहीं करता, उसकी मर्ज़ी के बिना उसकी तस्वीरें उतारता है। उस तस्वीर से अपनी साइकिल एजेंसी का विज्ञापन बनावाता है। लड़की इस विज्ञापन को कस्बे में जगह-जगह देखती है तो अपना विरोध दर्ज़ करती है। इस क्षण तक प्रेम का अंकुर उस लड़की में कहीं अंकुरित होता नहीं दिखता।

वह कब नायक पर रीझती है? जब उसे एहसास होता है, वह अधेड़ अब उसका पीछा नहीं कर रहा है। उसे अपने अंदर एक अजीब तरह का खालीपन महसूस होता है। जिसे हम दर्शक, जिसमें अधिसंख्यक पुरुष होंगे, वह किसी प्रेमकथा का आधार मान लें, तो क्या गलत है? हम सब एक पीछा करने वाले लड़के के लिए सहानुभूति से भर गयी लड़की को अपने सामने बेचैन रातों में नींद न आने के कारण करवटें लेते हुए द…

न कहना

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मैं कभी नहीं कहता मुझे किसी से मिलना है। मैं कभी नहीं कह पाऊँगा। यह दोनों बातें जितनी अलग दिखती हैं, उससे ज़्यादा यह मेरे भीतर गहरी धँसी हुई हैं। हम विपरीत ध्रुवों पर खुद को रच रहे होते हैं। इसे गढ़ते हुए यह पंक्ति हर उस पढ़ने वाले के अंदर घटित हो सकती है, जिससे मैं इधर कई दिन हुई नहीं मिला होऊंगा। समान रूप से दूसरी तरफ भी यही भाव जब इस तासीर में घुल जाएगा, तब देखना चाहता हूँ, वह सब कैसे होते जाएँगे? इस न कहने और मिलने के बीच जो जगह है, उसी के आस पास खुद को बनता हुआ देखता हूँ। वह सब भी जो मुझे मिलना चाहते होंगे, मुझे से मिलने, कुछ देर बात करने, बहुत सारे दिन मेरे साथ रहने की इच्छा से भर गए होंगे, वह भी मेरी तरह उस मेरी तरह हर दूसरे व्यक्ति को कुछ भी नहीं बता रहे हैं। यह अजीब किस्म का चुप्पापन कुछ ऐसी गंध छोड़ रहा है, जिसे मैं अपने इर्द-गिर्द महसूस कर रहा हूँ। इसमें एक अजीब से खालीपन के बाद उपजा कुछ है, जिसे देख पाना संभव नहीं है। वह इन पंक्तियों में ही कोई आकार ले रहा होगा। वह किस शक्ल का होगा, मुझे नहीं पता। पर इतना है वह इन पंक्तियों में अनदेखा नहीं रह जाएगा। कई अनदेखी चीज़ें ऐसे ही नज़र…

क्षण

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मैं कई दिनों से लिखने के लिए एक ऐसे क्षण की प्रतीक्षा में हूँ, जब यह लिखे जाने वाली घटना मेरे अंदर उसी तरह दोबारा घटित हो जैसे वह उस रात हुई थी। बिलकुल उन्हीं भावों से एक बार फ़िर भर जाना चाहता हूँ। लेकिन कोशिश करने के बाद भी मैं किसी युक्ति से उन पलों को अपने अंदर दोबारा घटित नहीं कर पाया हूँ। यह एक दुखद घटना की पुनरावृति नहीं है। यह किसी अनचाहे खटके से कहीं पहले उसे दर्ज़ कर लेने की मेरी छोटी सी इच्छा है। यह घटना किसी भी तरह से कुछ भी बदल देने का कोई दावा नहीं कर रही है जबकि इधर सब कोई न कोई दावा कर लेना चाहते हैं। यह इस भाव से मुक्त है। सच में, यह बहुत छोटी-सी घटना को लिख लेना है। जिसमें आगे कुछ भी घटित होता हुआ नहीं दिखाई देगा। यह न दिख पाना हमारी तंगनज़री होगी, इसलिए पहले ही सावधान किए देता हूँ।

