उदास शाम का लड़का

यह कैसे हुआ, वह अभी भी पपीते के पेड़ को देख रहा है. वह ज़मीन पर नहीं है. किसी गर्म दुपहर के बाद ठंडी छत के एक कोने में स्थिर खड़ा हुआ है. वह ख़ुद को उस पेड़ में झाँकता सा दिखा और उसकी आँखों के किनारों से आंसू आने लगे. यह दृश्य धुंधला ज़रूर है. पर यह ऐसे ही घटित हो रहा है. इसे अपने अन्दर न जाने कितनी बार महसूस करते हुए सामने लगे पौधे में केंचुए से लेकर कछुए, छिपकली, तिलचिट्टे को बार-बार देखता रहा. यह कोई और नहीं मेरे भीतर बैठी कोई बात है. उसका होना अपने होने के लिए ज़रूरी है. 

उस पर धूप हो, पारा चालीस के पार हो, छत सूरज की किरणों से झुलस रही हो, तब दिल बर्फ की तरह जमा नहीं रह सकता. वह बर्फ की तरह पिघलना शुरू कर देगा. हम सब भी मोम की तरह पिघलते होंगे. जुगनू की लौ से ऊष्मा पाती शाम की ठंडी हवा, गर्म होकर बिखर जाती होगी. 

पता नहीं, वह वहाँ क्यों बैठा हुआ है. उन खुरदरी पीठों पर वजन लादे घोड़े सरपट भागने की कोशिश कर रहे हैं. फरों में कुछ भी मुलायम नहीं बचा है. जैसे कोई भी नरम ख़याल उसके मन में नहीं रह गया हो. वह उन थपेड़ों में, अपने अतीत की छवियों में कहीं गुमसुम बैठा, कुछ धागों को सुलझा लेने की गरज से बैठा रहा. सेमर के पेड़ की रुई उसके हाथों में फिसलती हुई बार-बार कहीं बहा ले जाती. यही तो वह शाम है, जब उसे उदास होते हुए उसकी आँखों में देखा था. उस पानी के लग जाने के बाद से वह कहीं खो गया. कोई उसे वापस नहीं ला पाया. वह लौटने के लिए नहीं, उस शाम के डूबते सूरज की लाल-लाल रौशनी में सिंदूर की तरह बिखरने के लिए छत पर आया करता. 

यह उसने तय नहीं किया. वह बस एकबार इस ख़याल को अपने भीतर उतरते हुए देखने की जिद से भर गया था. तब से, वह हर शाम उन अँधेरी होती रातों में कहीं खो जाने आता. वह रोता नहीं है. उसकी आँख का पानी गुरुत्वाकर्षण को महसूस करने लग जाती. तब नदी के पानी की तरह वह बहने लगती.

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