कहानियों में..

अब मैं ठहर कर सोचता हूँ. तब ठहरा नहीं था. जैसे तुम्हारी तस्वीरें देखते हुए अब कहीं गुम नहीं होता, वहीं कहीं छिप-सा जाता हूँ. तुम अन्दर हो. तस्वीर में कहीं खड़ी, कहीं बैठी. मैं कहीं नहीं हूँ. बस बाहर से झाँकता हुआ, तुम्हें देख रहा हूँ. अच्छा हुआ हम नहीं मिले. मिल भी जाते तो तुम कहाँ इन दीवारों में अटने वाली थी? कहीं कोई नहीं रोक पाता तुम्हें. तुम रूकती भी नहीं. मैं भी कहीं रुका नहीं हुआ हूँ. मेरी हैसियत मेरे जितनी ही है. मैं उसे अच्छी तरह समझता हूँ. वह जितनी भी है, ठीक है. असल में हम अपनी-अपनी कहानियों में रुके हुए होंगे जैसे. तुम न भी रुकी हो, मैंने तुम्हें वहीं रख लिया है. यह लगना, अब मुझे कुछ नहीं करता. उसका कोई एहसास मुझ तक नहीं पहुँचा पाता. दिन जैसे और बीतेंगे, उनमें शाम का रंग घुलता जाएगा. वह रात भी बनेंगी. वहीं रात कहीं गली के मुहाने पर तारों के झुण्ड में पतंग की तरह उलझे रहने से अच्छा है एक दिन की बरसात में भीग कर फट जाना. कोई तब कभी पहचान भी नहीं पायेगा, कौन सी निशानियों में क्या बचा रह गया. एक दिन म्युनिसीपैलिटी वाले आकर गड्ढे खोद जायेंगे, और तारें अंदर बीच जाएँगी. काम ख़त्म. वह उसी नाली के पानी हाथ में हाथ धो लेंगे और कब्र का कोई नामों निशान नहीं छूटेगा.

{ पोस्ट का अधूरे रहकर बिखर जाना..}

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