बदलना

एक दिन रहा होगा, जब कोई पहली बार इस भाव से भर आया होगा. अब हमें समाज दूसरी तरह से बनाना चाहिए. यह वाला ठीक नहीं चल रहा. यहाँ लोग वैसे नहीं हैं, जैसे हमने सोचे थे. यह दुनिया हमारी कल्पनाओं से कहीं ज्यादा बदतर है. अब हमें कई सारी चीज़ों पर दोबारा से सोचना होगा. नहीं. बिलकुल नहीं. ऐसा कभी नहीं हुआ होगा. कभी समाज ख़ुद को बदलने के लिए ऐसी बैठकें नहीं करता. कहीं कोई संवाद नहीं होता. कोई होता है, जो तय करता है, क्या करना है? कैसे करना है? सब मान भी जाते होंगे, ऐसा नहीं है. मानना ज़रूरी नहीं है. जो मनवाना चाहते हैं, उसके पास दूसरे क़िस्म के औज़ार होते हैं. हम भले अपने मनों में बर्बर वक़्त से लौट कर कहीं दूर चले आते हैं, पर बर्बरता के अंश हमारे अन्दर गहरे धँसे रह जाते हैं. वह उन्हें नए नाम देते हैं. हम जिसे आज तंत्र या व्यवस्था के नाम से जानते हैं, उसकी परछाईयों में खून के छींटे साफ़-साफ़ महसूस किये जा सकते हैं. हम थककर हारते हुए सहमत हो जाते हैं. कहते हैं, यहाँ भी सब मर रहे हैं पर यह परदा ऐसा है, जो सब छिपाए ले जा रहा है. यह ठीक है. अभी इसी से काम चला लेते हैं. जब यह भी झीना हो जाएगा, तब बदल लेंगे.

बदल लेंगे, हमें फ़िर उसी घेरे में खींच लेता है, जहाँ से हम शुरू हुए थे. हमें लगता है, हम एक दिन निर्णय कर लेंगे. पर ऐसा होता नहीं है. हमारी तरफ़ से फ़ैसले लेने वाले हमें बताते भी नहीं हैं, उन्होंने हमारे लिए क्या सोच कर रखा है? वह एक दिन सफ़ेद हाथी पर चढ़कर आते हैं और सैंकड़ों लोग उसके नीचे दब जाते हैं. हम सुकून से सहम जाते हैं और सोचने लगते हैं, अच्छा हुआ हम नहीं कुचले गए. यह परिदृश्य जैसा हमें आज दिख रहा है, इस नज़र को इस तरह बताने वाले कौन रहे होंगे? कोई तो रहे होंगे, जिनसे यह बातें हम तक पहुँच सकी. सोचिये वह कौन से तरीके रहे होंगे? जो उन्होंने इज़ाद किये थे. हम क्या कर रहे हैं. हम कभी ऐसा कुछ कर भी पायेंगे? एक बार सोचिये.

{अगली दोपहर: साँचा }

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