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डूबना

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कभी किसने सोचा होगा कि वह डूब जायेगा. किसी ने भी नहीं. उन लोगों ने भी नहीं, जो एक दिन हमेशा के लिए डूब जायेंगे. उन्हें नदी नहीं डुबो रही. उसका पानी डुबो रहा है. इन दोनों में जो फ़र्क है वही हमें बताएगा, हम किस तरफ़ है. यहाँ ज़रूरी है, हमारा उनकी तरफ़ हो जाना. पर उनकी तरफ़ हो पाना इतना आसान नहीं है. एक दिन हम सबको यह सवाल ख़ुद से पूछना होगा. जब वह सब डूब रहे थे, हम किन ख्यालों में ख़ुद को रच रहे थे? हमने उनके साथ अपना भविष्य क्यों साझा नहीं किया? वह क्यों किसी हार जाने वाली लड़ाई में ख़ुद को हारा हुआ देखने के लिए लड़ रहे थे?
तब वह हमें बताएँगे, हर लड़ाई जीतने के लिए नहीं होती. किसी-किसी में हारा भी जाता है. जब इन काली रातों में उनकी यादें हमेशा के लिए जलमग्न हो रही होंगी, हम ऐसे ही किसी बांध से आ रही बिजली से चलने वाले उपकरणों के साए में चैन की नींद सो रहे होंगे. हमें उन अनदेखे अनजाने लोगों की डूबती जिंदगियों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. उनके स्मृति कोशों में उन जगहों की कोई याद भी उस इकठ्ठा हो रहे जलाशय में दिख नहीं पाएगी. सब एक दिन हमेशा के लिए डूब जायेगा. कैसा होता होगा उस ज़मीन को हमेशा के लिए छोड़ …

तुम से मैं तक..

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अगर अपने आप को कुछ कह सकता हूँ तो सिर्फ़ दुःख का कथावाचक कह सकता हूँ. मैंने दुःख के अलावा कुछ नहीं लिखा. तुम कहती रही, तब भी नहीं. असल में मेरे जैसा भगोड़ा कोई नहीं होगा. इसे शिष्ट भाषा में ‘पलायन कर जाना’ भी कहते होंगे पर अब इस शब्द से कोफ़्त होती है. आज ख़ुद के लिए मैंने विनोदकुमार शुक्ल हो जाना तय किया है. मैं भी अपने दाम्पत्य के इन दिनों पर कुछ कहुँगा. जो कहुँगा उसमें भाप जितना सच होगा. ऐसी कहानी, जिसमें कोई भी बात सच नहीं होगी. सच और झूठ से फर्क किसे पड़ता है? किसी को नहीं. सबके अपने-अपने सच और झूठ हैं. बस तुम हो, थोड़ी समझदार लगती हो. तुम्हारे आगे मैं कहीं नहीं ठहरता. तुम ही मुझे संभाले रहती हो. जब भी खो जाता हूँ, याद कर लेता हूँ. थोड़ी अपनी पहली मुलाक़ात, थोड़ी तुम्हारे चेहरे की मुस्कराहट. बेदम होने से हरबार तुम बचा लेजाती हो. इसलिए खो भी जाता हूँ तो अब डर नहीं लगता. तुम हो न. हरबार मुझे बाहर निकाल ले जाने वाली. पर सच कहूँ, तुम्हें कभी नहीं बताता, तुम इसतरह मेरा कौन सा काम कर रही हो?

इन पंक्तियों को जब इस तरह ढाल रहा हूँ, तब भी मुझे पूरा यकीन है कि तुम्हारे सिवा कोई इसे समझ नहीं पा रहा…