माँ और मैं बहराइच से अभी चले नहीं हैं पर लखनऊ में हमारा इंतज़ार हो रहा है। बस को चलने में अभी थोड़ा वक़्त है। पूछने पर किसी ने कहा, चार पचीस पर चलेगी। पर वह वहाँ सोच रहे होंगे, बस चल पड़ी है। अभी थोड़ी में जरवल रोड पार कर जाएँगे और घाघरा घाट आ जाएगा। इस तरह कुल तीन घंटे बाद यह बस रामनगर, बाराबंक…

देखो

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बिन कपड़े वाली नंगी लड़कियों को देखो. उनके शरीर पर भी वही खाल है. उसके नीचे नसों में बिलकुल उसी तरह खून बहता है. नीचे उनका रंग लाल है. उनके भी फेफड़े हमारी तरह साँस लेते हुए हवा से भर जाते हैं. एक दिल उनके पास भी है. मूलतः हम एक ही हैं. फ़िर भी हम उन्हें देखने की इच्छाओं से भर गए हैं. इसे ख़ुद से एक सवाल की तरह पूछना चाहता हूँ. क्यों हम उनके स्तनों और नितम्भों को देखना चाहते हैं? उनकी फिसलती सी लगती पीठ पर क्यों फिसलना चाहते हैं. उनकी बिन बाल वाली काँखों में झाँककर दुनिया देखने का सपना हम कहाँ से लेते आये हैं. उनकी नंगी जाँघों पर सिर रखकर लेटे रहने की कामना हम कैसे अपने अन्दर बेल की तरह उगने देते हैं? उनकी महकदार बाँहों पर अपनी खुरदरी उँगलियों से क्या लिख लेना चाहते हैं? शायद हम उपभोक्ता बन गए समय में एक खिड़की के सामने बैठे उन्हें देख रहे हैं. मैंने नहीं देखी हैं, उनके आँखों में भूख. भूख जैसे ही सारी बातों में शामिल होती है. बात बात न रहकर कुछ और बन जाती है. उस दबाव में हम अपने चेहरे बचाने लगते हैं और उन परतों के नीचे कई महत्वपूर्ण सवाल सवाल की तरह बचे रह जाते हैं. मैं इन पंक्तियों को सिल…

अनुपस्थित

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मैंने कई जगहों से ख़ुद को अनुपस्थित कर लिया है. मेरे जैसे कई लोग और भी होंगे, जो कभी-न-कभी ऐसा किया करते होंगे. यह गायब कर लेना, किसी भी तरह से पलायन नहीं माना जाना चाहिए. यह गायब हो जाना इस समय की सबसे बड़ी चालाकी है. वह सूरज भी तो हर शाम ढलने का बहाना बनाकर अनुपस्थित हो जाता है.  कोई उससे तो नहीं पूछता. वह कहाँ चला जाता है.उसके जाने पर ही हम रात होते-होते चाँद को देख पाते हैं. तारें भी आसमान में बिखर जाते हैं. एक का जाना हमें असहज करता है पर प्रकृति में वह एक क्रम है. एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ सब एक के बाद एक होने के लिए अपनी तय्यारियों में लगे रहते हैं. सोचता हूँ, तब बहुत सी जगहों पर अब लौटने का मन नहीं करता. एक मन यह भी होता है. इस जगह पर भी आना अब बंद कर देना चाहिए. कोई भी तो नहीं है, जिसके लिए आया जाए. मन एकदम जहर हो गया है इधर. किसी को भी नहीं छोड़ रहा. एक एक कर सबसे बदला लेने के ख़याल से भर जाने के बाद ऐसा होना सहज ही माना जाएगा. किसी ने मेरा कुछ बिगाड़ा नहीं है. कौन किसी का कुछ बिगाड़ पाया है. पर फिर भी मन, उसे ऐसे ही होना है. बेसिर पैर के ख्यालों में डुबोते रहना. तैर मैं कभी नहीं पाय…

