एक कुत्ते की मौत

निजामुद्दीन, दिल्ली से चली ट्रेन गोंडा तीन घंटे देरी से पहुँची. देर कोहरे की वजह से हुई. लखनऊ से धीमे-धीमे चलती रही और साढ़े दस बजे प्लेटफॉर्म नंबर दो पर पहुँच गयी. यहाँ से आगे का सफ़र बस से किया जाना तय हुआ. जो वैकल्पिक साधन हो सकता था, वह अभी साल, डेढ़ साल स्थगन के दौर में है. छोटी लाइन से बड़ी लाइन हो रही है इसलिए गोंडा से बहराइच तक रेलगाड़ी नहीं चल रही है. रेल वाले सब यात्री अब बस से ही जाते होंगे. गोंडा जंक्शन पर उसी छोटी लाइन पर चलने वाले एक इंजन को उन पुराने दिनों की स्मृति में खड़ा कर दिया गया है. उसे देखो और अपने अतीत में डूब जाओ. नहीं डूब पाए तो कोयले के धुंए में आँख लाल की जा सकती हैं.

अब जिस सड़क से बहराइच तक जाना है, वह सड़क इंसानों ने बनायी है. उस पर किसी और जानवर की कोई ज़रूरत नहीं है. वह ख़ुद किसी जानवर से कम नहीं है. यह पहले शब्द हैं, जो यहाँ से लिख रहा हूँ. यह सड़क गोंडा से बहराइच की तरफ़ आ रही है. जिस दिशा में जा रही है, वापस भी उसी दिशा से आ रही है. इसे देखकर लगता है, जो इसके आस-पास बसे हुए हैं या जिनके घर इस सड़क के किनारे हैं, वह भी इन सड़कों से घबराते होंगे.

घबराना बताता है, वह चिंतित हैं. चिंता, उस सड़क से नहीं है, उस सड़क पर चलने वाली गाड़ियों से है, जो उस पर लगातार भाग रही हैं. कहते हैं, यह सड़क कई राज्यों को आपस में जोड़ती है. इस वजह से इस पर वाहन अधिक हैं. किन्तु उनकी गति क्यों इतनी अधिक है, इस पर कोई कुछ नहीं कहता. फैज़ाबाद से लखनऊ कोई एक सौ चालीस किलोमीटर है. हम दो घंटे से भी कम वक़्त में उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बस से लखनऊ पहुँचे हैं.

हमारा ड्राइवर बहुत रुकता-रुकाता गाड़ी चला रहा है. उसे कोई जल्दी नहीं थी. जहाँ जिसने कहा, रोक दिया. जहाँ घूमता हाथ दिखा रोक दिया. ब्रेक उसके पैरों के पास ही थे, जिसका उसने बहुत धीरज और धैर्य के साथ उपयोग किया. लेकिन उसके साथी चालक अपनी गाड़ियों में इस गुण को प्राप्त नहीं हुए. बसें लहरती हुई देखाई दे रही थीं. कैसे ड्राइवर ने स्टेरिंग व्हील को घुमाया होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. चार पहिया गाड़ियाँ इतनी स्पीड में और इतने उजेरे में अपनी हेड लाइट जलाकर बताने में व्यस्त थी कि हट जाओ नहीं तो गए काम से. मोटर सायकिल वाले गेयर बदल-बदल कर जो सर्र सर्र ओवरटेक कर रहे थे, पूछो मत. ट्रक तो बेतहाशा थे. भागे जा रहे हैं. भागे जा रहे हैं. सड़क कैसे उनका वजन संभाल पाती होगी. कोई उनके सामने आने की हिम्मत नहीं करता.

इस पूरे दृश्य में बस एक ही कुत्ता सड़क पर मरा हुआ दिखा. अंतड़ियाँ बाहर निकली हुई थी. सड़क खून से रंग गयी है. उसी खून में सना हुआ, सड़क से चिपटा हुआ कुत्ता. उसके वजन में कई गुना भारी गाड़ी पिछले पैर की हड्डियों को कचूमर बनाकर निकल गयी होगी. उसके गुज़र जाने पर पीछे बस यह एक कुत्ता मर गया होगा. आश्चर्यजनक तो यह है, कैसे उसकी गर्दन बच गयी और सिर्फ़ पिछला हिस्सा ही कुचल पाया? आप कल्पना करके देखिये.

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