सामने से

समझ न आना दुनिया की सबसे बड़ी दिक्कत है. किसी के भीतर से आती एक लकीर का न समझा जाना. और इसे ख़ुद भी सुलझाने लायक बना लेने में कितना ही ज़ोर लगा लो. कुछ नहीं होता. यही मेरे साथ हो रहा है. यह इस कड़ी में आख़िरी पोस्ट समझी जाये, जिससे मेरा भी वक़्त बचे और आप सब भी बार बार इस कदर परेशान न हों. यह सारी कवायद क्यों हो रही है? क्यों हम इतनी जल्दी सब कुछ सुलझा लेना चाहते हैं? धागे हैं उलझ रहे हैं तो क्या? कहीं कोई होगा जो हड़बड़ी में कुछ जानकार ख़ूब हँस रहा होगा. पर हम जो हैं, वह सोचे जा रहे हैं कि बदलने से लेकर उन सारी दुनियाओं में बन रही या बन चुकी सँस्थाएँ किसी-न-किसी तरह कभी किसी व्यक्ति को एक इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करतीं. वह उनकी आड़ में कई सारे पैंतरों को चलाती हुई, हमारे अन्दर दीमक की तरह दाख़िल है. हमें वह रेशम का कीड़ा लगती है. हमें लगता है, हम कुछ करने की हैसियत में हैं पर हम देख नहीं पाते कि शुरू से हम बस इन साँचों में ढलने के लिए ख़ुद को तैयार कर रहे थे. इस अभ्यास को देखने के लिए किसी टेलीस्कोप की ज़रूरत नहीं है. यह हमारे खून के डीएनए की तरह हमारे चारों तरफ़ मौज़ूद रहता है. मौज़ूद तो हवा भी है और उसमें बनी हुई नमी भी. पर इसे ही शायद हम लोग समाज कहते हैं. 

सब तो यह भी कहते हैं, हम समाज में रहते हैं. पर यह कोई नहीं कहता, यही समाज उन पर दबाव भी बनाये रखता है. यह निगरानी तंत्र उसने इन्हीं साँचों की सुरक्षा और उनके इतिहास में लगातार आगे बढ़ते रहने की गरज से किया है. जब यही साँचें भौगोलिक सीमाओं को तोड़ देते हैं, तब हमें यह सूक्ष्म से स्थूल होते दिखाई देते हैं. यह इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है. परन्तु उसके अधिपति को यही उसका शक्ति प्रदर्शन लगता है. वह इस मौके को जाने नहीं देना चाहता. उसने इस परीक्षण से पहले अपनी वैचारिक वैधता और स्वीकार्यता के लिए बीते कई सालों से पुख्ता तय्यारी की है. इसमें प्रकारांतर से कई और सहचर संस्थाएँ उसके साथ हैं और लगातार इसके लिए काम करती रहती हैं. 

इस पूर्वपीठिका में वह कहीं नहीं कहता कि हम जैसे हैं, दूसरों को भी वैसा बनाने की इच्छा से निकट भविष्य में नहीं भर जायेंगे. इसे समझने के लिए सैमुअल हंटिंग्टन की किताब पढ़ने की ज़रूरत नहीं है. अपनी दुनिया के नक्शें को देखना शुरू कीजिये. कहाँ-कहाँ किस तरह की प्रणालियाँ थीं(?) और कौन-कौन हैं(?), जो उन्हें अपनी बोतल में उतारने की गरज़ से भर गए हैं. दुनिया यहीं एक बार फ़िर मानने और न मानने के द्वंद्व में फँसती दिखेगी. यह अगर इतनी ही अच्छी व्यवस्था है, तब एक न एक दिन इसके अप्रतिम लाभों के किस्से उनतक पहुँच जायेंगे और वह अपनी भौगोलिक सीमा के भीतर उसे लाने की सहज प्रक्रिया को शुरू कर देंगे. इतने आतुर होने और थोपने की ज़िद कहीं दूसरी तरफ़ धकेल देती है, जहाँ इस शान्तिप्रिय पद्धति को लाने के लिए हिंसा का सहारा लेना पड़ता है.  

यह इस विचारधारा की सबसे बड़ी कमजोरी है, जहाँ इसे ख़ुद को ज़ाहिर करना पड़ता है. तब इसे अपनी खूबियाँ बताने के लिए सामने आकर ख़ुद अपना प्रवक्ता बनना पड़ता है. अगर हम वापस सामाजिक अर्थों में व्याप्त संस्थाओं या ऐसी बारीक व्यवस्थाओं को टटोलने की कोशिश करेंगे, तो देखेंगे कि उनकी जड़ें भले एक क्षेत्र तक सीमित नज़र आती हैं, पर वहाँ उनकी बहुत मजबूत पकड़ है. यह सँस्थाएँ या व्यवस्थाएँ ऐसा नहीं है के हमला होने पर कुछ नहीं करती. उल्टे वह अपनी संरचनाओं में लगातार इन हमलों को सहन करने के तंत्र को विकसित करती रहती है. यह भी हिंसा का सहारा लेते हैं, पर इसका तंत्र स्वयं को मजबूत करने के लिए और बारीक होकर काम करता है. 

अगर समझने में अभी तक तकलीफ़ हो रही हो और पिछली चारों किश्तें और ख़ास कर पहली, दूसरी और तीसरी किश्त समझ न आ रही हो, तब हम यहाँ एकएक कर लोकतंत्र, पूँजीवाद, पुरुषसत्ता, जाति, विवाह आदि संस्थाओं को रखकर देख सकते हैं. इनके नाम तफसरे में दबारा आना नहीं चाहिए थे, पर क्या करें, समझ का बनना इससे जादा ज़रूरी है. यह बात भी ध्यान रखिये, कि भले मैं इन्हें भौगोलिक रूप से सीमित कहकर इनकी विशिष्टताओं को देखने का आग्रह कर रहा हूँ, पर यह वैश्विक रूप में व्याप्त हैं और इनकी भी अपनी राजनीति है.

{डिस्क्लेमर: यह आख़िरी पोस्ट थी. पीछे से चार पोस्टों का आख़िरी तफसरा. इसके बाद मेरा बस नहीं है, कभी मन होगा तो लौटेंगे. जो पीछे नहीं थे, उनके लिए, पहली: बदलना , दूसरी: साँचा , तीसरी: व्यवस्था ,चौथी: व्यवहार .} 

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