आज नवा है

सुबह ही चाचा ने कह दिया है, शाम यहीं खाना खाना है. कल की तरह वहीं नहीं रुक जाना. हियाँ उरद, भात, बरिया बनी. यह लोक में व्याप्त अपनी तरह का पर्व होगा, जो अभी भी यहाँ पंचांग में तिथि देखकर मना लिया जाता है. शहर में किसे पड़ी है, ऐसी तारीखें याद रखने की. यह यहाँ की देशज परंपरा होगी. नया अनाज आया होगा. उसे पहली बार घर की रसोई में बनाया जायेगा. चाचा जिस तरह से रोक रहे हैं, उसका कुछ और अर्थ भी होगा. शायद कल सीमा कह रही थी, इससे बरकत आती है. बरकत मलतब समृद्धि. धन-धान्य से घर भर जाने की कामना जैसे.

कौन होगा, जो समृद्ध नहीं हो जाना चाहता होगा. हम जिन विपन्न समाजों में ख़ुद को पाते हैं, वहाँ धन सिर्फ़ पैसा नहीं है. यह प्रकृति हमें जिस तरह हर मौसम में फसलें देती है, उसी अनुपात में यह उसे याद करने का स्मृति दिवस है. एक दिन उन दिनों को याद करना जब उसका इंतज़ार किया था. अभी कल ही ख़याल आया. यह ठण्ड हमारे लिए नहीं सरसों और गेहूँ के लिए है. हमें इसके मुताबिक ख़ुद को ढालना होगा. आज के समय को देख कर लगता नहीं, हम इस तरह झुकने के अभ्यस्त समाज हैं. हम उन इच्छाओं से भर गए हैं, जो हमारी प्रकृति के अनुरूप नहीं हैं.

हम अपनी जिदों से भरे हुए हैं. वरना वह मिट्टी अपने अन्दर इस ऊर्जा से सम्पन्न है कि उसमें मौसम के अनुरूप गुण अपने आप समाये हुए हैं. हम फ़िज़ूल में मिटटी को पत्थर बनाने की इच्छाओं से भर आये हैं. मटर के बेसन से काम चला लेंगे. चना नहीं है तो क्या हुआ. हम जो छूट गया है, हममें उस तक पहुँचने की ललक नहीं है.

अगर यहाँ नहीं होता, तो शायद ही इस दिन को जान पाता. यह इत्तेफ़ाक ही होता यहाँ गाँव में किसी से बात होती और पता चलता, आज क्या है? वहाँ सिर्फ़ खिचड़ी बची है. क्योंकि उसे वहाँ मकर संक्रांति कहते हैं. सकट में पूजा गया चावल का आटा फागुन मास तक बनेगा, उसके बाद नहीं. यह विधान क्यों रखा गया होगा, पता नहीं. पर इतना तो है, यह जिस भी तरह का समाज हो, अपने आस पास को लेकर सचेत है. उसमें होने वाले बारीक़ परिवर्तनों को देख पाने की नज़र उसमें अभी इन त्योहारों में किसी तरह बची हुई है. यह हमारी नज़र में किस तरह पिछड़े हुए हैं और उन्हें किस तरह के विकास की ज़रूरत है, यह यहाँ बिलकुल बेमानी सवाल की तरह है. हम वहाँ किस श्रेणी के बहुत विकसित समाज बना चुके हैं, यह हमें सोचना चाहिए. अभी नहीं सोचेंगे तो एक दिन सोचने लायक ही नहीं बचेंगे.

साल में दो बार यह पर्व आता है. एक बार आज, माघ एकादशी के बाद और एक बार राखी के आसपास, भादो में. यह ठंडियों के बाद गेहूँ के पौधे में नवांकुर आने की ख़ुशी में मनाए जाने वाला त्यौहार है. इसे मनाईये.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी