मेज़ पर

यह मेज़ जिसपर अभी लैपटॉप रखकर लिख रहा हूँ, वह आमतौर पर मेजें जितनी बड़ी होती हैं, उससे काफ़ी बड़ी है. आज पूरे दिन इसी के इर्दगिर्द रहा, शायद इस वजह से रात होते-होते इन बातों से घिरता गया होऊँगा. कभी मन होता है तो इस पर रखकर डायरी लिखने लगता हूँ. वैसे आजकल डायरी से बचने का मन करता है. क्या करेंगे लिख कर, ऐसी बात नहीं है. उसे लिखने के लिए जितनी पीड़ा सहन करनी पड़ती है, वह कम होती जा रही है. खैर, इस मेज़ पर वापस लौटते हुए इसे ऐसे भी कह सकते हैं के मेज़ इस कमरे की धुरी है. या कहें मेरे इस कमरे में होने का सबसे बड़ा कारण. अगर यह इस कमरे में न होती तो मैं भी यहाँ न होता.

मेज़ मेरा कबाड़खाना है. जो भी कुछ है, वह इसी पर बिखरा हुआ है. यही मेरी किताबों की अलमारी है. इस पर कई ज़रूरी कागज़ बेतरतीब बिखरे पड़े हैं. किताब एक के ऊपर एक ऐसे चढ़ बैठी है कि उसकी पीठ पर बस नाम देख कर पढ़ता रहता हूँ. निकालने का मन हो तो इतने वज़न को इधर से उधर करने की आफ़त में फंसने को जी नहीं करता. जितना तो उनको उठता धरता रहूँगा, उतने में किलो भर धूल से जूझते हुए दिल कहीं खिड़की के बाहर कबूतरों पर मचल जाया करता है. खिड़की भी इस मेज़ को यहाँ रखने की बड़ी वजह है. अन्दर से बाहर देखने की तरकीबों में सबसे शातिर इज़ाद. यह खिड़की न होती तो इस मेज़ की रौनक ऐसी न होती. यह खिड़की इसकी यू एस पी है.

पर जो बात कहने आया था वह तो इसके इश्क़ में कहीं छिपी रह गयी. अभी तक उसे कोई बेल नहीं मिली इसलिए मुझे बदतमीज़ी करनी पड़ रही है. आप जो यह तस्वीर देख रहे हैं और इसमें किताबों की दो मीनारें देख पा रहें हैं उन्हें ज़रा गौर से देखिये. यह शेखी बघारने के लिए तो कतई नहीं है. बस इस बात पर रुकने के लिए है कि यहाँ इस मेज़ पर पड़ी इन सारी किताबों की भाषा या तो अंग्रेज़ी है या हिंदी. हिंदी से मोहब्बत है पर उसमें किताबें नहीं हैं और अंग्रेज़ी मज़बूरी है पर उसमें मेरे विषय को लेकर किताबों का अम्बार लगा हुआ है. पर मेरा सवाल ख़ुद से है कि इन दो भाषाओं के अलावे वहाँ कोई और भाषा की किताब क्यों नहीं है? किसी ख़ास भाषा को पढ़ने का निर्णय अगर मेरा नहीं है, तो मेरे लिए यह निर्णय कौन ले रहा है(?), आप भी पूछिए. शायद आपको मुझसे पहले पता चल गया हो.

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