आज दिन

कभी-कभी कोई दिन ऐसा भी होता होगा, जब हम घड़ी भी अपने साथ नहीं ले जा पाते होंगे. यह भूलना नहीं है. ख़ुद जानबूझकर छोड़ देना है. यह मेरी मर्ज़ी नहीं थी कि इस भीड़भाड़ वाले दिन, मैं जमा मस्जिद से एक स्टैंड पहले खड़ा था और मेरे पास न तो घड़ी थी न मोबाइल. इसे ही उस दिन एक परिचर्चा में एक अमेरिकन समाजशास्त्री हमारा 'सेकेण्ड सेल्फ़' कह रही थीं. हमने इस तकनीकी यंत्र पर अपने 'आत्म' का आरोप इस कदर कर दिया है कि हमारी दुनिया इसके बिना अधूरी-सी लगने लगती है. तब यह उसे बना ही नहीं रहा होता बल्कि उसे नियंत्रित भी कर रहा होता है. पर आगे आने वाले समय में कहीं ऐसी किश्तें भी होंगी, जब हम हफ़्ते में दो दिन, इन मशीनों के चंगुल से निकलने के लिए अपनी मर्ज़ी से इन्हें तालाबंद लॉकर में रखकर इस दुनिया में शामिल होने निकल जायेंगे. भले दुनिया में यह विचार तबतक अपनी पकड़ न बना पाया हो, तब भी हमें अपनी दुनिया में ऐसा करना होगा. मेरे लिए यह काम नवोदय विद्यालय समिति कर चुकी थी. उसकी दुनिया में कुछ भी लेकर नहीं जाना था. बस पहचान के लिए पहचानपत्र से काम चल जाने वाला था और एक रेनॉल्ड्स का नीली स्याही वाला पैन उस लड़ाई में बतौर हथियार काम आने वाला था.

देवेश अभी तक इस स्टैंड पर नहीं पहुँच पाया था, जिसपर पहुँचने के बात हम कल रात तय कर चुके थे. वक़्त अपनी गति से चल रहा था और मेरे पास उसे मापने के लिए कोई युक्ति नहीं थी. बस इंतज़ार था. वह आये तब हम आगे चलें. उसका मन बल्लीमारान जाकर ग़ालिब की हवेली देखने का था. मैंने अभी तक सोचा नहीं था कहाँ जाना है? मेरे हिस्से उस भीड़ का अकेलापन था, जोकि ठंडियों के लिए कपड़े, जूते और बाकी सामन खरीदने में व्यस्त थी. इस भीड़ को आवारा भीड़ नहीं कहा जा सकता. कोई भीड़ आवारा नहीं होती. उसमें शामिल हर व्यक्ति का कोई न कोई लक्ष्य होता है. वह लक्ष्य उसने अपनी मर्ज़ी से तय किया है. जब यही लक्ष्य कोई दूसरा उसके लिए तय करे, तब वह भीड़ आवारा कही जा सकती है, पर तब भी उनका एक लक्ष्य उन्हें नियंत्रित करेगा, भले वह उसका उपयोग किसी विध्वंसक कार्य के लिए करने में किया जाये. परसाई इन ख़तरों पर क्या कहेंगे, पता नहीं. 

खैर, मैंने भी इंतज़ार से खीजना शुरू नहीं किया. वहीं डटा रहा. क्योंकि मुझसे संपर्क करने का एक ही तरीका अब बचा था कि वह मुझतक पहुँचे. इसलिए एक तरह की संतुष्टि थी. एक ऐसा पता और वक़्त जो दोनों ने मिलकर तय किया है. ऐसा हमारा समाज आज भी करता होगा. भले इतनी आपाधापी में वह कहीं खो गया हो. कुछ लोग तो होंगे, जो दिन तारीख तय करते होंगे और बिलकुल उन्हीं दिनों में एक दूसरे से मिल जाया करते होंगे. क्योंकि हमें लगने लगा है, हम तेज़ी से भाग रहे हैं, इसलिए हमें अपने साथ भागने वाली मशीन चाहिए. कब हम कहाँ होने वाले हैं, यह हमें भी नहीं पता इसलिए विज्ञान ने इतने शोधों के बाद इसे ईज़ाद किया है. पर हम भाग कर कहाँ जा रहे हैं, इसका कोई जवाब किसी के पास नहीं है. किसी को नहीं पता हम कहाँ पहुँचना चाहते हैं. किसी को भी नहीं.

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