मिट्टी

उस मेट्रो स्टेशन को ध्यान से देखने से लगता है, कितनी खोखली जगह है. हमने मिट्टी को विस्थापित कर एक दूसरी संरचना को वहाँ स्थापित कर दिया है. वह मिट्टी कभी किसी का घर रही होगी. अपनी इन छोटी-छोटी आँखों से हम जान भी नहीं पाते, वहाँ कौन रहता होगा? वह मिट्टी जब हटाई गयी होगी, तब उसे रखा कहाँ गया होगा? इस मिट्टी का पहाड़ भलस्वा के आस-पास पड़े कूड़े के ढेर से बने पहाड़ों से भी काफ़ी ऊँचा होता. क्या उसे अभी भी हम यमुना के गाद की तरह उन किनारों पर खड़े होकर देख सकते हैं? थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं, थोड़ी बहुत मिट्टी दोबारा नींव का काम करते हुए वहीं समां गयी. पर उससे भी कई गुना जादा अनुपात में उसका क्या हुआ होगा?

एक थीसिस यह कहता है कि इस शहर की दुनिया में हमने इन तारकोल वाली सड़कों के नीचे उस मिट्टी को सुरक्षित संरक्षित कर दिया है. हम इस दुनिया को जितना कंक्रीट का बनाते जायेंगे, आने वाली पीढ़ियाँ उसे उखाड़ कर फ़िर से मिट्टी को छू सकती हैं. इसका एन्टी थीसिस अभी मेरे दिमाग में बस यही है कि हम ख़ुद मिट्टी जैसे होते तो थोड़ा पानी भी सोखते, थोड़ी ज़रूरी जगह भी अपने अन्दर बनाये रखते. अगर कहना होगा तो अपने अन्दर मैं दिल को मिट्टी जैसा बना मान सकता हूँ. एक दिल ही तो है, जो कितना कुछ सोखता है.

सोखना सोख्ते की तरह नहीं है. यह उससे बड़ी बात है. जैसे यह तस्वीर नुबरा घाटी, लद्दाख की है, सिंगरौली की नहीं है. जहाँ मिट्टी नहीं है. मिट्टी होना क्या होता है(?) हम शायद वहीं जान सकते हैं, जब वह गायब हो जाये. गायब होना किसी की अनुपस्थिति की सघनता को बढ़ा देता है. व्यवस्था ने शायद इतिहास में कभी इसलिए मेट्रो स्टेशन बनाये थे कि हेरिटेज लाइन पर आईटीओ मेट्रो स्टेशन के पहले 'जेके टायर’ का नाम होगा और विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन को 'होन्डा टू वीलर्स’ के हवाले कर दिया जायेगा. उसकी सघनता कहाँ है, हम देख सकते हैं. बिलकुल सामने.

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