मन मेरा

क्या लिखने के लिए सोचना ज़रूरी है? यह प्रश्न जितना सीधा है, इसके जवाब उतने ही घुमावदार हो सकते हैं. मैं इससे शुरुवात क्यों कर रहा हूँ? शायद ऐसे ही शुरू करने के लिए. कहीं से तो शुरू होना ही है, यहीं से सही. पर ऐसी बात नहीं है. जब इन पंक्तियों को लिख रहा हूँ, तब मेरे मन में वह बात घूम रही है, जब मैं कह रहा था कि लगता है, वैसा नहीं लिख पा रहा, जैसा लिख सकता हूँ. यह कब और कैसे तय हुआ होगा कि जो अभी तक लिखा है, वह वैसा नहीं है जैसा अभी तक नहीं लिखा गया है. एक के होने और एक के न होने पर ऐसी स्थिति आश्चर्यजनक स्थिति है. एक है, जिसे देख रहे हैं. पर कह रहे हैं कि यह वह नहीं है, जैसा लिखा जा सकता था. एक कहीं नहीं है. वह शायद जेब में, बगल में दबाये छाते, गले में लपेटे मफ़लर में कहीं छुपा होगा. पर उसकी निशानदेही न होने पर भी उसकी कल्पना कर अभी लिखे जा रहे को कमतर कहना कैसा होता होगा? होने से न होने तक पहुँचना शायद कहीं लेकर न जा पाए. दिमाग ऐसे ही कसरत करता रहे. पर क्या करें, यह काम भी किसी को तो करना था. हम ही इसे अपने जिम्मे ले लेते हैं. किसी को अपनी तरह इसमें फँसने के बाद दूर से देखने से बेहतर है, ख़ुद फँस जाना. 

हम फँसेंगे, हमारे पास वक़्त है, उसके पास शायद यह वक़्त ही न हो. तब? अगरचे, यह जो भी है, इसमें ख़ुद की सीमाओं को जान जाने के बाद की बैचैनी जैसा भाव ज़रूर होगा. या हो सकता है, कहीं उन बातों के न होने का क्षोभ दुःख बनकर ,आसपास बादलों की तरह मँडराने लगा होगा. यह हर लिखने वाले के साथ होता है? कह नहीं सकते. पर इसका होना लिखने में गुणात्मक परिवर्तन का कारण बनेगा से पहले उधेड़बुन का सबब ज़रूर हो जाता होगा.

नहीं होता होगा, तब उसने लिखना शुरू किया होगा, कहना नहीं. कागज़ पर कहना एकदम छूटा हुआ है. लिखने का जो मन इन उँगलियों से होता रहता है, वह हाथ से लिखने का नहीं हो रहा. ऐसा भी क्यों हुआ, इसके भी कई ग़ैरज़रूरी कारण रहे होंगे. इनकी तह में जाने से पहले ज़रूरी है, वह बात जो वहाँ लिखी जा रही. इसे कथ्य कहा जाता है शायद. जिसे कहा गया है. जिसे वहाँ कहना है. यहाँ नहीं कहना है. अगर कहना भी है, तब उसकी भाषा क्या होगी, इस पर भी घण्टों बात हो सकती है. पर मैंने देखा है, अगर किसी दिन ब्लॉग के लिए लिखने बैठ गया, तब पूरा का पूरा दिन इन्हीं पोस्टों को बनाने में बिता दूंगा. घण्टों यहीं लैपटॉप के सामने तस्वीरें देखते हुए उनकी तासीर में शब्दों के मानी भरते हुए, घड़ी की तरफ़ नज़र नहीं उठाउँगा.

इन सबके बाद भी क्या है, जो कहीं दूसरी तरफ़ खींच रहा है. क्या है, जो अभी तक नहीं लिखा गया है. एक लेखक होने के नाते यह सोचना ज़रूरी है. हो सकता है, कहीं कोई एक पंक्ति लिख कर रख दी हो, उसके ब्यौरे नहीं कहे गए हों. ज़रूरी है, उस नज़र का होना, जो सब कहलवा दे. मन होना दूसरी बात है और नज़र में आना दूसरी. देखते हैं, कब उन घड़ियों में ख़ुद को पायेंगे, जहाँ, जो कहना है, उसे कह देंगे. जब तक नहीं कहते, तब तक यही सही.

{पिछली रात तक जाता धागा: लिखना  }

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