यहाँ होना

मेरे दिमाग में कुछ ज्यादा चीजें नहीं चल रही हैं. चलने लगेंगी तो तो शायद परेशान हो जाउं. जहाँ अभी हूँ, वहाँ ख़ुद को मौजूद रखने की ज़द्दोजहद में कई सारी चीजों को यहाँ सामने नहीं आने देना चाहता. शायद वह यहाँ दिख भी नहीं रही होंगी. हर जगह की अपनी तासीर होती होगी. उनके यहाँ आ जाने से कुछ बदलने वाला नहीं है. पता नहीं क्यों ख़ुद को ऐसे व्यक्ति के रूप देखने लगा हूँ जो किसी से कुछ ख़ास कहता नहीं है. ख़ुश होता हूँ, तब भी सामने जताता नहीं हूँ. नाराज़गी किसी पर ज़ाहिर करने का कोई मतलब नहीं. शादी के बाद वह सिर्फ़ एक पर ज़ाहिर की जा सकती है. वहीं कभी-कभी होती भी होगी. 

इस वक़्त. बिलकुल इस वक़्त दो बजने में चार मिनट बचे हैं. फ़ोन रोमिंग पर है. एयरटेल वाले मिनट पर सवा एक रुपये काट रहे हैं. दिल्ली से ही सत्तासी रुपये का रोमिंग पैक डलवा लिया था. एक सौ अस्सी दिन बाहर बिना किसी पैसा कटे, फोन कॉल उठा सकता हूँ. वोडाफ़ोन वाले यह सुविधा बिना कोई पैसा अदा किये दे रहे हैं. अभी पचास एमबी थ्रीजी डेटा भी दिया था. उनकी सर्विस यहाँ ठीक है. एयरटेल पिछड़ गया. आईडिया से मिलने से पहले वह ऐसा कर पा रहे हैं, जब मिल जायेंगे, तब तो सच में बहुत फ़र्क पड़ेगा. जीओ वाले क्या कर रहे हैं, पता नहीं.

ऐसी बहुत सारी बातें दिमाग में चलाता रहता हूँ. कई ज़रूरी बातें यहाँ अनुपस्थित हैं. तीन दिन से गले ने परेशान कर रखा है. दो बार गरारा भी किया, एक बार परसों रात. फिर कल सुबह. तब जाकर कुछ ठीक हुआ. गला आज ठीक लग रहा है. आज गला कुछ कम भारी है. कई सारी चीजों को करने का मन इन दो दिनों में नहीं हुआ. बाहर सड़क खुदी हुई है. कभी-कभी तो घर से निकलने का मन नहीं करता. जिस तरह से हम चीजों को देखने के आदि हैं, यहाँ उन चीजों को देखने के लिए अपनी मूलभूत अवधारणाओं में ही रद्दोबदल करना पड़ता है. 

यहाँ अधिकतर बच्चों में पढ़ने की रूचि क्यों नहीं है? विद्यालय क्यों उन्हें वहाँ नहीं रोक पा रहे? इनके माता पिता कौन हैं? कम उम्र के बच्चे दुकानों पर क्यों बैठे हैं? बिलकुल इस पल राजेश जोशी की कविता दसवीं की किताब 'क्षितिज' से उठकर मेरे मन में तैरने लगती है, बच्चे काम पर क्यों जा रहे हैं? क्या इनको पढ़ने वाले बच्चे काम नहीं करते? क्या इनको पढ़ने वाले बच्चों का भी वर्ग चरित्र है? किन तरह के विद्यालयों में यह कविता पढ़ाई जा रही है?

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