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बेतरतीब

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किसी भी तरह तो इस वक़्त को कह नहीं पा रह हूँ । अंदर ही अंदर कितना कुछ बीतते हुए यह महसूस न होना कि भाषा भी साथ नहीं देती । लगातार कोशिशों से उसे इस लायक बनाया जा सकता था । एक अभ्यास जो हरदम किए जाने की माँग करता है, उसमें पीछे छूट जाने या किसी से आगे निकल जाने का कोई सवाल नहीं है । बात सिर्फ इतनी सी है, जहाँ से हम चीजों को देख सकते हैं, वह क्यों देख कर वैसी नहीं कही गई ? यह कभी-कभी तो मुझे ऐसा समय लगता है, जहाँ जो जैसा है, उसे वैसा कह पाना भी बहुत मुश्किल है । यह जो 'अभिधा' में न कह पाना है या ऐसे दबाव से घिर जाना है, जो प्रकट रूप से दिख भी रहा है और कुछ कह न पाने की कमजोरी में उसे छिपा ले जाने की चालाकी भर बनकर रह जाता है । इसे चालाकी के अलावे क्या कह सकते हैं?
यह जो न लिख पाना है, इसे भी दर्ज किया जाना चाहिए । दर्ज इसलिए के जब यह साल बीत जाएँगे, तब हमारे पास एक याद की तरह कुछ सबूत होंगे । एक दिन, एक शाम, एक पल ऐसा भी था, जब हम भीतर-ही-भीतर कुढ़ रहे थे । जो कहना था, उसे न कहकर बहुत कुछ ऐसी भूमिका को बनाने में खर्च कर चुके थे, जिसकी कोई ज़रूरत भी नहीं थी । इसे किस तरह तो समझा जा…