मुतमइन वो ऐसे हैं, जैसे हुआ कुछ भी नहीं

मुझे लगा था, लिख जाऊंगा। पर नहीं। नहीं लिख पाया। किसी की मौत पर लिख जाना इतना आसान नहीं। मुश्किल तब और बढ़ जाती है, जब हम जानते हों, वह हत्या है। पता नहीं पिछले शनिवार से कैसा कैसा होता गया हूँ। कितनी बार रोने को हुआ। रो न सका। रघुवीर सहाय की कविता रामदास कितनी ही बार अंदर-ही-अंदर घुटती रही। घुटन सांस में ही नहीं, अपने पूरे वजूद के साथ महसूस होने लगे, तब सच में कुछ अंदर से बाहर आकर टूट जाता है। टूटना रेशे-रेशे का है। उसे कोई हथकरधा सुझा नहीं सकता। हम चुनते हैं किसे, कैसे, कब, कहाँ मारना है। यह सभी प्रश्न तब शुरू होते होंगे, जब हमारे पर 'क्यों' का जवाब होता होगा। क्यों हम किसी को मारने के इरादे से भर जाते हैं? पर इन सवालों से पहले यहाँ देखने लायक है, उन हत्यारों में 'ख़ुद' को मिलाकर 'हम' कहना। 

क्या यह अपने साथ किसी भी तरह का अनाचार नहीं है। हम क्यों उनके जैसे हो जाएँ। हम अपने भीतर यह सारी लड़ाई लड़ेंगे। इन सवालों से जूझेंगे। कोई भी हत्या किसी भी संवाद की अंखुवाने वाली सम्भावना को खत्म कर देना है। हमें इसी ख़त्म होने से ख़ुद को बचना है। तभी हममें वे शामिल नहीं होंगे। हम दूर से आपने हत्यारों को पहचान जाएँगे। पहचान जायेंगे, तब उनके साथ बैठकर, उनसे बात करना शुरू कर देंगे।

पर हमारी हत्या तो उसी दिन हो गयी थी, जिस दिन राम जन्मभूमि के पुजारी लालदास को अज्ञात लोगों ने गोली से मार दिया था। यह हमारी अयोध्या जी, फैज़ाबाद की हत्या थी। कबर हमारी, वहीं बेगम के मक़बरे के पास है। नज़र नहीं आएगी। बस। यह हत्या के विरुद्ध हमारा छोटा-सा घोषणापत्र है। इसे माँग-पत्र भी पढ़ा जा सकता है।

आवाज़ उन्हीं की है,'राम के नाम' से..


{रविवार, रोहिथ वेमुला की हत्या के बाद, आज मंगलवार उन्नीस जनवरी, दैनिक हिंदुस्तान में यह पोस्ट, नया पाठ रच रही है। इसे आप हिंदुस्तान के पेज नंबर दस पर इसे पढ़ सकते हैं। सच में यह अनपढ़ी क़तरन ही है। }

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी