अतीत

दूर से यह घर पहली बार इस कदर याद आ रहा है। याद में सिर्फ़ एक दृश्य है। हम नानी के यहाँ, सेवढ़ा जाने के लिए गाँव से निकले हैं और दोपहर होते-होते गिलौला पहुँचे हैं। पापा के बड़े मामा, उसी छुटपन में जिस वक़्त की यह बात है, जिनका नाम हमारे बाबा के नाम जैसा ही था, दिल्ली के आईटीओ से कहीं गुम हो गए। वह दोबारा कभी नहीं मिले। यह घर उन्हीं का है। यहीं कभी हमारी दादी भी रहती होंगी, यह ख़याल आज नींद न आने का कारण बना। अपने अतीत के दिनों में हमने कभी ऐसा नहीं सोचा कि दादी भी अपने पुराने दिनों में यहाँ रही होंगी। बाबा इसी घर बारात लेकर कभी बैल गाड़ी पर आए होंगे। तब भी यह घर ऐसा ही रहा होगा। मालुम नहीं। हम पहले ऐसा क्यों नहीं सोच सके, यह अलग बात है। जिस बात से अचानक उठकर बैठ गया था, वह सिर्फ़ इतनी भर है कि लेटे-लेटे यह हिसाब ही नहीं लगा सका, कितने साल पहले उस अंधेरी गली में से होते हुए हम अंदर दाख़िल हुए होंगे। कोई गिनती काम नहीं आई।

गिलौला हमारी स्मृतियों में ऐसी ही लंबी, संकरी, अंधेरी गलियों वाली जगह थी। हम मम्मी पापा के साथ जिस भी घर जाते, वहाँ ऐसी ही गलियाँ मिलती। उन गलियों से एक-एक कर कई सारे डिब्बानुमा कमरे निकल आने की सहूलियत रहती, और किसी ख़ास नक़्शे के बिना भी मकान बनवाने का काम चलाया जा सकता था। दरअसल यहाँ सब घर एक दूसरे की नकल ही कहे जा सकते हैं। हम इन नकलची घरों में एक साथ दाख़िल नहीं होते। हम सबसे पहले यहीं आते। गली से सटे कमरों में मसालों और सरसों के तेल की गंध एक साथ नाक में घुसती। उसमें भी एक अजीब किस्म का सम्मोहन था। यह गंध दुनिया में हमें सिर्फ़ वहीं मिलती। हम साल भर बाद वहाँ आते। पर आते ही उस तैरती ख़ुशबू को पहचान जाते। यह वही है। इसमें चूहों की लेड़ीयाँ भी मिली हुई हैं। पेशाब सूख रहा है। कहीं चिपचिपा सा तरल पदार्थ रौशनी में जुगनू की तरह चमक उठता और हमारे आगे बढ़ते ही खो जाता। हवा में एक भारीपन है। वह उस गंध को इत्र की तरह कहीं ले नहीं जा पा रहा। जिसे सूंघना है, हमारी तरह दिल्ली से वहाँ जाये और सूंघे ।

यही वह पहली जगह थी जहाँ हमने पंखे देखे थे । वह बत्ती आने पर चलते भी थे । उसी में एक दुपहरी हम जीप से उतरकर असोक चाचा के यहाँ चल रहे हैं । तब घर बड़की मामी के नाम से जाना जाता था। आर्थिक हैसियत एक तरह की अकड़ भी अंदर ले आती है, इसे वह दिखाते नहीं थे वह सहसा दिख जाती थी। बात करने के लहज़े में, काम करने के तरीकों में और भी जिन-जिन माध्यमों से वह प्रकट हो सकती थी। यह घर भी उसी का एक स्मारक भर था। तो, उस बड़ी सी सुरंग से गुजरने के बाद जहाँ खत्म होती थी, एक अहाता आता और उसके दायीं तरफ़ सीढ़ियाँ थी।  सामने नल लगा हुआ है। यहीं बैठका रहा होगा। उस नल के पास अंगूर की बेल थी। जिसमें हमारे वहाँ होते कभी अंगूर आते नहीं देखे। नल के बिलकुल ऊपर छत को तोड़कर कभी किसी जमाने में जाल लगवाया गया होगा। या शायद वह हिस्सा ही बाद में कभी बना होगा। अभी ठीक-ठीक याद नहीं आ रहा। पूछना पड़ेगा। पापा को तो पता ही होगा या कभी कमला चाचा किसी शनिवार आए तब पूछसका तो उनसे ही पता कर लूँगा।

तो आज दोपहर बस उस गँधाती गली में पीली बल्ब की रौशनी में किराने की थोक दुकान का माल देखते हुए आगे बढ़ते जाने के बाद जिस जगह पर हम बैठते थे, जहाँ वह बिजली से चलने वाला पंखा लगा हुआ है, जिसे ऊपर अहाता जैसा कुछ कह आया हूँ, यह जगह बिजली की तरह आँखों के सामने कौंध गयी। सच मेरे पास कोई हिसाब नहीं है, हम कब आखिरी बार इस अनुभव से गुजरे थे। यह तस्वीर इसी फरवरी की है। तब भी अंदर जाकर नहीं आया। अंदर जाकर इस जगह को बस एक नज़र देखना भर था। हम कैसे उस जगह पर सिमटे बैठे हुए हैं। सब हमें घूरते हुए देख रहे हैं। हम बस इस ख़याल से भरे रहते,  कब हम नानी के यहाँ चल पड़ेंगे, इस इंतज़ार में कब उस छत के नीचे नींद आ जाती, याद भी नहीं रहा।

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