इंतज़ार

बहुत सी ऐसी बातें होंगी जो मेरे अख़्तियार में नहीं होंगी। तब अगर हम इंतज़ार कर रहे हैं, तो इसका सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही मतलब है। वह हमारी जद से बाहर है। कुछ ऐसा है, जिसमें यह इंतज़ार सिमटा हुआ है। मैं लगभग साल से भी ज़्यादा वक़्त से एक जवाब का इंतज़ार कर रहा हूँ। उन्होंने कहा, वह बताएँगे। अभी तक नहीं बता पाये हैं, तब उनकी भी कुछ वजहें होंगी। एक बिन्दु ऐसा आएगा, जब उन्हें भेजी चिट्ठी का मज़मून भूल चुका होऊंगा। तब भी एक छोटी सी आस कहीं होगी। वह पढ़ लेंगे, तब बताएँगे। इस इंतज़ार को धैर्य जैसे मूल्य से जोड़ने में एक पदानुक्रम है, जिस वजह से इसे किसी भी तरह मूल्य कहने नहीं जा रहा। मैं इसे इंतज़ार के अलावे कह भी क्या सकता हूँ। कभी सोचता हूँ, वह न जाने कब उन पढ़ी हुई पंक्तियों पर कुछ कहने की इच्छा से भर आएंगे? कई दफ़े याद दिलाना पड़ता है, कभी कुछ भेजा था। इंतज़ार तभी आसान होता है, जब वह फसल के इंतज़ार जैसा हो। इस दुनिया में, जिसमें हम जी रहे हैं, यह निश्चित ही अनिश्चित होता जा रहा है। कोई कुछ भी कहे जाने से पहले ही देख लेना चाहता है, वह जो कहने जा रहा है, वह कितनी पुख्ता है। अगर उसमें ज़रा भी दीमक लगी हुई हो, वह नहीं कहते। मैं इस निश्चित में अनिश्चय की स्थिति में ख़ुद को स्थित करते हुए महसूस करता हूँ, इन कयासों को कहते, बुझते हुए सब किस कदर उलझ जाता है। कोई इसमें उलझना नहीं चाहता। उलझने पर वह इंतज़ार की तरह नहीं जुगुप्सा की तरह बन जाती है। जैसे लग रहा है, जहां से यह शुरू हुई थी, इस एकांत में वह न जाने कहाँ मुड़ गयी। 

पता नहीं मेरे मन में चाचा कहाँ से आ गए ? चाचा दरअसल यही कर गए। उन्हें यह एहसास बहुत पहले हो गया, जिसमें एक दिन वह ख़ुद को समेटते हुए यहाँ से चले जाने की तय्यारी पूरी करने लगे। इन सबके बीच उनका विदा गीत लिखने की इच्छा अभी भी मेरे अंदर इंतज़ार कर रही है। चाहता नहीं था, बात ऐसे बिखर जाये। पर क्या करूँ, लगतार लगता रहा चाचा के अंदर सब ख़त्म होते ही उनका इंतज़ार भी ख़त्म हो गया।

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