सब टूट रहे हैं

सिर्फ दीवारें नहीं टूट रहीं. जहाँ अपनी ज़िन्दगी के सबसे खुशनुमा साल गुज़ार दिए. उसके टूटने पर सब टूट रह हैं. यह टूटना किसी को दिख नहीं रहा. ऐसा कोई नहीं है, जिसके अन्दर पुराने दिनों की यादें दरक न रही हों. हम बहुत छोटे-छोटे रहे होंगे. हमारी आज की उम्र में हमारी मम्मी रही होंगी. जब वह यहाँ एक कमरे के घर में आई होंगी, तब वही नहीं आई होंगी, उनकी हमउम्र और चाचियाँ भी अपने घरों को छोड़ कर यहाँ रहने आई होंगी. वह तब से एक दूसरे को देख रही हैं. यह देखना सिर्फ़ देखना नहीं है. स्मृतियों में शामिल होना है. उनमें किसी याद में साथ रहकर वापस जीना है.

जब तक हम ओस की तरह गीले हैं, तभी तक हमें जिन्दा रहना चहिये. यह ओस की बूंद ही हमें भावुकता से भर देती होगी. हमारे आँखों की नमी बनकर हमारे सामने किसी का जाना, झिलमिला जाता होगा. यह किसी की कल्पना में कहीं नहीं था, वह इस जगह का नक्शा बदल देंगे.

जगह इस तरह उनकी इच्छा बन जायेगी और वह हमारे अतीत की स्मृतियों के आततायी की भूमिका में ख़ुद को ढाल लेंगे. हम कभी इस ख़याल से भरे भी नहीं थे. उन्होंने एक बार फिर साबित किया, जैसे-जैसे हम वक़्त में आगे बढ़ते जा रहे हैं, हम ख़ुद में सिमटते जाने के लिए मजबूर किये जाते रहेंगे. जो शक्तिशाली है, उसकी नज़र में हमारे स्मृतिकोश किसी रेत के धेले जितने गैरमामूली हैं. यह उन्होंने बता दिया. उन्होंने बता दिया, हम उनकी नज़र में नज़र न आने वाले लोग हैं.

 इस पूरी परिघटना में मेरी भूमिका सिर्फ़ अपनी नाक में ऊँगली डालकर इन शब्दों को लिखने भर की है.

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