इन दिनों

कल बड़े दिनों बाद पूरा दिन लैपटॉप के सामने बैठा रहा. कुछ ख़ास काम नहीं किया. बस एक ही काम में जुटा रहा. अपने पुराने ब्लॉग की सारी पोस्टें वर्ड फ़ाइल में सेव करके रख रहा था. अभी भी करीब तीन सौ बची हुई हैं. पास रहेंगी तो जब पढ़ने का मन होगा, पढ़ लेंगे. पढ़ लेंगे तो ऐसे कह रहा हूँ, जैसे हमेशा पढ़ने का ही काम रहता है. काम तो सिर्फ़ एक होता है, उसे बर्बाद करने का. कैसे-कैसे उनका कचूमर निकाल दिया जाये. यहीं कहीं पीछे देखता हूँ तो लगता है, कैसे दिन थे(?) अजीब नहीं पर सच जैसे. हर दिन का कोटा होता. शाम पानी भरने के बाद डायरी लिखनी है. दोपहर में सोना नहीं है. हमारी शामें इन्टरनेट और स्मार्ट फ़ोन से काफ़ी दूर रहतीं. हम इनके चंगुल में तब आये होंगे, जब हम अच्छी खासी उमर उन खालीपन से भरी हुई छुट्टियों को बिताने के सैकड़ों तरकीबों से भर गए थे. अब छुट्टियाँ आएँगी तो हम वो किताब पढ़ेंगे. इतने दिन जो नहीं लिख पाए, उसे कह देंगे. एक दिन में चार-चार सौ पन्ने पढ़ जाने वाले अब सिर्फ़ किताबों को खरीदने के नशे से भर चुके हैं. मेज़ अटी पड़ी है. किताबें देख देख मन भर रहा हूँ. छूने की बात तो सपने में भी नहीं आती. बस इकठ्ठा किये जा रहे हैं. सोचते हैं, किसी फुरसत में उन्हें पढ़ लेंगे.

वक़्त उतना ही है. धरती भी थोड़ा बहुत ख़िसक कर अपने अक्षों पर लगातार घूमती जा रही है. मौसमों को छोड़ कर अभी भी दिन दिन के वक़्त, रात रात के वक़्त आती रही है. शामें जैसे-जैसे घर पर नहीं बीतती हैं, वैसे-वैसे सब गड़बड़ा जाता है. कोई रोज़ाना ऐसा नहीं बन पाया, जो हमें अपने में समेट सके. कई तरह से बाहर भागे रहने का मन किये रहता है. इस बड़ी सी दुनिया को थोड़ा सा घूम कर देख लेने का मन है. पर न कभी चौबीस से तीस घंटे होंगे न हमें नासा किसी दूसरे ग्रह पर लेजाकर छोड़ आएगा. काम तो यहीं चलाना होगा. पर कैसे. यही सोच सो जाता हूँ.

आज बड़े दिनों बाद सोते हुए एक सपना याद रह गया. हम एक बहुत बड़ी छत पर थे. बहुत बड़ी. बरफ पड़ रही थी या क्या बात थी(?) बहुत कोहरा था. धुँध जैसे. बारिश का मौसम भी था. इस छत के सामने समुन्दर था. बहुत शोर कर रह था. मेरे साथ पता नहीं कौन था. शायद तुम ही रही होगी. हमें वहाँ उस बड़ी-सी छत से भी बड़ी एक नाव पेड़ की तरह खड़ी दिखाई देती है. हमारे मन में पता नहीं क्या आया कि हम दोनों उसे पानी में उतारने की सोचने लगे. यहीं सपना ट्रैक बदलता है. शायद हवा ख़ूब तेज़ चलने लगती है. या हमें पीछे से आसमान में कोई पतंग उड़ती दिखती है. अब हमारी यह नाव जो पानी में जाने वाली थी, उसे हम हवा में उड़ाने लगते हैं. अचानक हवा के तेज़ झोंके के साथ हमारी पतंग (नाव) कट जाती है. तब भी हम 'आई बो' कहते हुए ख़ूब चिल्लाते हैं. ख़ूब चिल्लाते हैं.

सपना यहीं ख़त्म हो जाता है. पता नहीं इसका ऊपर लिखी किसी बात से कोई सम्बन्ध है या ऐसे ही लिख दिया. लिख देना कभी कभी किसी याद के पौधे रोपने जैसा लगता है. यही सोच सब लिख देता हूँ. और कुछ नहीं.

(08/10/2016, दोपहर एक बजे)

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