सुनीता बुआ

बड़े दिनों से बुआ पर लिखना टाल रहा हूँ. ऐसे ही पिछले महीने का कोई इतवार रहा होगा. पापा महरौली के किसी सरकारी अस्पताल में बुआ को देखने गए थे. सुनीता बुआ उनकी सगी बहन नहीं हैं. हमारी दादी की बहन, मतलब उनकी मौसी की लड़की हैं. दादी गाँव में थीं, उनकी बहन इस शहर में. एक शाम कपूर चाचा ने फ़ोन करके बताया, डॉक्टर कह रहे हैं, सुनीता अब बचेंगी नहीं. घर में कोई बात हुई होगी, तब मैं घर पर नहीं रहा होऊँगा. अधिकतर हम खाना खाते वक़्त ही घर पर होते हैं या ऊपर इस कमरे में. मम्मी पैर में दर्द के कारण ऊपर नहीं आतीं. पापा दफ़्तर में होते हैं. बात होती भी तो कब होती. वजह कुछ भी रही हो, नहीं जान पाया कि कौन सी बीमारी उन्हें है. पर शायद बहुत पहले हम सब मिलकर यह तय कर चुके हैं, वह कौन सी बीमारी है? अभी भी आप भोले बन रहे हैं, इसलिए कह देता हूँ. उनका लड़की होना ही सबसे बड़ी बीमारी है. लोग कहते हैं, गोरी लड़कियों को अच्छे घर मिल जाते हैं. लोग सिर्फ़ कहते हैं. मिलते नहीं हैं. उनकी शादी जिससे हुई थी, उनकी चाल में थोड़ी लचक थी. मैं लचक इसलिए कह पा रहा हूँ क्योंकि स्मृति में वह बहुत धुंधले हैं. वरना उन्हें लंगड़ा लिखता.  

दिल्ली वाली दादी के पास दहेज़ के लिए रुपये रहे भी हों, तब भी उनके लिए यही लड़का ढूंढा गया था. बम्बई में कमाने जाते थे या वहीं रहते थे, यह भी नहीं पता. हमें तो बस इतना पता है के फूफा की मृत्यु के बाद उनकी सास उन्हें घर में नहीं रखना चाहती थी. वह तो कुछ बड़े-बूढ़ों के दबाव में और लड़के को भविष्य बताकर उन्हें दाख़िल करवाया. जगह घर में फ़िर भी नहीं मिली. बुआ की सास ने छत के ऊपर बरसाती में रहने का बंदोबस्त किया. सर्दी, गरमी, बरसात कोई भी मौसम हो, वह ऊपर से नीचे नहीं आ सकती. वह वहीं रहती थीं. बिन नीचे आये.

इन हवालों में हो सकता है मैं एक पक्ष की तरफ़ झुका जा रहा हूँ. पर जो सुना और देखा उसे कहने में मुझे नहीं लगता कोई ऐसी बात है, जिसे नहीं कहना था. हाँ, संवेदना को महसूस न कर पाना दूसरी बात है. इन तथ्यात्मक लगती सूचनाओं को किस तरह कह पा रहा हूँ, मुझे भी नहीं पता. बस कहे दे रहा हूँ. मुझे यही आता है.

बुआ की एक लड़की थी. हमें कभी राखी बाँधने लाईं होंगी, याद नहीं आता. पर शादी के पहले. बहुत पहले की तस्वीरों में कट्टइया(पीले जैसे) रंग के सूट में लाल दुपट्टा ओढ़े, हमारे साथ एलबम की उन तस्वीरों में मौज़ूद हैं. वही दिन थे, जिनमें बुआ के साथ सबसे पहली बनी स्मृतियों में शब्द नहीं है, उन तस्वीरों की ध्वनियाँ हैं. मम्मी बताती हैं, शायद शादी होने वाली थी और वह हमारे यहाँ आयी थीं. तस्वीरें कहती हैं, हम सब दिल्ली घूमने निकले हैं. बड़ौदा हाउस से लेकर लोटस मंदिर. क़ुतुब मीनार से लेकर इस छत की तस्वीरें. कभी-कभी अभी भी मस्तिष्क में कौंध जाती हैं. ऐसे ही एक याद है, जिसमें हम नीचे घर में हैं. वे नर्सरी टीचिंग वाले किसी कोर्स या बाल भवन से कुछ सीख कर आई हैं और अपने बैग में से सामान निकाल निकाल कर उन नरम तारों और कपड़ों से फूल बना रही हैं. हम उन पीले फूलों को सूरजमुखी समझ रहे हैं या गुलाब की पंखुड़ियाँ, याद नहीं आता. 

वे तब बहुत पतली थीं. सुंदर दिखती थीं. लडकियाँ अक्सर अपने जीवन में कभी न कभी सबसे ज़यादा सुन्दर दिखती हैं. यह शायद उनके वही वाले दिन थे. शादी से पहले. ज़िन्दगी के इस जंजाल में फँसने से पहले. शादी के बाद तो वह कभी इन उलझ गए तारों को सुलझा भी नहीं पायीं. अभी मई जून की बात है. बाहर एक रात ख़ूब बारिश हो रही है. हम बात कर रहे हैं, अब आम की मिठास चली जायेगी. तभी सिर पर दस किलो की आम की पेटी लिए भीगते हुए बुआ अन्दर दाख़िल होती हैं. उनकी उमर इतनी नहीं थी, फ़िर भी कृशकाय लग रही हैं. शायद थीं भी. भीगने के कारण काँप रही थी. मम्मी के कहने पर हमने पंखा बंद कर दिया. मम्मी बोलीं, कपड़े बदल लो.

उन्हें सुनाई नहीं दिया. हम तो बस सुनते थे कि ससुराल से भगाने के लिए इनको पीटते भी थे, उन्हीं किसी एक किश्त में उनका कान भी जाता रहा. अब वह किसी की कोई बात नहीं सुन पाएंगी. कभी भी नहीं. जिस इतवार पापा बुआ को देख आये थे, तभी कह रहे थे, ज़्यादा दिन बचेंगी नहीं. उसी हफ़्ते वीरवार शाम कपूर चाचा का फ़ोन आया. पापा को बुला रहे थे. बुआ सुबह ख़त्म हो चुकी थीं. अस्पताल से लाकर शमशान घाट ले आये थे. पापा जा नहीं पाए. जैसे मन ही मन सोचता रहा. पापा के साथ अस्पताल जा नहीं पाया. आख़िरी बार देख तो लेता. पर नहीं गया.

(इस तस्वीर में हमारी बुआ नहीं हैं. पर जो भी होंगी, वह किसी न किसी की बुआ तो ज़रूर लगती होंगी.)

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