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जून, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

ख़त सा पन्ना

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बहुत दिन हुए आपसे बात नहीं हुई. कभी ऐसे होना, खाली होने जैसा लगता है. इधर सच में यह बहुत महसूस होता रहा है, हम कुछ नहीं कर पाए. लिखने को लेकर अब ख़ुद को ज्यादा आश्वस्त नहीं कर पाता. लिखने को कम करके नहीं आँक रहा. एक प्रयोजनवादी विमर्श हावी हो जाता है. ब्लॉग रोल में देखता हूँ, तब लगता है, कोई तो मेरे साथ नहीं लिख रहा. जो तीन साल पहले स्थिति थी, उसमें बहुत परिवर्तन आया है. शायद हम सब हमउम्र रहे होंगे और ज़िन्दगी में एक साथ ज़िन्दगी के दबावों की तरफ बढ़ गए होंगे और इस कारण ब्लॉग पर नहीं लिख पा रहे होंगे. यह उसी पुरानी बहस में दुबारा घिर जाना है. प्रिंट में आने की तमन्ना के बाद सब सुस्त हो गए. प्रिंट मतलब उनके नाम की एक जिल्द आ गयी और उनकी रचनात्मक ऊर्जा का विलोपन शुरू हो गया. यह शायद सतह पर दिख रहा है, शायद इसलिए इस तरफ इशारा कर रहा हूँ. फिर आप वाली बात याद आती है. ब्लॉग को एक माध्यम की तरह देखना चाहिए और कौन उसे कब तक साथ रखकर लिखता रहे, यह उनका व्यक्तिगत चयन है. मेरा भी अब लिखने का मन नहीं है. बहुत टुकड़े-टुकड़े में लिख लिया.
लेकिन ऐसा नहीं है, अब कुछ बड़ा लिखते हैं टाइप ख़याल दिल में उठने लग…

रेलगाड़ी

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रेलगाड़ी कोई सुविधा नहीं दे रही. ऐसा नहीं है. वह अभी भी ज़मीन पर बिछी हुई पटरियों पर भागने की पूरी कोशिश करती है. वह कोशिश करती है, कैसे भी करके उन डिब्बों में बैठे लोगों को उनकी तय जगहों पर वक़्त के दायरे में पहुँचा दे. जो जा रहा है, वह भी उसी तरह साथ बिताये दिनों में डूबने लगता है. वह इसी तरह सबको लाती है. ले जाती है. उसका यही काम है. इसी को वह ठीक से करना चाहती है. अभी जब रेलगाड़ी प्लेटफ़ॉर्म से चली जायेगी, तब हम दोनों भाई थके हुए पैरों के साथ वापस घर लौटेंगे. यह सारी बातें मैंने परसों रात नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर सोलह पर खड़े-खड़े नहीं सोची. ट्रेन आने में अभी वक़्त था. जब किसी को छोड़ने स्टेशन पर जाओ, तब अन्दर से अजीब सी हरारत होने लगती है. खून एक दम ठंडा हो जाता है. मन बेचैन सा होने लगता है.

इस रेलगाड़ी की स्मृतियाँ बचपन से हमारे अन्दर घुल रही हैं. हम कभी गोंडा से नहीं आये. हमेशा बहराइच से बस पकड़कर चारबाग, लखनऊ के लिए निकलते और रात प्लेटफॉर्म पर चादर बिछाकर खाना खाते. लखनऊ मेल तबतक सामने लग जाती. थोड़ी देर बाद हम उठते और उसमें दिल्ली के लिए बैठ जाते. कोई सुबह उठता नहीं…

लिखना

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इसकी कोई वजह नहीं मिल रही. लिखना कम क्यों हो गया? शायद ऐसा सबके साथ होता होगा. हमारी आदत से काफ़ी चीजें निकलती रहती हैं. हम ताप महसूस करें, तब भी होता है, लिखा नहीं जाता. मन कहीं और भागने को होता है. जैसे कभी कमरे से बाहर होकर वापस आने के लिए हम जाते हैं, वैसे ही लगता है, न लिखते हुए लिखने की तरफ लौटना चाहता हूँ. यह चाहना एक इच्छा है. छोटी सी इच्छा. जिसे पूरा करने के लिए कोई भी ऐसा काम नहीं कर रहा, जिससे यह लौटना हो पाए. कागज़ पर थोड़ा बहुत कहता रहा हूँ पर उसे यहाँ नहीं लगा सकता. यह डर नहीं है. यह डर से पहले का कुछ है. इसे संकोच भी कह सकते हैं. संकोच एक बेहतर शब्द है. पर इस्तेमाल नहीं करना चाहता. यह शायद अब मेरी बातों में ऐसा इकहरापन है, जो मुझे घेरे हुए है. ब्लॉग स्क्रोल करते हुए उसने कह दिया, यहाँ क्या लिखा हुआ है? जैसे लगता है, सब दुःख से ढक गया हो. दुःख का स्थायी भाव मेरे अन्दर मानसून की हवाओं की तरह नहीं है. असल में उसका कोई मौसम ही नहीं है. हम सब ऐसे ही होते रहते हैं. कोई कम, कोई ज्यादा. मेरे हिस्से यह ऐसा ही है. बेकार. बेतरतीब. बेवजह.

