एक पन्ना अश्लील

बदरी छाई हुई है। जी हाँ, दिल्ली के आसमान पर बादर हैं। अलसाने वाले मौसम की आहट में हम सब किसी घुन्ना इश्क़फ़रेब की तरह बिस्तर पर नंगे पड़े बस इंतज़ार कर रहे हैं। कोई तो आएगी। इसी ख़याल को अपने मन में बुनता हुआ वह आसमान से गिरती बूँदों को देखने लगा। उसकी शक्ल बिलकुल मेरी शक्ल में बदलने लगी। मैं कुछ नहीं कर पाया। शायद घड़ी के किन्हीं खास पलों में हम सब इन के बगल लेटे हुए मिलते हैं। कोई नंगे बदन हमारे मन में चलते हुई आती होगी। कल सिनेमा पर देखी हीरोइन की तरह। करीना। नहीं नहीं करीना नहीं। थोड़ी बूढ़ी लगती है अब। श्रीदेवी टाइप। आलिया भट्ट। साड़ी में। ‘थ्री स्टेट्स’ में थी जैसे। दो उन दोनों के तीसरा मेरा यूपी। हो गए न तीन स्टेट। आएगी साड़ी में जाएगी बिकनी में। नंगी। मैं भी तो बिलकुल नंगा हूँ, विमर्श वाली बहन जी। मुझे नहीं देख रहीं आप। जो पहली पंक्ति से वहीं चादर ढके लेटा हुआ हूँ।

अगर तुम्हें लग रहा है, शिफॉन की भीगी साड़ी में चिपके बदन देखने के आदी हम पुरुष ‘स्टीरीओटाइप’ में सोचते हैं तो रेगिस्तान में भी हम यही कल्पना कर सकते हैं। वैसे यह कल्पनाएं हमने नहीं रची हैं। हमें भी हमने ख़ुद नहीं गढ़ा है। कौन है, जो हमारी कल्पनाओं को हमारे मनों में भर रहा है? हमें ऐसा ही बनने को कह रहा है।

पता नहीं।

{साल के ख़त्म होते-होते किसी क्षण, ऐसे भी लिखा है. कम अश्लील पन्ना }

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