उनका हिस्सा

हम जब ख़ुद को बहुत पढ़ी लिखी जगह पर स्थित करते हैं, तब ख़ुद में किन तरहों के भावों को गिरा हुआ पाते हैं? हमें अपने चारों तरफ अपने जैसे लोग दिखाई देते होंगे. प्राथमिक स्तर पर हमारी बातों में एक सहमति होती होगी. इसके सामानांतर कल्पना कीजिये, लगभग उसी समय हम ख़ुद को उस जगह देखते हैं, जहाँ पढना लिखना मूल्य की तरह अपनी अपनी जड़ें नहीं बना पाया है. इसे उस समाज के बचे रहेने की तरह भी देखा जा सकता है. वह पढ़ाई को बहुत ज़रूरी चीज़ नहीं मानते. जितनी समझ ज़िन्दगी जीने के लिए काफी है, उतनी वह अनौपचारिक कहीं जाने वाली संस्थाओं से प्राप्त कर लेते हैं. वहाँ हमें कैसा लगेगा? हम तो एकदम से उनके दायरे में कहीं बाहर की दुनिया से आये हुए व्यक्ति होंगे.

इन दिनों ऐसा ही महसूस कर रहा हूँ. कभी न कभी हम सबको ऐसा महसूस करना चाहिए. ठीक रहता है. यहाँ शिक्षा की संस्थाएं अभी जीवन का महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है. सरकारें प्रयास कर रही हैं. वर्दी, वजीफे, खाना सब दे रही हैं, फिर भी जो पढ़ा रहे हैं, उनकी आस्था अगर है भी तो सरकारी व्यवस्थाओं पर बिलकुल भी नहीं है. वह निजी स्कूलों की तरफ़ झुके हुए हैं. फिर यह वह लोग हैं, जिनके पास किसी भी रूप में अधिशेष बचा रह गया है.

जो अभी ढंग से जी भी नहीं पा रहा, उसके लिए पढ़ाई का सवाल इतना महत्वपूर्ण कैसे हो सकता है? उन्हें शायद पता है, पढ़कर उस पढाई का उपयोग करने वाली नौकरी की ज़रूरत होगी. उस नौकरी से घर परिवार चलाने के लिए तयशुदा तनख्वाह मिलेगी. यह जो भविष्यकाल की कल्पना है यही उनके वर्तमान पर भारी पड़ जाती होगी. लड़की एक न एक दिन दहेज़ के साथ विदा करनी है. लड़का तब कमाने लायक हो पायेगा, इतने सुन्दर सपने की पृष्ठभूमि में उनके पास कोई आधार नहीं है इसलिए वह घर में जो काम होता है, उसी का हिस्सा बना रहे तो ठीक है.

हो सकता है, यह सरलीकृत व्याख्या लगे, पर सरल समाज का यह हिस्सा पढ़ाई की नज़र से साफ़ साफ़ नहीं दिखेगा. हम चाहें, इन्हें अनपढ़, पिछड़ा हुआ, अशिक्षित, जाहिल कहते रहें, उनके सवालों तक हम अभी पहुँच ही नहीं पाए हैं. पहुँचता वही है, जो चाहता है. हम चाहते नहीं हैं. इसलिए हमारे पास हमारी व्याख्या है. उनका हिस्सा नहीं.

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