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अगस्त, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अधूरी बातें..

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उसने कभी कुछ कहा नहीं था. वह चुप था. जो भी कहा अपने भीतर कहा. अपने भीतर सुना. उसके लिए कहना ज़रूरी नहीं था. ऐसा नहीं है. उसकी एक नोटबुक थी. उससे वह सब कुछ कहता. एक दिन कहा, आज अच्छा नहीं लग रहा. उस शाम कुछ ख़ास नहीं हुआ था. बस किसी ने कह दिया, तुम गाते बहुत हो. जबकि उसे गाना बिलकुल पसंद नहीं था. उसका गला मुकेश, रफ़ी के दर्ज़े का तो क्या महेन्द्र कपूर से भी बेसुरा था. उसे मन्ना डे के गाये गीत अच्छे लगते. पर वह उन्हें आज तक गुनगुना भी न पाया होगा. 
दूसरे किसी दिन उसने पन्ना खाली छोड़ दिया. लिखा आज से ब्लॉग बंद. साल ख़त्म हो रहा था और उसमें सोखने की ताकत भी दिन पर दिन कम होती जा रही थी. वह सीढ़ियाँ चढ़ता तो सीढ़ियों पर थम जाता. सोचता इन माँसपेशियों पर कुछ कहता चलूँ. पर उससे नहीं हुआ. उसका सोखता सूखता चला गया.थक गया.

एक शाम ऐसे ही बारिश हो रही थी. खिड़की से बूँदें बौछार बनकर अन्दर तक भिगो गयीं पर उसने इन भीगती बूँदों को छूकर देखा तक नहीं. उसके दिल में खून के साथ अब थोड़ा-थोड़ा पत्थर भी धड़कने लगा था. पत्थर थोड़े गोल थे. थोड़े नुकीले. थोड़े चौकोर ही रह गए थे. उसे कुछ महसूस हो, उससे पहले ही वह आँखें मूंद…

लाल बत्ती पर खड़ी बस

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वह लड़की असल में प्यार करना चाहती है. पर अभी सिर्फ़ किताब पढ़ रही है. उनकी कॉलेज बस में कोई लड़का नहीं है. लड़का सिर्फ़ किताब में है. किताब प्यार पर है. दिल बना है. कुछ अंग्रेज़ी में लिखा भी है. 'अवर इम्पॉसिबल लवस्टोरी'. शायद वह प्यार में हो भी. या कि बगल में खड़ी इस बस में बैठी हर लड़की किसी न किसी के प्यार में हो. अगर ऐसा नहीं है, तब हम चुप कब होते हैं? पता नहीं, यह कैसे हुआ होगा कि सब चुप हैं. कोई किसी से बात नहीं कर रहा है. हम तो बचपन से कहीं जाने के लिए दोस्तों के साथ बस का इंतज़ार किया करते थे. लेकिन यहाँ कोई किसी से बात नहीं कर रहा. एक ने कान में हेडफ़ोन की लीड लगा रखी है. 
आगे की तरफ़ नज़र गयी तो एक दूसरी लड़की ने भी ऐसे ही कानों को व्यस्त रखा हुआ था. दरवाज़े के बिलकुल पास बैठी उस लड़की के पास ही किसी की गोद में मेडिकल की कोई मोटी सी किताब रखी हुई है. किताब के पन्ने बहुत पुराने हैं. पीले से भी मुरझाये हुए. मुड़े भी हैं कुछ. कहीं कोई याद छोड़ गया होगा. पर वह पढ़ नहीं रही है. खिड़की के बाहर देख रही है. पता नहीं लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की यह लडकियाँ कितने साल बाद किसी अस्पताल में डॉक्टर …