शायद मेरे अन्दर लिखने को लेकर इमानदारी भी कम…

वह कमरा घर था हमारा

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मैं पिछले कई दिनों से बार-बार उस कमरे में जा रहा हूँ, जो बचपन से हमारा घर था. इसे कमरा बोलना भी एक तरह से अपने अन्दर दूरी को उगने देना है. उस कमरे की सब पुरानी चीज़ें एक-एक कर किसी काम की नहीं रह गयीं. अब वहाँ हमारे वक़्त की कोई भी पहचान नहीं है. उन्हें वहाँ से हटाया जाने लगा है. हर दिन वहाँ कुछ न कुछ नया हो रहा है. नया पुराने को हटाकर ही आएगा, ऐसा नहीं है, पर इन दीवारों के बीच यह ऐसा ही है. इसमें एक तरह की यांत्रिकता है, जिसे वह पहले रहने वाले लोगों के साथ किसी तरह का सम्बन्ध बनाये नहीं रहने दे सकते. अगर वह पिछले की पुनरावृति होगा, तब उन चिन्हों से दावे निर्मित होंगे.  कोई नहीं चाहता ऐसा हो. कोई भी नहीं.

जब तक हम थे, याद नहीं आता पिछली बार जब यहाँ सफ़ेदी हुई थी, हम कितने छोटे थे. एक धुंधली सी याद में हम बस्ता टाँगे स्कूल से लौटे हैं और देख रहे हैं, सारा सामान एक खाली कमरे में रख दिया गया है. उस चूने की गंध फिर कभी नहीं आई. धीरे-धीरे पहले इन्हीं दीवारों में ऊपर छत से सीलन आई और एक वक़्त ऐसा आया, जब वहाँ दीमक ने झरते पलस्तर पर धमक के साथ वहाँ अपना घर बना लिया. हम सबका गर्दन ऊपर उठाकर ऊँट…

याद दोपहर

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अगर हम लिखना छोड़ दें, तब ऐसा नहीं होता कि हमने लिखना छोड़ दिया. होता बिलकुल इसके उलट है. लिखना हमें छोड़ देता है. मैं इस गरम होते शहर में छत पर एक कमरे में खिड़की पर परदा डालकर बैठा हुआ हूँ. बाहर आग उगलती हवाएं चल रही हैं. मेरे दिमाग में बहुत सी बातें चल रही हैं, पर उनमें से किसी को भी लिख नहीं पा रहा. बिस्तर इतना गरम है, जैसे अभी कुछ देर पहले कंक्रीट की छत अपने आप हट गयी हो और इसे भी अपनी चपेट में ले लिया हो. मेरी मेज़ पर आदतन बहुत सी किताबें बिन पढ़ी पड़ी हुई हैं. पढ़ने का मन बहुत सालों बाद इस तरह होता देख खुद को तैयार करने लगा जैसे. एक पैंसिल उठाई. कागज़ पर नज़र गयी. कुछ नोट कर लेने का मन हो गया, तब क्या करूँगा? दिवार से टेक लगता, इससे अच्छा होता मेज़ पर ही तकिया इस तरह रखता कि पीठ भी जल्दी नहीं दुखती. पर कौन सी किताब पढ़नी चाहिए? अनुवाद बहुत रखे हैं. अंग्रेजी से हिंदी. रामचंद्र गुहा, मार्क ब्लाख़, रोमिला थापर, अरुंधती रॉय. निवेदिता मेनन, लाओत्से. कौन सी? एक किताब फेनन की भी है. समझ नहीं आ रहा. सब आपस में गुत्थम गुत्था हो रही हैं. उठा किसी किताब को नहीं रहा हूँ. बस दूर से देखे जा रहा हूँ. कि…