दिल्ली इन दिनों

कल शनिवार हमारी दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बनकर उभरी. साँस लेने को हवा भी नहीं हैं यहाँ. जिधर देखो, उधर धुएँ की सफ़र चादर. सवाल किससे करें? किससे पूछें, यह क्या किया हम सबने? कैसे यह सब ठीक होगा? कहीं किसी बस स्टॉप पर धूम्रपान न करने के लिए शुक्रिया पढ़कर दिल रोने को हो आया. हम सब एक ऐसी जगह हैं, जहाँ हर पल इतना धुआं अपने फेफड़ों तक खींच कर ले जा रहे हैं, उसे कितनी सिगरटें नाप सकेंगी, उन्हें हम गिन भी पायेंगे? गिनने की ज़रूरत क्या है?

एक दिन तो मरना ही है सबको. सिगरेट से मरें या इस ज़हरीले धुएँ की कैद में तिल तिलकर छटपटाते रहें, किसी को कोई फर्फ़ नहीं पड़ता. एक क्षण ऐसा भी आएगा, जब हम इस धुएँ में विकास के गुब्बारों और प्रगति सूचक छल्लों को उड़ता हुआ देखेंगे. यह विकास के अप्रतिम उदाहरणों और सिद्धियों का ही परिणाम है, हम सब यह सफ़ेद दिन देख पा रहे हैं. यह उदासी नहीं, मौत से पहले की शान्ति है. यह हमारी सामूहिक कब्रगाह है. मरने से पहले हमने धुएँ की सफ़ेद चादर अपने ऊपर ओढ़ ली है. घरों की खिड़कियों पर परदे चढ़ाकर चुपके से कबूतर की फितरत हमारे अन्दर दाख़िल हो गयी है. कोई नहीं बच पायेगा. कोई कहीं नहीं जा पायेगा. यह दिल्ली है. यह धीमी मौत का शहर है.

अभी आज इतवार पौने चार बजे यह सब लिख रहा हूँ, तब मेरी आँखें जल रही हैं. लिखने बैठा था, तब आँखों को पानी से धोकर आया था. पिछले तीन दिनों से ऐसा लग रहा है. नींद हर रात उबासी बनकर पास तो आती है पर आँखें उसे अन्दर नहीं ले जा पा रही हैं. उनींदे से बिस्तर पर लेटे रहो. करवट-करवट इस इंतज़ार में कुछ भी बदलने का नाम नहीं ले रहा. मन करता है, फ़िज़ूल सोने के चक्कर में पड़ गए. अभी तो कितना ही और पढ़ा जा सकता था. किसी आईडिया पर बात हो सकती थी. क्यों लाइट बंद कर दी. नींद तो आ नहीं रही है. अजीब सी बेचैनी है. कुछ करने का मन नहीं हो रहा. सब थम सा गया है. मन में, दिमाग में. रेटीना और उस परदे के पीछे. सब जगह सब ठहर सा गया है. चलकर भी कुछ ख़ास होने वाला नहीं है. हम घूम कर बल्लीमारान से वापस भी आएँगे तो इसी घर ही न.

शहर कहाँ कहीं जाने वाला है. एक दिन ऐसा आएगा जब स्कूल से लेकर कॉलेज, घर से लेकर दफ़्तर सब जगह ऑक्सीजन प्लान्ट लगे होंगे. हम सिर्फ़ धुआं देने वाली गाड़ियों और हजारों टन ज़हरीली गैस छोड़ती चिमनियों वाले कारखाने के अलावे, हवा साफ़ करने वाले संयंत्र, अपनी खिड़कियों में फ़िट कर लिया करेंगे. जब स्त्रियाँ गर्भ धारण करेंगी, तब उन्हें, उनके लिए असमान दरों पर बने, शुद्ध वायु वाले वार्डों में नौ-नौ महीनों की कैद में डाल दिया जाएगा. हम मास्क के बिना बाहर निकलेंगे तो दम ही नहीं घुटेगा, त्वचा पर लाल-लाल चतके पड़ जायेंगे. कम्पनियाँ ऑक्सीजन का उत्सर्जन करने वाली क्रीम का उत्पादन ‘स्वदेशी बचाओ’ की तर्ज पर करने लगेंगी. किसी ख़ास पौधे की माँग इसलिए बढ़ जायेगी क्योंकि उसके घर पर होने और उसे उस कंपनी की क्रीम लगाने से वह शुद्ध वायु का उत्सर्जन करने लगेगा. यह स्कीम सरकारी दरों पर निम्नवर्गीय लोगों में असंतोष की भावना न पनप जाये, इसलिए सब्सीडी के साथ इसके किराना स्टोर पर मिलेगी. टाटा ‘नैनो’ की तर्ज़ पर ‘नैनो घर’ बनाने वाली कंपनी बन जायेगी. इको फ्रेंडली से पहले ‘इको सिस्टम’ को बनाने वाली कंपनी. इसे टक्कर तो कोई सार्वजनिक कंपनी ही देगी.

आप सब सोच रहे होंगे, मैं कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहा हूँ. तो साहेबान, आप भी तो दो-चार दिन गुजारिये, इस दिल वाली दिल्ली में. एक ही रात में दिल न बैठ जाये तो कहियेगा. और यह सब किसी सपने की बात नहीं है. अगले दस साल के अन्दर यह सब सच होता, हम अपनी आँखों के सामने, देखने लग जायेंगे. इस गैस चेम्बर से निकलने के लिए हिम्मत चाहिए. जो हमनें अपने अन्दर कभी उगने ही नहीं दी, तो फ़िर और कोई बात हम कैसे करें जनाब?

बस आगे आगे देखिए होता है क्या? अभी तीन दिन के लिए सरकारी स्कूल बंद हैं. पर तीन दिन बाद क्या?

टिप्पणियाँ

  1. बहुत सही लेख हैं, अगर हमने इस प्रदूषण को रोकने के उपाय नही किये तो आपकी लिखी हर बात सही होगी..

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    1. पता नहीं सही लिखा है या नहीं पर भयावय ज़रूर है. जिससे बचने की कोशिश करो वही, सामने त्रासदी की तरह नज़र आये, इससे दुखद और क्या होगा.

      खैर, हम जो कर सकते हैं, वह कोशिश करें तो शायद कुछ हो पाए.

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