कल की तारीख

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कल की तारीख़ हमें अपने इतिहास में दर्ज करके रख लेनी चाहिए. कल नौ अगस्त, दो हज़ार सोलह के दिन इरोम शर्मिला सोलह साल बाद अपना अनशन तोड़ने जा रही हैं. इसके बाद वह आंग सान सूकी (बर्मा/ म्यांमार) की तरह सक्रीय राजनीति में प्रवेश करने पर विचार कर सकती हैं. यह घटना आने वाले समय में हमारे लोकतंत्र की सबसे निर्मम व्याख्या बनकर उभरेगी. लोकतंत्र जैसी आधुनिक संस्था का विकास अविरुद्ध होकर कैसा विकृत हो जाता है, इस छवि में हम उन आहटों को महसूस कर सकते हैं. 
हमने अपने लोकतंत्र को सिर्फ़ राजनीति में और उसमें भी ख़ुद को पांच साल साल में एक बार चलने वाले सिक्कों में तब्दील कर लिया है. यह ऐसी टकसाल है, जहाँ कोई भी आये उसकी कीमत बस एक वोट की है. हम अपने एक वोट से इस लोकतंत्र के नाम पर सामानन्तर चलने वाले एवज़ी तंत्र को अपनी वैधता दे रहे हैं. हो सकता है, कुछ लोग कहें कि हम लोकतंत्र को कम करके आँक रहे हैं. तब उन भोले भाले लोगों को अपने चारों तरफ़ सरसरी निगाह दौड़ानी चाहिए. इस सरसरी में भी उन्हें कुछ तो दिख जायेगा. नहीं दिखेगा तो वह मात्र उनका दृष्टिदोष है, हमारा नहीं.
यह बात बिलकुल सही है कि हम अनशन के समाप्त हो…

कहना, नहीं कहना

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देख रहा हूँ सब कह रहे हैं. कहने के लिए कहते जा हैं. जो अन्दर से जितने खोखले हैं, उतने ही कहने को उतावले हैं. मैं भी कभी हुआ करता था. अब चुप हूँ. चुप रहना मेरे लिए कहना है. कहने से बढ़कर है, न कहना. न कहने पर सब सोचते हैं, इसके पास कहने के लिए बहुत कुछ है. जब कहेगा, तब क्या बात कहेगा? अभी जब से सोकर उठा हूँ, बस सोच रहा हूँ, इस खिड़की के बाहर हो रही बारिश की एक बूंद भी मुझे छू नहीं पायी है. ऐसा क्या हुआ होगा जो छू नहीं पा रहा? उसमें शाम की ठंडक कुछ कम होगी. फ़िर हर चीज़ छींक की तरह नहीं हो सकती. अपने होने के क्षण सिर्फ़ वही होती है. यह चींटे जो कमरे में जहाँ-तहाँ घूम रहे हैं क्यों घूम रहे हैं? क्या गुम हो गया है इनका? वह छिपकली ट्यूबलाइट के आस पास ही क्यों रहती है? क्यों वह अपनी जगह छोड़ कर कहीं नहीं जाती? पता नहीं ऐसे कितने सवाल हैं, जिनको जवाबों की शक्ल में लिखना चाहता हूँ. पर लिख नहीं पाता. अभी जब लिख रहा हूँ, तब खिड़की के बाहर कहीं गिलहरी चहचहा रही है. सब उजाले के साथ कुछ-न-कुछ कहना चाहते हैं. मैं भी कुछ कहने की कोशिश में हूँ. पर इस कह नहीं पाने को अपने अन्दर महसूस कर रहा हूँ. क्या हम बार…

परछाईयाँ बची रह गयीं

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हिरोशिमा में आज से इकहत्तर साल पहले बिलकुल इसी पल सब पिघलकर भाप बन गए. पिघलकर कुछ नहीं बचा. सोचने का वक़्त भी नहीं. कल कैसा होगा? कल उनके आज से डरावना नहीं हो सकता था. उनके भाप बन जाने के दरमियान वह सब कुछ सोच भी नहीं पाए होंगे. ऐसा दावे के साथ इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि बम गिराने से आज तक अमेरिका इस सम्बन्ध में कोई साक्ष्य खोज नहीं पाया है. उनका विज्ञान बस यह बता पाया कि आसमान से उस दिन गिराए बम से जो चार हज़ार डिग्री की गर्माहट निकली, जिसने सबको निगल लिया. चार हज़ार डिग्री तो काफ़ी होता होगा किसी को भी पिघलाने के लिए, ऐसा सोचकर उन्होंने राहत की साँस ली होगी. कितना ज़रूरी है साँस ले पाना. चाहे इसके लिए दूसरे किसी भी व्यक्ति को साँसें लेने न दी जाएँ. उन सबकी साँसें नहीं बचीं. बस बची रह गयीं परछाईयाँ. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा, एक परमाणु बम उनकी परछाईयों को हमारे अन्दर इस तरह उतरते हुए चला आएगा. वह पत्थर उस गरमी में भी नहीं पिघल पाए. उन्होंने सबको बचा लिया. उनकी स्मृतियों के यह स्मारक भी उनके साथ हमेशा के लिए उड़ गये होते, अगर वह पत्थर न होते. इसलिए कभी कभी सोचता हूँ कभी पत्थर हुआ…