एकांत सा

हम अपना एकांत कब बुनते हैं? शायद तब जबकि हम इसकी कोई छवि अपने मन के भीतर बनाते होंगे. यह तस्वीर दूसरे से मेल कर भी जाये, तब भी उसके मानी मिल जाएँ, यह इतना आसान नहीं है. सतह पर एकांत ख़ुद को अकेले कर लेने की प्रक्रिया लगती है. पर ऐसा है नहीं. जैसे अगर मुझे बड़ी सी दुनिया के किसी ख़ास कोने में यह मिलने लग जाये, तब मैं उसके लिए कोशिश करने लगूँगा. तब भी मैं अकेला हूँ, इसका कोई प्रमाण मेरे पास नहीं होगा. क्योंकि असल में यह हमारा और सिर्फ़ हमारा मानना है कि अब हम अकेले हैं और यह हमारा बनाया हुआ एकांत है. हम उन चीज़ों का क्या करेंगे, जो वहाँ हमसे पहले भी मौज़ूद थीं. वह खाली लगता कमरा, जिसमें हम समां जाने वाले हैं, उस कमरे का भी अपना एकांत होगा, जो हमारे आने से भंग हुआ होगा. कोई सोचे, वह वहीं खिड़की के किनारे मेज़ पर पूरा दिन लिखता रहेगा और वह अपने समय को उन पन्नों पर दर्ज़ करता चलेगा. सामने कोई भी अनचाही चीज़ प्रकट नहीं होगी, तब वह उसका एकांत है. वह जो चाहे, वहाँ करने के लिए स्वतंत्र है. उसे लगता है, वह अकेला है, पर कलम उसके साथ है. वह किताब, जो वह वहाँ पढ़ने वाला है, वह भी अब अकेली कहाँ रह गयी है. उसने कभी अकेले हो जाना चुना होगा तब?

इस एकांत की निर्मिती हमारे मनों में लगातार चलती रहती है. यह स्थिर नहीं है. तरल है. हम जिस मनः स्थिती में होते हैं, उसी के अनुसार उसमें काँट-छांट करते चलते हैं. हो सकता है, यह सारी बातें आपके एकांत को भंग रही हों. या यह भी तो हो सकता है, इन पंक्तियों से गुजरने के बाद आप उसे नए सिरे से बुनने लग जाएँ? पता नहीं.

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