लिखने और न लिखने के बीच की खाली जगह

कोई चार-पाँच महीने बाद कुछ तरतीब से लिखने बैठा हूँ । जिसे तरतीब कह रहा हूँ उसका कोई सिरा अभी खुल नहीं रहा है । नए कैलेंडर में तीसरा दिन है, मन में किसी तरह का कोई बदलाव नहीं दिख रहा । वही ढर्रा । बिलकुल उसी तरह से लिखने के लिए बैठ जाने जैसा । जैसे कोई क्रम कभी टूटा ही न हो और मेरे अंदर कितनी ही बातें बाहर आने के लिए आतुर खड़ी हों । इन बीत गए दिनों का आग्रह कुछ इस तरह हर पल मुझे घेरे रहता है, जैसे उन्हें कहें बिना वह मुझे छोड़ना ही न चाहते हों । हर दिन कुछ ऐसा जो लिख लिया जाना था, जिसे कहे बिना सोने के लिए लेटना नहीं था । फिर भी कुछ कहा नहीं । कुछ भी नहीं कहा ऐसा नहीं है । कागज पर थोड़ा बहुत लिखता रहा हूँ । पर उसे आज से बहुत दिन बाद के लिए अपने पास रख लेने की आदत में कभी किसी से कहता नहीं । कुछ कह देना कभी ज़रूरी भी नहीं लगता ।

क्या यह ज़रूरी है, हम बीत जाने के बाद ही ऐसे किसी दिन अचानक पीछे मुड़े और पीछे देखते हुए जो बीत गया वह साफ़ साफ़ दिख जाये ? मुझे यही काम सबसे मुश्किल लगता है । कौन से एहसास मुझे बना रहे थे और जो यह साल अब किसी तारीख़ में ख़ुद को समेटे रहेगा, उसमें मैं कितना रह गया हूँ, मुझे दरअसल यही पता लगाना है । हम जब बीते साल में दाख़िल हुए थे हम डर के साथ दाख़िल हुए । सीमा की शादी अभी भी फरवरी में थी । चाचा कितने वक़्त और साथ रह पाएंगे यह सवाल की तरह हमारे सामने खड़ा था । दवा कोई असर नहीं कर रही । 

जो पीड़ा थी वह घर में सबके चेहरे पर साफ़ दिख रही थी । मेरे पास तब उस त्रासद समय में अपने अतीत की छवियाँ ही थीं, जिनमें डूबे रहने से मैं इन दिनों के कष्ट से बच सकता हूँ । मैंने यही तय किया । जो चाचा चारपाई पर सारा सारा दिन लेटे रहते हैं, उनसे पुराने चलते फिरते चाचा की तस्वीर तो मिलती नहीं । दिल को थोड़ी तसल्ली हुई । झूठी ही सही । यह युक्ति मुझे ठीक लगी । मैं कभी उनके सिराहने या उस चारपाई पर नहीं बैठा । मुझे लगता रहा वह पीड़ा, दर्द हम सबमें चल रहा है । उनसे कुछ भी पूछ कर उसे और बढ़ाने की मेरी कोई कामना या इच्छा नहीं थी । मैं अपने चाचा से कभी कुछ नहीं बोला । एक शब्द भी नहीं । मेरी भूमिका सिर्फ़ एक मूक दर्शक की थी । किसी भी तरह से कुछ न कर पाने वाला । चाचा एक दिन ऐसे ही लेटे-लेटे चले जाएँगे । इसके बावजूद कुछ न कहना, न बात करना अंदर तक तोड़ तो रहा था पर इस काबिल भी उसने नहीं छोड़ा था कि उन्हें पुराने दिनों में ले जाकर उन्हें कुरेदता । चुप रहा । और एक दिन लौट आया । लौट कर चाचा पर बहुत ही खराब कविता लिखी । चाचा के लिए: विदा गीत । इसे नहीं लिखा जाना था । पर क्या करूँ ? लिख दिया । चाचा जरवल कस्बे वाला वह पुल कभी देख नहीं पाये । फरवरी में उनके चले जाने के बाद वह कभी खुला होगा । याद नहीं । उनकी मृत्यु के बाद एक शाम ऐसे ही बैठे हुए मोबाइल के क्लाउड में उनकी आवाज़ मिली । वह दिल्ली आए हैं । गजरा लेने । उसी शाम की यह बातचीत है । उसमें वह हँस रहे हैं । जैसा वह फ़िर कभी हँस नहीं पाये । मैं बस यही सोचता रहता, जब अबकी गाँव जाएँगे और वहाँ चाचा नहीं दिखेंगे वह क्षण कैसे होंगे ? चाचा जो हमेशा वहीं मिले । ढाबली पर बैठे, अब वहाँ नहीं होंगे । वहाँ क्या कहीं नहीं होंगे । इस दिन का सामना करने के लिए ख़ुद को जैसे तय्यार करना हो । अगर कुछ भी कमी रह गयी तो बिखर जाऊंगा ।

