गुलमोहर की पहली आहट

तीन चार साल पहले ऐसी ही कोई शाम थी, हम हिंदी छोड़ कर एक-दूसरे विषय की तरफ़ झुके जा रह थे. प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार की पिछली क्लास का कोई खटका दिमाग में रह गया था, जो धीरे-धीरे शाम ढले विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर आते-जाते लड़के लड़कियों और उनके पीछे की पढ़ाई से जुडी आकांक्षाओं को टटोलने की जद्दोजहद में कहीं थम सी गई बेकार सी शाम थी. हम आगे क्या करेंगे? एम एड के बाद करने के लिए सरकारी नौकरी है. मास्टर बनकर उसी में पिस जायेंगे. हर दिन वही सुबह से दोपहर की भागा दौड़ी होगी. सिर दर्द होगा आँखें भारी हो रही होंगी. बस लेटने को होंगे. कक्षा में थोड़े बच्चे होंगे, जिनमें हम कुछ संभावनाओं को देखते देखते ख़ुद बुझते चेहरों के साथ सालों बीतने के बाद यहीं कहीं शहर में टकरा जायेंगे.

यह वही दिन थे जब जनसत्ता में हम आ रहे थे. हम लिखने को छोड़ नहीं रहे थे. फ़ेसबुक हमेशा से वक़्त की किश्तों में सबसे जादा चोरी करता लगता तो उसी को किनारे करके लिखने पर पिल पड़े. बीच में आलोक केरल चला गया. वहाँ से कहीं घूमने जाता तो लिखता. मैं यहाँ दिल्ली ही रुका हुआ था. यहीं से कमरे के बाहर अंदर की दुनिया लिखता रहा. पर कहीं न कहीं लगता रहता हमें अपने जैसे लिखने वाले कभी मिल भी पायेंगे? आज सोचता हूँ, तो लगता है यहीं कहीं गुलमोहर की पहली पदचाप होगी. हमारे दिलों के अन्दर. हमने हिंदी में कहीं किसी किताब में पढ़ा था, कोई कवि थे जो अपने जैसे समतुल्य के इंतज़ार में वर्षों प्रतीक्षा करने को तैयार थे. पर हम तैयार नहीं हैं. कहीं कोई होगा/ होगी तो उससे हम मिलकर रहेंगे.

आपको भी लगता है, कहीं न कहीं यह इंतज़ार आप भी कर रहे थे अपने अन्दर, तो आप भी इस गुलमोहर में एक कुर्सी मेज़ लेकर बैठ सकते हैं. यह हम सबका साझा बाग़ है. अभी मन नहीं है, कोई बात नहीं. जब मन हो, तब आ सकते हैं. आपका हमेशा स्वागत है. आप भी हमें अपने लिखे, अधलिखे हिस्से, अनकही बातें भेज सकते हैं. पता नहीं कितने ख़याल तो कागज़ पर आने से पहले ही उड़ जाते होंगे, उन्हें दर्ज़ कीजिये. भले उसे गुलमोहर पर मत टांकिये, पर लिखिए. ज़रूरी है लिखना. एक बार लिखना शुरू हो गया, तब तो हम गुलमोहर से आपकी दोस्ती करवा ही देंगे. वह भी एक हमसफ़र होकर रहेगा. आप देखिएगा. एक दिन ऐसा ज़रूर होगा.

{फ़ेसबुक पर शनिवार, पांच नवम्बर को लिखे नोट की नक़ल, यहाँ यादगारी के लिए लगायी है.}

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