विदा गीत

कोई ख़याल आ जाने के बाद उसका निकलना कैसा है? अभी मेरे मन में कोई बात आही नहीं रही है। उसके निकलने की बात बहुत दूर की कौड़ी है। मैं बस अपने अंदर उन्हीं बातों को दोहरा लेना चाहता हूँ, जो उमड़ती हुई सी हैं। उसकी शादी के बाद हम भी हफ़्ते भर में दिल्ली वापस लौट आए। वह अगला शनिवार रहा होगा, फ़ोन आया। फ़ोन बीती रात भी आया। सोचता रहता, चाचा की वह कौन सी स्मृति होगी जो आख़िरी दृश्य की तरह मेरी आँखों के सामने झिलमिला जाएगी? जून(17) से इसी अंतिम दृश्य को अपने अंदर रचता रहा। यह उन यादों को उधेड़ने जैसा कोई काम भले लगे, यह हम सबके एक साथ बिखरने के दिन रहे। इनमें सबसे पहली याद भले मेरे पास कहीं नहीं थी, आख़िरी की तलाश में मैंने कोई कसर नहीं छोड़ी। पुरानी दिल्ली स्टेशन पर रेल में बैठे हुए खिड़की के पार उन्हें बटन वाले मोबाइल पर कुछ देखते रहने वाला क्षण रहा हो या शताब्दी अस्पताल, लखनऊ की पहली मंजिल पर उन्हें देख भर लेने की इच्छा से दोबारा लौट आना। सबको मैंने अपने अंदर उन्हें आख़िरी बार देखते रहने की तरह ही देखा। क्या पता, कब क्या हो जाये। इसी आशंका में हम डूबते रहते। क्या इसे एक तरह का इंतज़ार कहा जा सकता है? सबको पता है, यह घटना एक दुर्घटना की तरह घटित होगी। तब भी सब उस अनिश्चित को निश्चित मानकर दुश्चिंताओं से घिर गए। सब मानो इसी अंत को अपने भीतर बहुत पहले शुरू होता देख चुके थे। कोई इसके अलावे कुछ कर नहीं पाया।

ख़ुद हमारे लिए इस मृत्यु का आकस्मिक प्रकट हो जाना नहीं रहा। इससे पहले इस शहर में गाँव में हुई मृत्यु इसी तीव्रता के साथ उद्घाटित होती रही थी। इस दूरी में यह शोक किसी बिजली की तरह हमारे अतीत के पन्नों पर गिर जाती थी। इस बार यह कुछ कुछ नानी की ख़राब तबीयत की तरह हमारे अनुभव संसार में प्रवेश पाती है। सब बड़े बूढ़े अचानक विस्मृत होकर अपनी मृत्यु के एक दिन अचानक दिख जाते। चाचा का गायब होना तब शुरू हुआ जब गाँव से लौटकर मयी में भाई ने बताया, चाचा अब पहचान में भी नहीं आ रहे। इतनी सेहत गिर गयी है। देह ढल गयी है। हम जब पहचानते नहीं हैं , या वह जब पहचान में आना बंद हो गए तब दरअसल होता कुछ नहीं हैं। व्यक्ति की वह छवि जिसे हमने अपनी यादों में रखा हुआ है, वह उससे बेमेल हो जाती है। यहाँ से सिर्फ़ एक नए तरह का अपरिचय शुरू होता है। इसी बात को बहुत पहले डायरी में किसी और तरह से लिख जाने के बाद से यह मेरे दिमाग में तब से बनी हुई है। यह मन से चाचा के चले जाने की पहली क्रमिक शुरुवात रही होगी।

चाचा ने बहराइच में अपने बवासीर का ऑपरेशन करवा लिया। यह सब यहीं से शुरू हुआ। छिन छिन पर पीछे भागना पेचीस नहीं था। उनको ऐसी हालत में पहली बार तेईस जून को देखा। तब से अपने मन में न जाने कितनी ही मर्तबा दोहराता रहा, सिर्फ़ छह-आठ महीने बाद चाचा नहीं रहेंगे। मन हुआ बता दूँ। नहीं बताया। उनके घर में सब क्या सोच रहे होंगे। यही सोच चुप रह गया। यह भी कितना अजीब है, मरते हुए व्यक्ति के आस पास जितने भी लोग हैं, उनमें से अधिकांश को पता है, मृत्यु कहीं दरवाज़े के पीछे दबे पाँव खड़ी है। यह न बताना किसी तरह का धोखा देना तो नहीं है? सबको पता है, उसका दिन तय नहीं है। चाचा इस तरह से सोच रहे होंगे, कह नहीं सकता। बस इतना ही दुख सालता जा रहा है, जाने कितने सपने चाचा अपने साथ बिन बताए ले गए। कोई ऐसी तरकीब होती, जिससे हम उनके मन वह सब सपने अपने मन में आ जाते। अभी ऐसा नहीं है, ज़रूरी नहीं है भविष्य भी इसी तरह कल्पनाविहीन हो। हो सकता है, हम उन तरंगों को पढ़ पाएँ, जिनमें यह मन तैरता रहता है।

ऊपर इस फ़ोटो में चाचा का चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा। शायद उनके पीछे प्रकाश अधिक है इसलिए। यह उनके धुंधले होते जाने से कुछ पहले ही ली गयी तस्वीर है। फाल्गुन के बाद वह गायब होना शुरू हो गए। जब बीमारी का नाम उन्हें पता चला, वह भी जान गए कैंसर से कोई नहीं बचा।

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