रोज़ाना

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एक बार जब दिन टूट जाये, तब उसे समेटने के अलावा कोई चारा नहीं बचता. इधर यही हो गया है. याद नहीं आता कितने साल पहले यह दिन टूट गए. दिन को रात भी कह सकता हूँ पर नहीं कहूँगा. दिन में रौशनी है. रात में चाँद है. पर फ़िर भी नहीं. कितना वक़्त सिर्फ़ इसी बात को सोचते-सोचते बीत गया कि कभी अपने रोज़ाना पर लिखूँगा. एक दौर वह भी था कभी, जब हम अपने इस रोजाना को टूटने से बचाने की एवज़ में उसे लिख लिया करते थे. मतलब पूरे दिन कौन-कौन सी आदतों, बातों, फ़िज़ूलखर्ची में कहाँ, कितने, कैसे और क्यों बीत रहे हैं, सब. न जाने यह धागा कब चिटक गया. आज भी जब लिखने बैठा हूँ, तो वही पन्ने याद आ रहे हैं. उनपर यह नहीं लिखा कि दिनों के गट्ठर कैसे बीत रहे हैं? उनमें क्या-क्या कर रहा हूँ? बस लिखा तो मन की परतों को उघाड़ता रहा. कोई उनसे गुज़र कर यह तो जान सकता है, मन में क्या चल रहा है(?) पर वह रोजाना कैसे बुन रहा हूँ, उसकी कोई टोह भी नहीं ले सकता. इसे शायद चालाकी से उन दिनों को छिपा ले जाना कहते होंगे. फ़िर जब एकबार यह सिलसिला चल निकला, आज तक बस सोचता ही रहा. अभी भी कितना लिख पाउँगा, कह नहीं सकता. शायद जब से भागना शुरू किया मेरा…

बारिश

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रात से बारिश हो रही है. बारिश. पता नहीं सूरज के सामने भाप बनते हुए नदियों की बूँदें क्या सोच रही होंगी. शायद अपनी नदी में वापस जाने की सोचते-सोचते सो गयी होंगी. सोना, सपनों में खो जाना है. उन्होंने सपनों में मुझे देखा होगा. हम सबको देखा होगा. हम सब भी कभी बूँद थे. छोटी-सी बूँद. यह बूँद हमारे पुरखों को भी उतना ही जानती है, जितना हमें. शायद हमसे भी जादा जानती होंगी. वह तब से हमारे साथ बरतते हुए आ रही हैं. आसमान से गिरती यह बूँदें हरबार कई चीज़ें टूटने से बचा ले जाती हैं. हो सकता है, ऐसा सिर्फ़ मुझे लगता हो. पर यह लगना मेरे लिए ज़रूरी है. शक्ल से भले कैसा भी लगता रहूँ, पर संभावनाओं को बचाए रखने के लिए मुझे इनकी ज़रूरत पड़ती है. इन बूँदों की ठंडक मौसम में घुलने के साथ उम्मीदों को जिंदा रखती है, जो भीगने के बाद साँसों में तैरने लगती हैं. इतना सोचते हुए एक पल बाद महसूस होता है कि बारिश किसी की ज़रूरत नहीं है. वह किसी के चाहने पर नहीं होती. वह सिर्फ़ होती है. ज़रूरत किसे लग रही है, किसे नहीं लग रही है, यह सब हमारी बनायीं सामजिक, मानसिक संरचनाओं से जादा कुछ नहीं है. उसका होना, उसके होने के लिए ज़रूरी…

उदासी

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उदासी दिखने में कैसी होती होगी? शायद आँसू की तरह होती होगी. तरल. गीली. उदास-उदास. अन्दर तक भिगो देने वाली. जैसे वह कहीं मिट्टी की छोटी-सी दिवार बनाते हुए अपनी आँखों में पानी आते देख अंगोछे से उन बादलों को हटा देते होंगे, जैसे इधर तुम करती हो शायद. खिड़की पर परदा लगा. अन्दर बैठी. गुमसुम. कभी न कभी हम सब ऐसे होते होंगे. उस एहसास को छू कर देखते होंगे. अन्दर से बाहर आते हुए उसका रंग और सुर्ख हो आता होगा. जैसे तुम्हें देखकर मेरे गाल हो आते हैं. मैं हमेशा उस माँ की तरह उदास हो जाना चाहता हूँ, जो उन नए दूध के दाँतो के इंतज़ार में उदास है. उन पौधे की जड़ों की तरह कमज़ोर महसूस करना चाहता हूँ, जिन्हें रेशे-रेशे मिट्टी लेकर अभी-अभी ज़मीन से बाहर निकाल लिया गया है. उनमें भी कहीं दर्द भरा होगा. बिछुड़ने का. अकेले होने का. टूट जाने का. कभी इस ख़याल से भर आता हूँ कि रोज़ पेट से निकलती उन सारी बच्चियों की तरह अपने शरीर पर माँ के आँसुओं और उसके खून की गर्माहट लिए अपनी साँसों को समेटते हुए कूड़े के ढेर में पड़ा रहूँ. उस तरह भी होना चाहता हूँ, जैसे शादी के बाद तुम होती गयी हो. असल में मैं तुम होना चाहता हूँ.
इस…

