खप जाना

एक ही तो ज़िन्दगी है, कहाँ रहकर बितानी है, यह सबसे निर्मम प्रश्न की तरह हम कभी अपने सामने आने नहीं देते. आएगा तब हम परेशान होंगे, कर कुछ नहीं पायेंगे. यह जगह कोई भी हो सकती है. यह कोई नयी बात नहीं है. पुरानी ही बात का तफसरा है. हम अभी यहाँ से चल पड़ेंगे. जैसे-जैसे यह जगह छूटती जायेगी, मन पर इसका असर कम होने लगेगा. कम असल में उनकी स्मृतियाँ होती हैं. उसका ताप कम होता जाता है. नए दिनों में वह पुराने दिन दबते जाते हैं. जैसे सरकारी दफ़्तरों में फ़ाइलों के नीचे मेज़ बाद जाती होगी. वहाँ धूल भी है. सीलन की गंध भी. रौशनी का नाम नहीं है. इतना होने पर भी वहाँ रहने का एहसास सबसे ज़्यादा है.

सब अन्दर से कितने भर गए हैं. कोई है, जो उनकी ज़िन्दगी में शामिल होने आया है. इसी बहाने वह उन दिनों को कुछ और उत्साह से जियेंगे. सबकी आँखें चमकने लगती हैं. सब साथ बैठ जाने को कहते हैं. कहते कुछ नहीं हैं. बस बैठे रहते हैं. मैं भी कुछ नहीं कहता. बस पास बैठा सब देखता रहता हूँ. उनके उन पलों में से कुछ पल मेरी आँखों के सामने बीतने लगते हैं.सब थम सा जाता है.

शायद वह चाहते भी यही होंगे. कोई उनके बाहर हो, जो उनके उन बहते हुए लम्हों का गवाह बने. मैं उन क्षणों में कुछ देर बहता रहूँगा. थोड़ी देर बाद उठने को होता हूँ तो कहते हैं, 'अब्बय जायओ!'. यह सुनकर रुकता नहीं हूँ. बाद में आऊँगा. कहकर उठ जाता हूँ. कुछ कदम बाद, मुड़कर देखता हूँ. उनकी आँखें मुझे जाते हुआ देख रही होती हैं. मैं भी उनकी तरफ़ देख मुस्कुराता हूँ. वह तब कहीं और देखते हुए मुस्कुराते हैं. वह आगे देख नहीं पाते.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आबू रोड, 2007

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

हंस में आना

वापसी

आठवीं सालगिरह