फ़िज़ूल बात

कुछ बातें कागज़ पर लिखी नहीं जाती हैं। वहाँ नहीं लिखी जाती, इसका मतलब यह नहीं कि यह जगह उसके लिए एकदम माकूल है। नहीं। ऐसा नहीं है। यह चयन हमारा नहीं है। कुछ भावतिरेक ज़रूर होता होगा। तभी लिखा जाना सहज हो पाता है। सहज इस लिहाज़ से कि लगता है, कह देना कितना आसान है। इन दिनों जबकि लगातार गर्मी दिन में बढ़ती जा रही है और समाचार पत्र इन गर्मियों में भीषण गर्मी पड़ने की भविष्यवाणी कर चुके हैं, हम किस तरह इस शहर को, इस शहर में ख़ुद को स्थित करें? यह लिखते हुए पिछले साल आई एक फिल्म में खो जाता हूँ। डैथ इन गंज। वहाँ एक लड़का है। वह डायरी लिखता है। कई सारी बातें उसने वहां लिख रखी हैं। उसने उन पन्नों पर बहुत पहले कभी एक तितली जैसे दिखने वाले कीट को भी दबाकर रख लिया है। अक्सर नींद में ऊँघती दोपहरों में उसे अपनी डायरी की याद आती और अपने सामान से निकाल कर वह उसे छूता। उसने कभी सामने कुछ नहीं लिखा। जब भी वह डायरी के साथ दिखा, वह उसे पलट रहा होता। उन खाली दिनों में रेकॉर्ड पर गाने सुनते लोगों में एकांत इस कदर घुलता होगा। वह तब किसी आक्रांता तकनीक की आहट भी महसूस नहीं कर रहे होंगे। ट्रंक कॉल तक तो डाकघर पर जाकर किया करते थे। पर मैं इस दौर में उस समय को क्यों लिख रहा हूँ, जो कभी हमारे सामने बीता ही नहीं। यह हमारी पैदाइश से भी बहुत साल पहले गुज़र चुका ज़माना रहा होगा। वह कौन होगा, जो पीछे जाने की इच्छा से भर जाएगा? कभी कोई होगा भी? शायद? कोई हो।

कभी-कभी मुझे अपने आप को भी उस अतीत में स्थित करते हुए एक अजीब से बेचैनी होने लगती है। आज यह भाव सिर्फ़ एक दिन, रविवार के कुछ हिस्सों में छिपा रह गया है, जहाँ हम घर से बाहर नहीं जाना चाहते। यही तो दिन है, जब घर हममें कुछ रोम छिद्रों से दाख़िल होने को होता है। पता नहीं, जो इस अनुभूति को महसूस करते हुए या उसके बहुत दूर छिटक जाने के बाद यहाँ टहलते हुए यहाँ आ पहुँचेंगे, वह इन पंक्तियों को किस तरह लेंगे? यह उनके परिवेश को किस तरह उनके सामने खोल रही होगी? जो भी हो, किताबों से घिरी मेज़ के इस अगले सिरे पर लैपटॉप रखकर कोई भी बात बेमानी से ही, सही कुछ तो इस दौर को कह ही रही होगी। अगर कुछ नहीं कह रही होती, तो माफ़ीनामा भेज दिया जाता।

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