छुओ

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पता नहीं मेरे अन्दर यह बात कब घर कर गयी. किसी नयी किताब को इसलिए नहीं छू पाता के उन पन्नों पर उँगलियों के निशान न छप जाएँ. आँखों के बिलकुल सामने पता नहीं कौन-कौन सी किताबें, कब से पड़ी हुई हैं. सच, इन्हें पड़ा हुआ ही माना जाये. इन्हें कभी नहीं छू पाता. इसे आदत नहीं कह सकते. पता नहीं यह क्या है. यह जैसा भी है, है. छूने के लिए एक आदिम इच्छा का होना ज़रूरी है. वह कौन रहा होगा, जिसने सबसे पहले स्त्री का स्पर्श किया होगा? किसने सबसे पहले किसी पुरुष को छुआ होगा? असल में उन्हें छूने वाले वह ख़ुद रहे होंगे. हमसे पहले हमें कौन छू पायेगा? इसका पिछली पंक्ति के अलावे इसका कोई जवाब नहीं है. हम भले अपनी उँगलियों से छूने के क़ाबिल न हों पर गर्भ में उन असीम एकांत के क्षणों में हम ख़ुद को छू रहे होते हैं. लेकिन जैसे-जैसे हम बड़े हो रहे होते हैं, हम इस छूने को भूलकर फ़िर से छूना सीखने लगते हैं. सब मिलकर बताते हैं किसे, कब, कैसे, कहाँ छुआ जा सकता है और किसे कब, कैसे, कहाँ नहीं छुआ जा सकता. इस सीखने-सिखाने में पूरा समाज छिपा रहता है. हमारी खोखली नैतिकता से लेकर हमारे जीने-मरने के सवालों को समेटे हुए हम भी बिन …

चीड़ों पर चाँदनी

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मेज़ पर न जाने कब से ‘चीड़ों पर चाँदनी’ पड़ी हुई है. सन् उन्नीस सौ तिरानवे में अगर हम अरब सागर में डूब गए होते तो हमें इस दुनिया से गए तेईस साल हो गए होते. तेईस साल पहले एक लड़की थी, प्रिया मिश्र. उसने कभी यह किताब आठ सितम्बर के दिन खरीदी होगी. आज उसे कितना याद होगा, पता नहीं. मुझे ख़ुद याद नहीं कौन से इतवार दरियागंज जाकर इसे ले आया था. तबसे धूल खा रही है. कभी-कभी सोचने लगता हूँ, उसे यह किताब कहाँ मिली होगी. किसने बताया होगा, निर्मल वर्मा को पढ़ना चाहिए? किसी किताब की तरह नहीं, आहिस्ते से भाषा में तैरते हुए कहीं दूर निकल जाने के लिए.

तब इसकी कीमत बीस रुपये थी. अपने पुराने दिनों में यह भी क्या ज़िल्द रही होगी. जैसे बुढ़ापे में हमारी कमर झुक जाती है, उसी तरह आज इसका एक-एक पन्ना पीला पड़ चुका है. आवरण चित्र हरिपाल त्यागी का है. राजकमल से यह दूसरा पेपरबैक संस्करण. निर्मल वर्मा की किताब में इस लड़की का नाम ‘लिदीत्से’ की तरह दिल में रह गया है. कभी लिखूँगा. एक लड़की थी प्रिया मिश्र. जो किताब पढ़ती थी. अभी बस इतना ही. बाकी जाने देते हैं.

मैं बिलकुल नहीं जानता इस नाम की लड़की असल में भी कहीं है भी या नह…

राकेश २०११

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पता नहीं कबसे तुम्हारी तरह होना चाहता हूँ, पर सचमें हो नहीं पाता. तुम दिल्ली से गए तो पर दिल में और गहरे बैठ गए. यह जो तुम्हारी तरह होना है, बहुत अजीब सा है. क्या है तुममें जो ख़ुद में देख पाता? शायद सपनों को देखने की शिद्दत वह बात होगी. कुछ-कुछ जो सोचते हो, उसे उतनी ही साफ़गोई से कह जाने वाले राकेश की तरह कभी नहीं हो पाऊं, पर कोशिश हमेशा करता रहूँगा. पर इसबार तुम मेरी बात मान जाओ. यह जो तुम लिखने से भागते रहते हो, अब थोड़ा थम जाओ. थोड़ा ठहर कर सोचो. लिखने से कुछ भी नहीं टूटेगा. और जो अन्दर टूट रहा है, उसका सामना किये बिना नया कैसे बन सकता है? कभी समझ नहीं पाया.

