कबूतर

सालिम अली होते, तो पता नहीं इस बात को किस तरह कहते? कहते भी या नहीं कहते, यह भी कहा नहीं जा सकता. बात बहुत छोटी-सी है. जो उड़ता है, उसे उड़ते रहना चाहिए या सुस्ताते के लिए बैठ जाना चाहिए? लेकिन इससे पहले ज़रूरी सवाल है, यह उड़ना इतना ज़रूरी क्यों है? अगर कबूतर उड़ रहा है तो उसके उड़ने के पीछे भी कोई कहानी होगी. उसके पास भी एक छोटा-सा पेट होता है, जिसे भरने के लिए कुछ दानों की फ़िराक में उसे कहीं चले जाना है. इसे दूसरी तरह भी देखा जा सकता है. कि जहाँ पेट भर रहा है, दाना पानी मिल रहा है, वहीं कोई अच्छी ख़ासी डाल या दिवार में सुरक्षित सुराख़ देखकर अपना छोटा-सा घोंसला बना लेने की समझ से वह भर गया हो.

समझ उसके खून में होगी. ऐसा हम मान सकते हैं. मान लेना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि हम कबूतर नहीं हैं और न ही कबूतरों ने ख़ुद कभी इस तरह लिख कर ख़ुद को ज़ाहिर किया है. जैसे हम उन्हें आज तक देखते आये हैं, उसी को आधार बनाकर यह बातें गढ़ी जा रही हैं.  इसलिए नीचे और इसके बगल की लाइन से शुरू होती बातें सिर्फ़ और सिर्फ़ इन कबूतरों पर ही लागू होंगी. जिन्हें इस बात पर एतराज़ है, वह अपना एतराज़ बात में जताएं. 

इस खिड़की से बाहर एक बहुत बड़ी छत है. ख़ूब बड़ी. वहीं पंछियों के लिए पानी पीने के दो बर्तन रखे हैं. रोज़ या दो एक दिन में उनके मालिक पानी बदल दिया करते हैं. पर जो बात मैं आगे कहना चाहता हूँ वह आज से दो ढाई महीने पहले की है जब हमारे बगल के घर से दो भाई निकलकर सुबह शाम यहाँ आने वाले कबूतरों के झुण्ड को दाने डालने लगे थे. तब मेरे मन में पहली मर्तबा इनके उड़ने को लेकर ख़याल आया था. यह दाने इन कबूतरों ने पहली बार कब देखे होंगे? कभी कोई एक इनका साथी उड़ता हुआ इस छत से गुज़र रहा होगा. तब उसने अपने बाकी सदस्यों को इसकी ख़बर दी होगी. यह दाने दिख जाना उनके लिए सहूलियत से भर जाने जैसा रहा होगा. अब आगे और उड़ कर नहीं जाना होगा. रोज़ यहाँ हमें दाने मिल सकते हैं. उन सबने मिलकर एक साथ यहाँ आना तय किया होगा.

इन सब भूमिकाओं के बाहर मैं बस यह सोच रहा हूँ, क्या ऐसा हो सकता है(?) कि एक दिन इतनी सहूलियत से मिल गए दाने, इन सबको उड़ना भुला देंगे? इन सबकी आने वाली पीढ़ियों को उड़ना ही नहीं आएगा? दाने से ज़िन्दगी तो कट ही जायेगी. उड़ कर किसी ख़तरे से जूझने की ज़रूरत ही नहीं रहेगी. यहीं मुझे अगला सवाल मिलता है, एक दिन ऐसा भी तो आएगा, जब यह छत नहीं रहेगी. दाने डालने वाले नहीं रहेंगे. पर तब भी यह कबूतर रहेंगे. इन्हें उड़ना नहीं आता होगा. इन्हें उड़ना फ़िर से सीखना होगा. इन्हीं दानों के लिए इन्हें फ़िर से उड़ना होगा.

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