लिखना ऐसे ही कम नहीं हुआ । बस हो गया । मन ही नहीं हुआ, जो छूट रहा है उसे कभी साथ साथ कहता जाऊँ। विधा भी एक घेरा है । कैसे उसे संभाल रहा था, बाद के दिन उस तरह कभी पकड़ में नहीं आए । सब जो कहा वह सुख और दुख जैसे दो ध्रुवों के बीच नहीं समा सकता यह बहुत बाद के दिनों में समझ आया । इनके बीच बहुत सी साझेदारियाँ रहीं, जिन्हें कहा । जिन्हें बाद के लिए संभाल लिया । कागजों पर कतरनों पर उतार लिया । लिखने में जो धैर्य चाहिए वह इन बाद के दिनों में चुकता रहा हो ऐसा भी नहीं है, मन अलग तरह से काम करने का आदी था बस यहीं आकार वह टूट रहा हो, यही लगता रहा । डायरी ठीक ठाक जा रही थी कि वह महीने भर के लिए यहीं दिल्ली में छूट गयी । फिर तो जैसे छटपटाता रहा । मुझे लगा तो था, कुछ रह गया, पर उसे बहुत बाद में जाना । जिसके जान लेने के बाद भी कुछ किया जाना मेरे लिए इतना आसान नहीं था । बहुत सारी बातें ऐसी भी रही होंगी जिन्हें अपनी इच्छा से नहीं कहा होगा । जिन्हें शब्दों में रूपांतरित करने के बाद वह जो बचे रह जाने वाले भाव संवेदना या घटना का कोई खास अंश रह जाएगा वह संदर्भों से कटा हुआ ही नहीं बल्कि उतना ही मान लिए जाने की संभावनाओं को खुद में समेटे रहता है । इसलिए भी लगा, जो हिस्से लिख भी देता हूँ उनमें सिर्फ़ मेरा ही हिस्सा होना काफ़ी नहीं है । 

यह एक बिन्दु के बाद किसी तरह की ओट न बन जाये इसके लिए बहुत सचेत नहीं रह पाता कभी कभी । जो मन में है उसका कहा जाना ज़रूरी तो लगता है पर अनिवार्यतः उसे कह दूंगा, ऐसा भी नहीं होता । अभी भी उसी डायरी के बीच में कहीं अक्टूबर में कही जाने वाली कुछ बातों को बिन्दुवार इशारों के साथ लिख कर रखे हुए हूँ । मौका मिले तो एक-एक कर उन्हें कहूँगा । उसी क्रम में कहूँगा, ऐसा नहीं है फिर भी जब वह सूची बनाई होगी तब उनके याद रखे जाने की वजहों में वह सबसे मूल्यवान ही लगी होंगी । इसके बावजूद उनको अभी तक न लिख पाने की कोई वजह मेरी गिरफ़्त में नहीं आई है । यह लिखना इसलिए भी उस तरतीब से नहीं आगे बढ़ता हुआ दिखा कि कहीं से भी उनमें कुछ ऐसा दिखा जो मेरे बीत चुके अतीत से कुछ अलग ढर्रा लिए हुए हो । जो समय बीतता गया, उसमें वही परेशानियाँ सबब बनने को तय्यार खड़ी थीं । उन्हीं मनः स्थितियों में घिरे रहते हुए सिर्फ़ एक ही बात हो सकती थी । उसी के सहारे यह दिन भी मैंने बिताए । उन घटनाओं, अंशों को बाद में संपादित करने से अच्छा था, उन्हें कभी लिखा ही नहीं जाये । मैंने अंदर फैसला किया । उन्हें कभी नहीं लिखा । जब लिखा ही नहीं तो उन्हें याद करने और लिख कर भूल जाने जैसे खयाल भी मुझे घेर नहीं पाये । साल के दिन, हफ़्ते, महीने ऐसे ही बीत जाने दिये । बिना कुछ कहे । बिना कुछ लिखे ।