तुम कभी-कभी मेरी यादों में वही पुराने वाले राकेश की तरह दिख आते हो, तो अच्छा लगता है. मैं भी ख़ुद को पुराने वाले लबादे में पसंद तो क्या ख़ाक करता रहा होऊँगा पर उसे मिस ज़रूर करता हूँ. हमारी दोस्ती उसी पुरानेपन में कई बार जाकर वापस ख़ुद को टटोलती होगी तो कैसा लगता होगा? पता नहीं. तुम्हारा दिल्ली से जाना पता नहीं कैसा कर गया. इतनी बाद तो ऐसा साथी मिला था, जिससे अपने मन की कोई भी बात कह सकता था.

तब से तुम्हें देख रहा हूँ. अन्दर सिमटते…

वो जो नाक के नीचे होंठ हैं

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आज मेट्रो में जामा मस्जिद जाते हुए दिखे वह लड़का-लड़की पता नहीं कब तक याद रहेंगे? लड़का थोड़ा लम्बा था. लड़की थोड़ी छोटी थी. जैसे शहरों में अक्सर जोड़ियाँ बन जाती हैं. साथ पढ़ते-पढ़ते. एक ही दफ़्तर में काम करते-करते. वह दोनों भी कहीं साथ पढ़ रहे होंगे. कुछ देर साथ चलकर थकान कुछ तो कम होती होगी. हम कहें न कहें किसी का संग हमेशा ऐसा करता रहा है. कोई उसे किताब कहे, कोई दोस्त, कोई मोबाइल फ़ोन. सबके अपने अपने नाम हैं.
लेकिन अब जो मैं कहने जा रहा हूँ, दरअसल उसे अपनी याद के स्थायी हिस्से में तब्दील करने की चालाकी भर है. हम जिसे कहना चाहते थे, उसके साथ कुछ देर साथ बैठे रहे और वह उतरे, उससे पहले, हम उतर गए. हम कभी इतने करीब खड़े नहीं हुए कि भीड़ हमें असहज करने लगे. न एकदूसरे में इतने डूबे रह पाए कि भीड़ महसूस ही न हो. फ़िर ऐसा कोई ख़याल लाना बेमानी सा है कि मैं भी उससे कुछ ख़ास लम्बा रहा होऊँगा. न कभी हमारे होंठ इतने करीब थे. वहाँ किसी तरह हाथ का छू जाना भी एक घटना होता, जिसे डायरी में कहीं अपनी स्याही से दर्ज़ कर लेता. कभी किया भी था. बिन हड्डी वाला हाथ.
दोनों चलती हुई गाड़ी में हिलते डुलते इतने पास थे कि जैस…

हम दोनों

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दिन ऐसे ही हैं। सिलवटों वाली चादर की तरह। समेटे नहीं समेटे जाते। सोचता हूँ, काश! हम मशीन होते तो पता नहीं क्या होते? मौसम हमारे लिए जंग का सामान होता. मतलब, तब हम लोहा होते. लोहे होकर हम चुम्बक की तरफ़ खींचे चले आते. ऐसा नहीं है, हम अभी लोहा नहीं हैं. हमारे खून में जितना है, उसी के बूते तुम्हारी तरफ़ खिंचे चले आते हैं. उन यादों में हमदोनों हैं. साथ, कहीं दूर पहाड़ी पर ढलते हुए सूरज को देखते हुए डूब रहे हैं. डूब रही हैं हमारी तमन्ना, दिल, धड़कन और भी पता नहीं क्या-क्या? हथेलियों में हथेली लिए उन खून की धमनियों को महसूस करते उँगलियों में एक-एक बूंद के आने जाने के रास्ते को ढूंढते रहने के बाद उस घाटी में खो गए सूरज की परछाईंयों को गुम होते अँधेरे बंद करते जाते. 
हम दोनों भी गुम हो जाना चाहते हैं अँधेरे में. अँधेरा मतलब जहाँ एकदूसरे को हम भले देख न पा रहे हों, पर उन ख़ास गंधों से पहचानते हुए पास आते हुए हम थम जाते. पिघलती हुई ध्वनियों में किसी चिड़िया की अचीन्हीं आवाज़ घुलती रहती. घुलती रहती हवा में हमारी साँसें. उन सांसों में तुम्हारे होंठों पर लगे शहद की खुशबू.

अचानक हम दोनों एक सपने में हैं…