तुम्हारे लिए

एक कमरा है, उसमें लाइट बंद है. बाहर सूरज है. वक़्त बिलकुल अभी का है. तीन बजकर दो मिनट। फोन को चार्जिंग पर लगाने की कोई अरबरी  नहीं है. किसी का कोई फोन नहीं आएगा। किसी से कोई बात नहीं की जा सकती। जो ज़िन्दगी चार्जर खोजते हुए बीत रही थी, उसमें ऐसे दिन भी आएंगे, कभी सोचा न था. यह एक तरह का दखल था, जो एक मशीन के साथ होने से लगातार तनाव की हालत में पहुँचा देता। अब किसी का इंतज़ार नहीं हैं. जो कल चले हैं, वह भी अभी किसी ठिकाने पहुँचे नहीं हैं. एक सुकून है, जो इन सबसे बीच में शहर जैसी संरचना में गायब है. अगर पहले पता होता, मोबाइल फोन का इतना दखल है, तब उसे कबका अपने हाथों से दीवान के ऊपर चढ़कर उतनी ऊँचाई  से इतनी तेज़ ज़मीन पर फेंकता कि उसके चीथड़े उड़ जाते।

यह गुस्सा कतई नहीं है. यह किसी की अनुपस्थिति में उसके न होने का एहसास है. जब तुम साथ नहीं होती हो, तब न मालुम किन खयालों से भर जाता हूँ. मुझे खुद समझ नहीं आता, ऐसा क्यों हो जाता है?   

मन करता है, सब यहीं ठहर जाएँ. वक़्त में कहीं अदेखी दिशा में भागे जा रहे पलों को रोक कर देखना चाहता हूँ, तब क्या होता है? मैं तब तक चलता रहूँगा, जब तक तुम्हारे पास नहीं पहुँच जाता। तुम किस रूप में होगी, नहीं पता. शायद तुम किसी रुपाकार में समां नहीं पाओगी। इसलिए सहूलियत के लिए तुम्हें तुम कह रहा हूँ. हो सकता है, तुम्हारी कल्पना में मैं भी इसी तरह आता होऊँगा। तुमने कभी बताया नहीं है, पर मुझे पता है. हमने साथ देखें हैं, इन दिनों के सपने। सपने, जिनमें हम साथ-साथ खो जाना चाहते हैं. हम उन दिनों की आहट अभी से महसूस कर रहे हैं. इतना झूठ तो बोलने दो मुझे।

यह सब, मैं कल लिखना चाहता था. पर कल तुममें खो गया. लिख नहीं पाया। अब जबकि अपनी जगह नहीं हूँ, इस अँधेरे कमरे में चुप बैठा हूँ, तब तुम मेरी स्मृतियों से होती हुई इन पंक्तियों में उतर आयी हो. सच, जब-जब तुम्हें इस तरह सोचता हूँ, लिखने से बचने लगता हूँ. जब तुम साथ नहीं होती, तब वह पल सबसे कमज़ोर धागों से बुनते हैं. मैं उन्हें मकड़ी के थूक से बुना हुआ जाला समझता हूँ. यह मैंने बनाया होता, तब पता होता, किस तरफ नहीं जाना है. पर क्या करूँ? कुछ समझ नहीं आता. समझ आ भी गया, तब कौन सा कुछ बदल जाने वाला है? यहाँ यह दिन ऐसे ही होने थे. बिलकुल ऐसे ही.

यह मेरे अंदर मेरे पुराने दिनों का लौट आना है. जिन दिनों से सबसे ज़्यादा बचने की इच्छा से भर गया था, उन्हीं तरह इन दिनों में घुटते रहने को अभिशप्त होकर नहीं जीना चाहता था. पर क्या करूँ? तुम इस पर ज़्यादा मत सोचना। कल नहीं कहा तो क्या हुआ, जन्मदिन मुबारक़। ले लो. बड़ी, मुश्किल से इस पंक्ति तक पहुँच पाया हूँ. मुझे पता है, तुम समझोगी।

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