आठवीं सालगिरह

पता नहीं क्यों आज लिखने का मन हो गया । जब से यहाँ आया हूँ, यहाँ ढलने और इस वक़्त को पकड़ने में बहुत सा वक़्त खर्च होने के बाद भी ज़्यादा कुछ समझ आया हो, कह नहीं सकता । यह दो दिन, एक पिछला और एक आज का, दोनों दिन मेरे अंदर इसी तरह उतरते से लगते हैं । मेरी पहली जगह, जहाँ सबके सामने कहने का सहूर सीख रहा था, अगर वहाँ लगातार कहता रहता तो आज आठ साल पूरे हो जाते और नवें साल में प्रवेश कर जाता । कितना तो कभी कह ही नहीं पाया । कहा भी क्या, ख़ुद को आईने के सामने रखकर कहने और ख़ुद को संभालने में ही सारे शब्द खर्च हो गए । 

आज सोचता हूँ, वह ताप कहाँ चला गया ? उसकी तासीर में कुछ ऐसा था, जिसमें कहने के सिवाय मेरे पास कोई चारा नहीं था । नाम भी क्या ख़ूब था उस जगह का । करनी चापरकरन । कुल पाँच साल (2010-2015) वहाँ लगाए और जैसे होता है, हम बिन बताए कहीं के लिए निकल पड़ते हैं, मैं भी उसे छोड़कर आगे बढ़ गया । आज मैं उन वजहों को बहुत पास से महसूस करता हूँ तो लगता है ठीक ही था वहाँ से चले आना । क्या करता वहाँ रुके रहकर । मेरे लिए यह भावुकता आत्म प्रगल्भता का दिन भी है । कहाँ से लाता था कहने का कच्चा माल ? क्या कहा और कितना सारा अनकहा रह गया ? कौन से बिन्दुओं और शीर्षकों को अपने अंदर ही रहने दिया ? स्मृतियों को टटोलना मुझे मेरी नस पकड़ लेने जैसा लगता । इन्हीं में खोया सा रहता । कहता । जो किसी सोखते की तरह जज़्ब किया था, उसे कह डालने में ही सब था । जैसे उस अतीत में ही कहीं ठहर कर उसे दोबारा से रचने का लोभ और इच्छा मुझे और मेरे लिखे हुए तिलिस्म को बनाए रख पा रही थी । वर्तमान से भागता हुआ कहीं इसी ओट में छिप सा गया । अभी भी मुझे कोई ऐसा नहीं मिला है जो मेरी इस ज़िम्मेदारी को उठा सकता हो । शायद बहुत लंबे समय तक मुझे यही काम करते रहना होगा । इसे करते रहने में मुझे कोई डर, भय या आपत्ति नहीं है बस कभी कभी लगता है यह नशे की तरह मुझपर कब तक छाया रहेगा । पीछे जो बीत गया, उसे लिखने कहने और उन घटनाओं, दिनों, पात्रों को कह डालने की बाध्यता मुझे किस तरह रच रही होगी ? 

यह सवाल मेरा पीछा कभी नहीं छोड़ता । कहीं दब्बू किस्म का चुप्पा, ख़ुद में खोया सा रहने की आदत में डूबा हुआ मैं किस भी तरह यहीं इस समानान्तर दुनिया में हमेशा के लिए बना रहना चाहता हूँ ? इस सवाल का कोई एक जवाब मेरे पास नहीं है । शायद यह किसी तरह की ज़िद की तरह ही है । ऐसा क्यों हुआ होगा कि अतीत इस कदर मुझे खींचता हुआ सा प्रतीत होता है ? उसके आकर्षण से बच पाना मेरे लिए असंभव है । शायद उसमें जो होना है, वह हो चुका होता है और उसमें किसी तरह की अनिश्चितता की कोई संभावना नहीं है । उसे किसी भी तरह से बदला नहीं जा सकता । हम यदि उसके साक्षी थे या वह किसी ने हमें बताया है, उसे लिखकर अपने पास रख लेने में जो सुख है, उसे हमेशा महसूस करते रहना चाहता हूँ । लेकिन क्या भविष्य, जो अनदेखा है, जो अभी अप्रकट है, जो पूरी तरह से मेरे सामने नहीं खुला है, इस वजह से खुद को पीछे मुड़ता हुआ लगता हूँ ? मेरी पीठ क्या भविष्य की तरफ है ? इसे इस तरह नहीं कहा जाना चाहिए । यह ऐसा है भी नहीं । मुझे सिर्फ़ इतना लगता है, व्यक्ति का इतिहास उसके परिवेश को अपने अंदर साझा करे रहता है । वह उसका भी उतना ही अतीत है, जितना वह किसी व्यक्ति का है । सतह पर भले यह एक छोटी इकाई के रूप में व्यक्ति को चुनने जैसा लगे पर यह उस समय और देशकाल को भी व्यक्त करता है ।

