मौसम

किसी मौसम का वक़्त पर न आना हमारे लिए कोई बड़ा सवाल नहीं है. दुनिया में बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय संस्थाएँ हमारे एवज़ में यह काम करते हुए अपनी जेबें भर रही हैं. हमने अपनी ज़िम्मेदारियाँ चुपके से उन्हें सौंप दी हैं और हमें कानों कान ख़बर भी नहीं हुई है. इसी साल फरवरी में एक अभिनेता इस ग्रह के लिए अपनी चिंताएँ व्यक्त करता है, सारी दुनिया उसकी चिंता में शामिल होकर चिन्तित महसूस करने लगती है. थोड़ा ख़ोजबीन कर पता चलता है, वह इस पृथ्वी को बचाने में जुटी किसी कंपनी के ब्राण्ड अम्बेसडर की हैसियत से उस मंच का उपयोग कर गया और दुनिया ने चूं तक नहीं की. सब एक अलक्षित बाज़ार तक पहुँचने की युक्तियाँ तलाशते हैं. उसकी कंपनी हवा को साफ़ रखने से लेकर और पता नहीं कौन-कौन से उपकरण बनाने में अपनी पूँजी को लगाये हुए है. हम भी एक देश और उस पर भी पूँजीवादी मानसिकता के कम पोषक नहीं हैं. पी साईनाथ बताते हैं, इन दिनों उन कई हज़ार स्क्वायर फुट वाले आलिशान प्लॉटों की बहुत मांग हैं, जिनके साथ संरक्षित वन (फ़ॉरेस्ट रिसर्व) अटैच बाथरूम की तरह मिल रहे हैं. उनके यहाँ लवासा जैसी सुरक्षित प्राकृतिक वातावरण देने वाली कई परियोजनाओं के ब्योरें हैं, जो बालकनी में ही स्विमिंग पूल दे रही हैं और बाग़ बागीचों से लबालब भरी हुई हैं.

हवा, पानी, मिट्टी इस ग्रह को ग्रह बनाते हैं. इसके कई हज़ार किलोमीटर दूर एक सूरज है. उसकी गरमी से बचाता एक चाँद है. हमारे पूर्वजों ने कितने श्रम से उन मौसमों में बारीक अंतरों को पहचाना होगा. उन्हें नाम दिया होगा. पता नहीं हम कितनी ऋतुओं के साथ बड़े होना शुरू हुए होंगे और अब हमारे हिस्से कितने मौसम बचे हैं? हम उदासीन होकर इतने निष्क्रिय हो चुके हैं कि ख़ुद को कुछ करने लायक नहीं समझते. पर हमें अब यह सोचना होगा कि क्या असल में यह सच है(?) के हम न होते तो भी यह ग्रह होता. अब हम हैं, तो एक दिन यह ग्रह नहीं होगा. 

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