गुजरती रात

रात सवा नौ बजे हैं और लिखने का मन कतई नहीं है. कुछ यादें हैं, जो बेतरह अन्दर चल रही हैं. कुछ अनकही सी. कुछ बीत गयी. पर एहसास है के यहीं आस-पास है. अभी कितना ही कुछ नहीं कहा है. जितना कहा है उसमें भी एक तरह के रंग भर दिये हैं जैसे. जो नहीं कहता वह भूलता जाता हूँ. जो कहीं लिख छोड़ा है, वह कौन सा दिमाग पर टंगा रहता है. पर एक दिन आएगा, जब हिसाब करते हुए उन बातों को भी लिखना होगा, जो अभी तक कहीं नहीं कही हैं. कितने कतरे ऐसे होंगे, जिन्हें अन्दर ही अन्दर दोहराते हुए चबा गया होऊँगा. कितनी कतरनें जेब में रखी बस टिकट की तरह पानी में धुल गयी होंगी. बची होंगी उनकी रंगत।

पर सबसे पहले देखना होगा यह कौन है अन्दर जो बाँट देता है. किसे कैसे कहना है, किसे बिलकुल भी नहीं कहना है.

वो मैसूर जाती रेलगाड़ी में बगल की सीट पर इनफ़ोसिस की किसी लाइब्रेरी की किताब पढता हुआ लड़का. इस नवम्बर में देहरादून जाती बस में किसी ऑनलाइन प्रोजेक्ट पर बात करते हुए दो दोस्त. हमारा जून में बैंगलोर जाना. वर्धा से लौटते हुए तस्वीरों में रह जाना. इधर ग्यारह साल बीत जाने के बाद दोबारा नानी के आधे बिक चुके घर को देखते हुए डूबते जाना. मामा पता नहीं लखनऊ में कहाँ काम करते होंगे, सोचते हुए अमीनाबाद से लेकर इंदिरा नगर चारबाग कैसरबाग बस डिपो पर खो जाना. हो सकता है, यहाँ मैं चाह कर भी उन बातों का ज़िक्र भी न कर पा रहा हूँ, जिन्हें डायरी के पन्नों से गायब समझता हूँ. या वह अब तक मेरी नज़र में न आये हों. कुछ भी हो सकता है. यह चालाकी भी हो सकती है और बेख़याली भी. शायद इसे दोनों भी कह  सकते हैं.

मेरे अन्दर चलती हुई कितनी अनगिन बातें न जाने कहीं रह गयी हों जैसे. शायद हम सबके साथ ऐसा होता होगा. हम चाहते हुए भी कह नहीं पाते होंगे. या यह हमारी सहूलियत होती होगी. हो सकता है, यह इन सबसे परे कोई ऐसी बात होती होगी, जिसपर हमारा अख्तियार बिलकुल भी नहीं चलता होगा. सोचता हूँ, कागज़ पर लौट जाऊं. वहीं याद कर एकएक छूट गयी बात को दर्ज़ करता जाऊं. मेरे अलावा कौन होगा(?) जो मेरे अन्दर दाख़िल होकर, उन सब बातों को बाहर ला पायेगा. शायद कोई नहीं. एक दिन मैं ही इन ठन्डे दिनों में बाहर धूप के इंतज़ार में बैठ कर सब कह रहा होऊँगा. कहते कहते चुप होकर ख़ुद सुनने लग जाऊँगा।

सोचता हूँ जब कह दूँगा, तब देखूँगा कैसे रहे होंगे वह पुराने दिन? कुछ कम तो नहीं जिए? और कैसे उन दिनों में हुआ जा सकता था? अगर हुआ जा सकता था, तब आगे के लिए हो सके तो ख़ुद में कुछ बारीक तब्दीलियों को करके दोबारा उन जगहों पर हो आएँगे. किसी सपने की तरह अपने सिस्टम पर उन्हें रिवाइंड करेंगे. गूगल अपने यहाँ हर साल ‘यू ट्यूब’ पर करता है, एक बार क्या मैं नहीं कर सकता? अगर नहीं कर पाया तब भी एक बात साबित हो जायेगी. हम कितना भी चाहें मशीन नहीं हो सकते. भले वैसा होने के लिए कितनी परतों के भीतर ख़ुद को छिपा ले जाएँ, पर कुछ तो होगा हमें इंसान बनाये रहेगा. हो सकता है, जिस बात को इस सदी के इस साल में कह रहा हूँ, वह इसी सदी के किसी साल किसी क्षण गलत साबित हो जाये. पर तब शायद हमारे सिर्फ़ शब्द बचेंगे. हम नहीं.

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