डायरी से..

मौसम हमेशा बदलता रहता है. आज लगा, इतने दिनों में सबसे ज्यादा गरम रहा होगा. सबने अपने गरम कपड़े बक्सों में रखने का मन बना लिया होगा. रातें ठीक हैं. ठंडी हैं. दिन थोड़े बड़े होने लगे हैं. छह बजे के बाद भी उजाला रहने लगा है. मैं इन परिवर्तनों को कहने वाला कोई ठीक व्यक्ति नहीं हूँ. फिर भी लिखने की आदत है, कहाँ जायेगी? यहीं है.

कभी-कभी तो मन करता है, भाग जाओ. कहाँ जाना है, नहीं पता. पर ऊब कर कहीं तो जाया ही जाता होगा. देखता हूँ, बाबा अभी भी पूरा दिन कुर्सी पर बैठे रहते हैं. कल थोड़ा पेट खराब लगा तो रात का खाना नहीं खाया. छोटे भाई ने एक वृद्ध व्यक्ति को देखकर नमस्ते कहा. बाद में बताया, इनसे हमेशा जय रामजी की कर लेनी चाहिए. काने हैं न. एक आँख से दिखाई देता है. पता नहीं हम कौन से काम पर जा रहे हों और काम बिगड़ जाए. यह अतिरिक्त सावधानी उसे ठीक लगती है. कईयों को लगती होगी.

मुझे कल एक ठेलिया को ढकेलते हुए वापस लाना था. शाम हो चुकी थी. सात बज गए होंगे, सड़क पर गाड़ियाँ बढ़ गयीं थी और उसमें ब्रेक भी नहीं थे. मैं वहीं बड़ी देर तक सोचता रहा कैसे उसे इतनी दूर ले जाऊंगा?

यह 'सड़क' जिसे सब चौराहा कहते हैं, इनकी जिंदगियों में पैसे जितनी ज़रूरी चीज़ बन चुकी है. यहाँ लोग अब आये बिना नहीं रह सकते. हम अपने बचपन में देखते हैं, तब भी तय नहीं कर पाते, यह सड़क कैसे बनी होगी? यहाँ एक गोदाम है. यह शायद भारतीय खाद्य निगम के अंतर्गत आता होगा. इतने सालों में अभी तक किसी ने उसके एक अदद नाम वाले बोर्ड की ज़रूरत महसूस नहीं की है. हम भी बस कयास लगा रहे हैं. हो सकता है, यहाँ इफ़्को के नाम वाली बोरियों को देख कर ऐसा लगने लगा हो. अनाज के ट्रक भी गर्मियों में लोड होते हैं. अपना सामान यहाँ छोड़ जाते हैं.

वह कोई अकेला ही होगा, जो गाँव से चलकर यहाँ आया होगा. जिसने इन ट्रक वालों के लिए चाय बनाने के लिए किसी पेड़ के नीचे अस्थायी दुकान लगायी होगी. ढाबली या गुमटी से निकल कर आज यह पूरा चौराहा बन गया है.

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