कल का नक्शा

ज़िन्दगी में एक दौर ऐसा भी आता है, जब हम ठहरना चाहते हैं. ख़ूब भागादौड़ी के बाद कोई ऐसी जगह हो, जहाँ हम रुक सकें. रुकना इतिहास में हमेशा से निर्णायक बिंदु रहा है. जब हम रुके, तब हमने दुनिया को इस तरह से रचा. उसके तंतुओं को अपनी मर्ज़ी से बनाने की कोशिश की. मैं भी अब थोड़ा धीमा पड़ना चाहता हूँ. ठहर कर जितना समझा है, उससे अपनी दुनिया का खाका खींचना चाहता हूँ. जितनी भी बातें समझ पाया हूँ, उन्हें तरतीब से लगाने की ज़िद करना चाहता हूँ. हो सकता है इस काम में ख़ूब वक़्त लग जाये. वक़्त की उन घड़ियों में जो मेरी दुनिया हो उसके नक़्शे की बनावट किसी भी पहले के नक़्शे से मेल न खाती हो तब क्या करूँगा, यह अभी से नहीं सोचना चाहता. सोचना पहले कदम से भी पहले कहीं और मुड़ जाना है. तारीख़ को जानने वाले इसे किस तरह लेंगे, इससे जादा ज़रूरी है, वह उन वैचारिक यात्राओं के चित्र खींचें, जिन्होंने हमें इस क़ाबिल बनाया, जहाँ हम यह सोच पाए कि हम भी अपनी शर्तों पर अपनी दुनिया बना सकते हैं. बना सकने की बात सोचना, ख़ुद को जानने, उससे बात करने की पहली शर्त है. जो ख़ुद से बात नहीं करते, वह दूसरों की बनायीं दुनिया में केंचुओं की तरह रहते हैं. वह कब केंचुओं से तिलचिट्टों में बदल जायेंगे, उन्हें पता भी नहीं चलेगा. 

वह कभी सोच भी नहीं पाते कि जहाँ उन्होंने अपनी ज़िन्दगी के इतने साल व्यतीत कर दिए, वह उनके सपनों की दुनिया ही नहीं थी. अगर इन पंक्तियों को पढ़ते वक़्त आप ज़रा सी भी देर के लिए अपने अन्दर झाँकने लगते हैं, तब समझिये, शायद यह इसी कोशिश में लिखते जाना है. लिखना ख़ुद को कहीं याद की तरह छोड़ जाना है. कोशिश है यह दुनिया जैसी बनती जा रही है, उसे समझा जाये. यह तुलना एकदम बचकानी है. या यह तुलना ही नहीं है, पता नहीं. पर शायद यह एक छोटा-सा रुक्का है. ताकि हम बार-बार इसे पढ़कर ख़ुद को नक़्शे की तरह दुरुस्त कर सकें.

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