इन सवालों और बहसों में यह बात भी थी, लिखा क्यों और किसके लिए जाये? एक सीमा के बाद यह बहुत बड़ा अवरोधक बनकर मेरे मन में उग आया । ब्लॉग पर जब चाहो लिख सकते हैं, एक दौर था भी जब ऐसा करने के लिए किसी भूमिका की कोई ज़रूरत महसूस नहीं की थी । लेकिन समय आगे भी बढ़ता है । हम कहीं पीछे रह जाएँगे । यह ख़याल नहीं था लेकिन बस एक बात थी । दायरे बहुत छोटे भी हो सकते हैं और बहुत बड़े भी । अक्टूबर के 'हंस' में डायरी के कुछ पन्ने प्रकाशित हुए । जो कविताएं आनन फानन में इकट्ठा की थीं, और जो एक साथ कई सारी पत्रिकाओं को भेज दी थीं, उनमें से 'वागर्थ' का जवाब आया । उन्होंने अपने यहाँ दिसंबर अंक में तीन कविताओं को स्थान दिया । बस इसी लिहाज से इस साल को थोड़ा ठीक माना जा सकता है । जिन्हें हम कई सालों तक पढ़ते हुए आ रहे थे, वहाँ लेखक और कवि की तरह प्रकाशित होने में ऐसा कुछ है, जिसे अभी भी किसी शब्द में कह नहीं पा रहा हूँ । जो सब इस साल के बहुत पहले शुरू हो जाना चाहिए था, वह क्रम अब जाकर बनता हुआ दिखता रहा । बावजूद इसके लगा जैसे लिखना थम गया । मेरे अंदर उस खाली जगह को तस्वीरों से भरने की हारी हुई कोशिश चल रही है । आप जब शब्द में कुछ नहीं कह रहे होते, तब कैसे भी करके उन्हें किसी बहाने से तसवीरों में भर और बंद कर लेना चाहते हैं । 

मुझसे यह कोशिश कितनी और कैसे हुई इसका कोई हवाला या तफ़सरा यहाँ देने नहीं जा रहा । बस इतना ही कहने जा रहा हूँ, के जो जगह जिसकी है, उसे वही भर सकता है । इसके अलावे कुछ नहीं । सब बेकार की बात है । फिर इधर एक और बात जो मुझमें दिखाई देने लगी वह आदत की तरह बनती गयी । वह है किताब को पढ़ने के बजाए पता नहीं आगे भविष्य में आने वाले किस खाली और बेकार समय के लिए इकट्ठा किए जा रहा हूँ ? पढ़ने के लिए अभी वक़्त नहीं है, ऐसा कहे बिना उन अधूरी किताबों को शुरू करने और उन्हें कई घंटों बाद खत्म कर लेने का मुदित भाव मुझमें कभी उतर ही नहीं पाया । यह जो मेज है, जिसके सामने बैठकर लिख रहा हूँ, यह ऐसी बिन पढ़ी किताबों से अटी पड़ी है । कुछ अंग्रेज़ी में है, जो सिर्फ़ मतलब भर की आती है और उसी अनुपात में टूटी फूटी वाक्य संरचना में अपनी बात को दूसरों तक पहुँचा लेने की क्षमता को अपने अंदर बना पाया हूँ । उस हिसाब से हिन्दी की किताबों को उँगलियों पर गिनने के बाद भी पढ़ न पाने का संताप मुझमें हमेशा रिसता रहा है । कुछ न होता तो कम से कम इन्हें तो न जाने कब का पढ़ जाना था । वह भी मुझे से नहीं हुआ । यह जो न पढ़ पाने की अक्षमता मुझमें घर कर गयी है, इसमें एक तरह की काहिली और पढ़ने की तय्यारी का अभाव साफ़ तौर पर नज़र आता है । मन कभी उस तरह से किसी किताब के लिए किसी भी पूर्वपीठिका का रच ही नहीं पाया । इसी में एक वक़्त ऐसा आया जब ख़ुद को समझाना पड़ा के बेतहाशा किताब के जंगल में दौड़ने से बेहतर होगा, जितनी जिल्दों को अभी तक इकट्ठा किया है उन्हें न केवल तरतीब से लगाने का सहूर अपने अंदर पैदा करूँ बल्कि उनकी असल में मुझे क्या ज़रूरत है, जैसे सवालों से भी ख़ुद को दो-चार किए बगैर उन्हें सिर्फ़ खरीद लेने से बात नहीं बनेगी न इससे कुछ साबित हो जाने वाला है ।