ऐसा भी नहीं था, हमेशा मैंने अतीत में जाकर ही सब देखा और उन्हें ही अपने कथ्य का विषय बनाया । वर्तमान की एक समझ मेरे अंदर भी लगातार ख़ुद अपना विस्तार पा रही होगी । एक नज़र जो हम सब बना पाते हैं, उसी के सहारे वह सारी घटनाएँ अपने अर्थों को खोलती हैं । जो विश्व दृष्टि (वर्ल्ड व्यू) होना चाहिए शायद वह थोड़ा बहुत मुझमें भी था । अभी भी है पर उसका रूपाकार किस तरह बना रहा और कितना बिगड़ा इसका विश्लेषण अभी तक मेरे पास नहीं है । बस इतना इशारा भर करना चाहता हूँ कि शुरुवाती दौर के बीत जाने के बाद जैसी परिस्थितियाँ बनीं उनमें पता नहीं क्या हुआ आत्मकेन्द्रित व्यक्ति की तरह मेरी छवि उभरती हुई लगती है । सतह पर यह ऐसी ही थी । एक लड़का किसी खाली से कमरे में बैठा अपने एकांतिक क्षणों को सिर्फ़ अपनी कसौटी पर कस रहा था । नौकरी थी नहीं । शादी की बात चल रही थी । कितने दिन दोनों चीजों को टाला जा सकता था, इसका कोई ख़ाका मेरे पास उपलब्ध नहीं था । बेरोजगारी में दुनिया सिर्फ़ स्याह दिखे ऐसा नहीं है । वह मेरे लिए अमूर्त होती गयी । मेरी हर असफलता और कुछ न कर पाने के निकम्मेपन के बोझ से दबता हुआ एक अदना सा लेखक किस तरह लिख सकता है वह दौर इसका दस्तावेज़ है । नौकरियाँ जितनी होतीं, उससे कहीं ज़्यादा अभ्यर्थी उस बाधा दौड़ में दौड़ते । कुछ ही अंतिम रेखा तक पहुँच पाते । मैं अभी तक वहाँ नहीं पहुँच पाया हूँ । मुझे इंतज़ार है, उस एहसाह को अपने अंदर खून की तरह धमनियों में महसूस करते हुए लिखने के उन पलों का, जब कहीं किसी मुकाम पर सब जीत लेने के बाद उत्साह में कुछ भी कह देने के बाद सब ख़त्म हो जाता है ।

दरअसल यह अपने अंदर लिखने के अंतिम क्षणों को देखने जैसे किसी पल की कल्पना करने जैसा है । कोई तो ऐसा पल होगा, जब मेरे अंदर यह लिखना हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएगा । उसका मरना कहीं से भी मरने जैसा नहीं होगा । यह स्खलन जो मेरे भीतर किसी लावे की तरह फूट पड़ता है, उसके सो जाने से पहले करवट लेकर लेट जाने जैसा होगा । क्या कभी ऐसा हो पाएगा, मैं नहीं जानता । तभी एक दिन ऐसा आया, जब करनी चापरकरन हमेशा के लिए बंद कर दिया । वह प्रक्रिया जो मेरे अंदर अबाधित थी, उसे इसी बहाने से स्थगित करने की इच्छा को पूरा कर लिया । वह अपने चरम पर था, ऐसा नहीं है । लेकिन यह भी सही है उतनी ईमानदार कोशिश उसके सामने किसी में नहीं थी । उसके जितना ताप कहीं नहीं था । उन अतिरेकी पलों को लिखने, वर्जनाओं को कह देने का साहस कहीं नहीं था । उसके कई हिस्से अभी भी अपठित रह गए हों, पर एक कल्ट बन जाने से पहले उसका रुक जाना हिम्मत से भरा आत्मघाती कदम था । कोई उसे याद करता, इससे पहले वह अतीत बन गया । एक यही अतीत है, जिसमें लौट कर जाने की मुझमें न इच्छा है, न ही अब इतनी हिम्मत बची है । वह अपने वक़्त का एकलौता मीर था । जिसे किसी ने नहीं देखा ।

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