इच्छा

इसे एक सरल वाक्य से शुरू करते हैं. हमें सबसे पहले किसी भी इच्छा के पहली बार स्त्री-पुरुष में उभरने और अंकुरित होने की प्रक्रिया को रेखांकित करना होगा. यह आसान काम नहीं है. हम बस अपना दृष्टिकोण रख सकते हैं, जिसे ऐतिहासिक सामाजिक अंतर्क्रिया के भीतर जाँचना होगा. उसकी तार्किक संगति ही उसकी वैधता को स्थापित करेगी. जबतक कि कोई दूसरा उस अधिसंरचना को तोड़कर सामने नहीं रख देता. तो हमारे सामने एक सवाल है, जिसे एक उत्तर से देखा जा सकता है. हमारी इच्छा तभी तक निजी है, जबतक कि उसकी सार्वजनिक उपस्थिति दर्ज़ नहीं की जाती. मतलब, जैसे ही उनका ‘सार्वजनिक उत्पादन’ शुरू होता है, वह ‘निजी’ तो बिलकुल भी नहीं रह जाती.

इसे एक उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है. जिसमें कई दूसरे तफसरे भी शामिल हो गए हैं. पर उन्हें कहा नहीं जाएगा. जैसे किसी स्त्री का काजल लगाने का निर्णय उसकी सामजिक-सांस्कृतिक परिवेश के भीतर बनी इच्छा का प्रतिफलन है. ऐसे ही यह इच्छा उसकी समकालीन स्त्रियों में भी पायी जा सकती है. लेकिन जैसे ही यह ‘काजल’ किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी का उत्पाद बन जाता है और उसका बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दे, तब भी क्या आपको पहली और दूसरी स्थिति में कोई अंतर आता नहीं दिख रहा?

चलिए, एक दूसरे उदाहरण को लेते हैं. मेरे व्यक्तित्व की ख़ास बुनावट में मुझे मेरा एकांत सबसे प्रिय है. यह भाव इच्छा के रूप में मेरे अन्दर हमेशा रहता भी है. मैं अकेला कहीं खिड़की के किनारे से सारी दुनिया देखता रहूँ. यहाँ तक सब ठीक लग रहा है. लेकिन जैसे ही इस इच्छा को कोई मकान बनाने वाली कंपनी अपने बनाये घरों की यूएसपी बताकर बेचे तब क्या होगा? शायद यह इच्छाओं का दोहन है, जिसे कोई समझना नहीं चाहता.  सीसीडी से लेकर राजधानी ट्रेन के डिब्बों में यह भाव इस लिखने से पहले ही घर कर चुका है. यह जितना सतह पर किसी को चुनना लगता है, यह उतना ही निर्मम है. लवासा में वह घर भी आ गए हैं, जिनके बाहर निकलते ही झील है. बालकनी में नहाने का तालाब. बगल में फ़ॉरेस्ट रिज़र्व. यह सब किसी की इच्छाएँ ही थी कभी. नहीं?

ट्रैक पर वापस. अगर यह सीखा हुआ है, और इसे मानने में कोई हर्ज़ नहीं है कि यह सीखा हुआ ही है, तब इसे भी मानना होगा कि कोई है, जो हमें इन ‘सौन्दर्य प्रसाधनों’ की तरफ़ धकेल रहा है. भले एक पल के लिए आप यह मान भी लिया जाये कि आप जिन अर्थों के साथ उन प्रचलित सांस्कृतिक, सामजिक चिन्हों को इस्तेमाल कर रहे हैं, वह उनके रूढ़ हो चुके अर्थों के साथ मेल नहीं खाते. ठीक बात. पर ऐसे लोगों की संख्या कितनी है? क्या उस चिन्ह, प्रतीक, रूपक के साथ आपका गढ़ा हुआ अर्थ भी उसी अनुपात में दूसरी तरफ़ संप्रेषित(कनवे) हो रहा है?

क्या उतने ही तीखे, हिंसक अर्थों में हमारे अर्थ भी समाज में व्याप्त हो पा रहे हैं? अगर ऐसा नहीं हो पा रहा है और लगता भी नहीं है कि उन अर्थों, व्याख्याओं का दायरा उन प्रचलित अर्थों से कभी भी मुकाबला कर पायेगा, तब पल भर के लिए सोचिये, ऐसा कौन नहीं होने दे रहा है? उसका प्रयोजन क्या है? क्या उनमें हमारे लिए ‘सौन्दर्य’ की परिभाषा नहीं गढ़ी हुई है? वह चाहते ही नहीं कोई इस जाल से निकल पाए. कोई कैसे किसी विपरीत लिंगी की अदृश्य उपस्थिति को नकार सकता है? आप देखेंगे, हम चारों तरफ़ से घिर चुके हैं. उन्होंने हमें घेर लिया है.

{फ़िर कह रहा हूँ, इसे पिछली रात का तफसरा नहीं माना जाना चाहिए। मैं कह ही नहीं रहा हूँ. }

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