चलती हुई ठण्ड

दिन अचानक आकर डूब जाता है. जैसे सूरज कहीं डूब गया हो. इस सूरज के डूबने उतरने के समय आहिस्ते से अँधेरे के छोटे-छोटे कण इकट्ठे होकर इतने सघन हो जाते कि अँधेरा हो आता. इस अँधेरे में हमारी आँखें नहीं देखतीं. ऐसा नहीं है. वह इसी अँधेरे को एकटक देखती रहती. इसका भी किसी भाषा में कोई मतलब होगा. शायद एक रंग में कई रंग छिपे हुए होंगे. जैसे इन ठंडी हो गयी शामों को ऐसे ही न जाने कितने ख़याल आकर ठिठक जाते. पर कभी उनका लिखना नहीं हो पाता. दोस्त दूर से याद करते हों जैसे. पास आने के लिए पैसों की ज़रूरत पड़ती है. समानुपात में ज़रूरत पैसों के पास आने की भी पड़ती होगी. ज़रूरत रजाई की भी उतनी ही पड़ती है. जब हवा पैरों के पास चुपके से लगने लगे. कम्बल उघड जाये. तब हमेशा रात के ढाई और तीन के बीच घड़ी क्यों होती है, कभी पता नहीं चल पाया. हमेशा नींद पैरों के ठन्डे हो जाने पर टूटती और टूटता कोई बिखरा हुआ सपना. ठण्ड में दिमाग भी ठंडा पड़ जाता होगा शायद. इन बेखायलों में से कुछ कतरों को इन डायरियों में लिख जाने की फुरसतों से खाली होकर छत पर घूमने की बारी कभी आती ही नहीं. जैसे नहीं आती हवा में अदरक की चाय की महक. उन छज्जों से कभी.

{इन बिखरी हुई दिखाई दे रही लय और ताल में भी कोई संयोजन ऐसा होगा, जिसे कोई पारखी कभी-न-कभी देख लेगा. पर अनमने लिखने का मन नहीं है. इसलिए बीच में छोड़े दे रहा हूँ. कभी किसी और शाम के लिए.}

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