यह उन किताबों का आकर्षण और उनके प्रति भावुकता का मसला नहीं न ही यह इन दोनों बिन्दुओं से वह समझ में आने वाला है । इसे एक तरह का नशा कहेंगे । पर इससे भी पहले मुझे पता है, मैं इसे क्या कहना चाहूँगा । यह बहुत निजी और व्यक्तिगत किस्म का विवरण या विश्लेषण कहा और समझा जा सकता है । जिसमें कुछ और साबित करने से ज़्यादा सिर्फ़ इतनी सी बात है, जिसमें मैं ख़ुद को यह यकीन दिला लेना चाहता हूँ कि अपनी मर्ज़ी से, किसी से बिना पूछे मैं भी पैसे खर्च कर सकता हूँ । अगर मुझे मेरी मर्ज़ी से जिन चीजों पर मेरा दिल असल में खर्च करना चाहता था, उन पर मुझे उस रुपये को खर्च नहीं करने दिया जाएगा, तब तब उसे इसी तरह किताबों में बदलता रहूँगा । इसमें एक और जो बात छिपी हुई है वह यह कि इसे आज से पहले कभी किसी के सामने खुले तौर पर न स्वीकार किया था न इस इच्छा या अनिच्छा को प्रकट किया था । शायद यही वह वजह हो, जिसके कारण मेरा सारा ध्यान उन्हें सिर्फ़ अपने इर्द गिर्द इकट्ठा करने पर चला गया और मैं कभी ख़ुद को उन्हें पढ़ने के लिए तय्यार नहीं कर पाया ।

तब यह जिज्ञासा सहज ही उठती है कि वह वक़्त जो किताब पढ़ने में भी नहीं लगाया, वह आख़िर गया कहाँ ? फ़िल्म देखने और घूमने, मोबाइल देखने और थोड़ा बहुत लिखने में । कितनी आसानी से इन चार क्रियाओं में यह घड़ियाँ समा गईं । क्या इनका कोई तफ़सरा इस काबिल नहीं के मुझे उन पर कुछ देर और रुकना चाहिए? यह जो तकनीक है, जो अब हमारे हाथों, जेबों में हरदम मौजूद है, जिसे हम मोबाइल के नाम से पुकारते हैं, यह सच में ऐसा थलचर है, जो हमारे सोचने समझने से लेकर उन्हें नियंत्रित करने की स्थिति में है । बुद्धि का व्यवस्थापक होने तक का यह सफ़र इसने हमसे होकर तय कर लिया है । उस अमेरिकी समाजशास्त्री का नाम अभी मुझे याद नहीं आ रहा जो इस 'सेकेंड सेल्फ' कहती हैं । 

हमने अपने व्यक्तिव का आरोप इस कदर कर दिया है, जहाँ यह हमें ख़ुद का विस्तार लगने लगता है । हमारा बर्ताव इस मशीन, जो दरअसल में एक रोबोट है, के लिए बहुत घातक किस्म की शक्ल अख्तियार कर चुका है । कभी-कभी सोचता हूँ, जब यह मोबाइल नहीं थे, तब रात में उठना हुआ तो बाथरूम तक गए और लौटकर चुपचाप बिस्तर पर लेट गए। और अब ? इस रात में उठने और बाहर से कमरे तक आने के दौरान और वापस सोने की तय्यारी के बीच एक बार मोबाइल स्क्रीन पर पहले वक़्त देखना फ़िर वाईफाई या मोबाइल डेटा को ऑन कर उस पर आए 'नोटिफ़िकेशन' को देखने की जो आदत बन गयी है, इसने हमारी रातों को किस तरह बदल दिया है ? सब सोचते होंगे हम अपने मन मुताबिक इसका इस्तेमाल कर रहे हैं । यहीं कुछ ऐसा है जो मुझे भी समझ नहीं आया । मेरे पास तो लैपटॉप भी है । यह भी क्या उसी विस्तार का हिस्सा बन चुका है ? जिस वक़्त यह बात कह रहा हूँ उसी कीबोर्ड पर उँगलियों से इन पंक्तियों को लिखता जा रहा हूँ । मुझे हमेशा से लगता था, यहाँ, जो हम बिना कलम के लिखे दे रहे हैं, वह ज़रूर हाथ की लिखाई से कुछ कमतर होगा । बहुत अरसा इसी खयाल के साथ बीत गया । पर यह मैं ही हूँ जो गूगल कीप और माइक्रोसॉफ़्ट के 'वन नोट' में न जाने कितने रफ़ ड्राफ़्ट छोड़ आया हूँ । कुछ ऐसे अतिरेकी क्षण और दबाव जिनमें लिखे बिना नहीं रह सका, उन्हें वहाँ कह देने की कोशिश करता रहा । मोबाइल कभी इस फेहरिस्त से निकल भी पाएगा, कह नहीं सकता । कुछ जिन्हें अभी भी अपनी नज़रों के सामने रख लेने चाहता हूँ, उन्हें वहाँ से हु बहू नकल कर कागज पर तारीख के साथ उतार लिया करता हूँ । क्या पता वह किस विस्तार को अपने अंदर समेटे हुए हों ।
(क्रमशः)

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