शहर में होना

यह कोई मेडिकल साइंस का सवाल नहीं है कि कोई हमसे पूछे और हम बता न सकें के हमारे शरीर का तापमान कितना है? आप भी कुछ-कुछ अंदाज़ा लगा ही रहे होंगे. फ़िर अगला सवाल यह दाग दे कि आपके शरीर के बाहर का तापमान कितना है? आप तपाक से उन सवालों के जवाब गणित की पहचानी हुई संख्याओं में दे जायेंगे. इन दिनों मैं यह दोनों सवाल ख़ुद से पूछने लगा हूँ. मेरे पास इसका कोई जवाब नहीं है. मैं शुरू से ही धीमा सोच पाता हूँ. इस अन्दर और बाहर के सवाल पर जब भी जवाब खोजने निकलता हूँ तब अन्दर ही अंदर बाहर आने के लिए उलझता जाता हूँ. मेरे अन्दर अपने आप कुछ दृश्य चलने लगते हैं. 

एक दृश्य में रात नौ तेईस की मेट्रो (होन्डा टू विलर) विश्व विद्यालय स्टेशन से छूट गयी है. इंतज़ार कर नहीं पाता. छटपटाहट बढ़ती जाती है. आज भी देर से घर पहुँचूँगा. यही सोचता हुआ इंतज़ार में सबकी तरह सुरंग में झाँकने लगता हूँ. पता नहीं वह सब भी यह देख कर डर जाते होंगे या नहीं. पर मुझे कुछ होने लगता है. उन पीली रौशनियों में गरमी भाप बनकर उड़ने लगती है. सुरंग एकदम किसी भट्टी की तरह तप रही है. पानी दिख नहीं रहा है. पर वह पानी ही है. हवा में नमी की तरह तैरता पानी. पानी जिससे हम ठंडक महसूस करते. वह उड़ रहा है. 

विज्ञान की सबसे उन्नत तकनीकों का इस्तेमाल करके हमने इस धरती के नीचे सुरंगे बनाकर उन्हें रेलगाड़ी के दौड़ने लायक बनाया. कंक्रीट की मोटी-मोटी दीवारों से उन परतों को आपस में मिलने से रोक दिया. किसी पेड़ की जड़ की अब ज़रूरत नहीं है. मिट्टी का कहीं नमोनिशान नहीं है. उसके मुलायम रेशों में कोई केंचुआ नहीं है. कोई झींगुर नहीं है. भूकम्प भी आएगा तब भी यह संरचना बच जायेगी. वह पानी जो यही कहीं इतने नीचे किसी कुएँ से निकल आता, वहाँ इक्कीसवी सदी में हमारी ट्रेन कुछ देर से आ रही है. जो स्वाभाविक था, हमने उसे अस्वाभाविक बना दिया.

थोड़ी देर बाद लगता है, क्यों परेशान हो रहा हूँ, मुझे भी इस सुरंग और यहाँ दौड़ती ट्रेन से कोई ख़ास दिक्कत होनी नहीं चाहिए. सब कितने थके से बुझे-बुझे चेहरों के साथ अभी तक नहीं आई मेट्रो का इंतज़ार कर रहे हैं.

पर क्या करूँ आज सुबह पौने छह बजे नींद खुल गयी. खिड़की के बाहर देखा. लगा कुछ छूटता जा रहा है. यह शायद इस मौसम के आने से कई साल पहले हमारे बचपन की कोई याद रही होगी. हम अक्टूबर के इन दिनों में हाफ स्वेटर पहन कर मूंगफली खाने लग जाते थे. यादों का लगातार छूटना इस समय की सबसे त्रासद त्रासदी है.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उदास शाम का लड़का

मोहन राकेश की डायरी