अखबार

इतवार से चार अखबार सामने किताबों के ऊपर पड़े हैं. इतना भी वक़्त नहीं मिला कि उन्हें पलट कर देख सकूँ. क्या हुआ होगा उस शनिवार दुनिया में? कोई ऐसी बात तो नहीं जो मुझे पता होनी चाहिए थी और मुझे पता ही न चली हो. फ़िर सोचता हूँ, अगर वह मेरे लिए ज़रूरी होती तो मेरे पास कहीं न कहीं से आ जाती. अगर अभी तक नहीं आई है, तब उन छपे हुए पन्नों की मेरे लिए कोई वजह नहीं है. बेवजह सिर्फ़ हम हैं. ख़ुद को जताते हुए. वह कितने ही रोज़ ऐसे बिकते होंगे और अनपढ़े रह जाते होंगे. वह ख़ुद को किसे पढ़ा ले जाना चाहते हैं? उनका पढ़ा जाना इतना ज़रूरी क्यों है? सोचता हूँ, पहले और आज में जो परिवर्तन आया है, उसे किस तरह से समझना चाहिए? मुझे नहीं पता. पर इतना तो हम देख ही रहे होंगे कि इनके बढ़ जाने से हमारी दुनिया में कोई ख़ास बेहतरी आ गयी हो, ऐसा नहीं है. उलटे हम इन सब चीज़ों से इतने घिर गए हैं कि इनसे बाहर निकलने के लिए छटपटाने लगे हैं. उनका होना न होना हमारे लिए ग़ैरज़रूरी बना रहे, इसके लिए ख़ुद से लड़ना पड़ रहा है. अगर मेरी दुनिया दस पंद्रह बीस लोगों से बनी है, तो मुझे इनकी कोई ज़रूरत नहीं है.

अखबार उनके लिए डाक हैं, जिनके पते नहीं हैं. पते हैं भी तो वह उस पते से बंधे हुए नहीं हैं. यह जितनी भी खबरे और सूचनाएं इधर उधर उड़ती भाग रही हैं, वह हरकारे की हैसियत में कभी नहीं आ सकती. उन्हें पता होता था ख़त कहाँ डालना है, जिसके नाम वह चिट्ठी है वह कहाँ मिलेंगे. कभी हमने सोचा है, क्या हो जाएगा अगर हमें कल कहीं दुनिया के किसी कोने में घटित हुई ख़बर का पता नहीं चला तो? उनका उस जगह से बाहर पता चलना किन लोगों के लिए ज़रूरी है, यह हम नहीं सोचते. सिमट कर रहने में भी एक सुकून है. कछुए की तरह. हम कछुआ बनने से डरते हैं. डरने वाले ठीक से जी नहीं पाते. ठीक से जीना है, तो कछुआ बनिए. उसे किसी अखबार की ज़रूरत नहीं है.

{पढ़े लिखे लोग अखबार को सिर्फ़ अखबार ही लेंगे. हिंदी की तीन शब्द शक्तियाँ हैं, उनका भी इस्तेमाल करके देखिये मानी कितने बदल जाएँगे. अगर आप पीछे थे तो आगे बढ़िये जनाब. फ़िर से पढ़ जाईये. }

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