पहला सफ़ेद बाल

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बात हर बार रह जाती है. मैं इस बात को पिछले साल से दर्ज कर लेना चाहता हूँ. ड्राफ्ट में तारीख है, उनतीस अगस्त. दो हज़ार सोलह. तब से यह बढ़े नहीं हैं. दो ही हैं. यह दोनों मेरी उम्र बढ़ने के संकेत नहीं हैं. शायद यह उन बिताये दिनों के स्मृति चिह्न हैं, जिन्हें मैं भूलना नहीं चाहता. शायद हम सब अपने बिताये दिन भुलाना नहीं चाहते. कुछ होंगे, जो उम्र के साथ भूल गए होंगे, तब उनके सिर पर खिचड़ी बाल इकठ्ठा होकर उन्हें उनकी यादों में वापस ले जाते होंगे.  सब अपनी अपनी तरह से समझते है, यह मुझे इसी तरह समझ आ रहे हैं. सुबह नहाकर आता हूँ और आईने के सामने कंघी करते वक़्त यह दिख जाते हैं. चाँदी के तार की तरह. अभी तक मैंने किसी को बताया नहीं है. बस एक दिन यहीं बैठे-बैठे तुमने इन्हें खोज लिया था. इनकी खोज कहीं किसी के सामान्य ज्ञान को बढ़ाने में कोई योगदान नहीं देती इसलिए इस बात को किसी को बताना ज़रूरी भी नहीं था. फिर मैं किसी तरह दशरथ भी नहीं हूँ, जिनके कान के बालों को देख तुलसीदास भविष्य की कथा कहने लग जाते. यह चुपके से मामूली आदमी के जीवन में घटित होने वाली उससे भी मामूली घटना थी. इसे बाकियों द्वारा सिरे से नज़…

ख़त सा पन्ना

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बहुत दिन हुए आपसे बात नहीं हुई. कभी ऐसे होना, खाली होने जैसा लगता है. इधर सच में यह बहुत महसूस होता रहा है, हम कुछ नहीं कर पाए. लिखने को लेकर अब ख़ुद को ज्यादा आश्वस्त नहीं कर पाता. लिखने को कम करके नहीं आँक रहा. एक प्रयोजनवादी विमर्श हावी हो जाता है. ब्लॉग रोल में देखता हूँ, तब लगता है, कोई तो मेरे साथ नहीं लिख रहा. जो तीन साल पहले स्थिति थी, उसमें बहुत परिवर्तन आया है. शायद हम सब हमउम्र रहे होंगे और ज़िन्दगी में एक साथ ज़िन्दगी के दबावों की तरफ बढ़ गए होंगे और इस कारण ब्लॉग पर नहीं लिख पा रहे होंगे. यह उसी पुरानी बहस में दुबारा घिर जाना है. प्रिंट में आने की तमन्ना के बाद सब सुस्त हो गए. प्रिंट मतलब उनके नाम की एक जिल्द आ गयी और उनकी रचनात्मक ऊर्जा का विलोपन शुरू हो गया. यह शायद सतह पर दिख रहा है, शायद इसलिए इस तरफ इशारा कर रहा हूँ. फिर आप वाली बात याद आती है. ब्लॉग को एक माध्यम की तरह देखना चाहिए और कौन उसे कब तक साथ रखकर लिखता रहे, यह उनका व्यक्तिगत चयन है. मेरा भी अब लिखने का मन नहीं है. बहुत टुकड़े-टुकड़े में लिख लिया.
लेकिन ऐसा नहीं है, अब कुछ बड़ा लिखते हैं टाइप ख़याल दिल में उठने लग…