दोहराव

ऐसा नहीं है जो मन में चल रहा हो, हम उसी वक़्त उसे लिखने के हिमायती हों। कुछ उन क्षणों के बीत जाने के बाद कहना सही लगता हो। न कहना, न कह पाना सिर्फ इच्छा या अनिच्छा के बीच तैरता युग्म नहीं है। कोई जो कभी नहीं कहेगा, उस तक हम कैसे पहुँचेंगे, क्या कभी हम इस तरह सोचते हैं? हो सकता है, हमें जिस तरह लगता रहा है, हम उसी दायरे में कहे जाने को समझते हों। यह भी हो सकता है, जिसे हम अपने सामने पाकर, कहना या न कहना समझ रहे हों, वह उस रूप में लग भले रहा हो, पर वह वैसा ही हो या तय नहीं है। प्रेम हमें इस तरह की असीम संभावनाओं की तरफ़ ले जाने में सक्षम है। शास्त्रीय रूप में वह हमें इस तरह का अभ्यास करवाता आया है। पहली नज़र में होने वाला प्यार अक्सर किसी कागज पर लिखे हुए शब्दों को पढ़ने से संभव हुआ हो ऐसा नहीं है। ऐसा भी नहीं है कि उन पूंजीवादी या पितृसत्तात्मक मानकों पर खरे उतरने के हम किसी की तरफ़ आकर्षित हुए हों। बहरहाल, यह भी एक रूढ़िवादी वाक्य ही है कि देख कर ही प्यार होगा। देखना इस रूप में निर्दोष नहीं है। सिर्फ़ देख भर लेने में ऐसा क्या है, जिससे असल में कोई पक्ष वास्तव में अपने मानकों पर तुरंत कस लेता है? यह ध्यान में रखने वाली बात होगी। फ़िर ऊपर बात हो रही थी, ख़ुद को कहने या न कहने की इच्छा को उसी अर्थ में समझा जाये या हमें कुछ नया गढ़ना होगा, जिससे जो अभी तक अज्ञात है, वह भी ज्ञात हो सके। क्या हमारी रुचि इस ओर है?

वैसे भी इन दिनों लगातार मेरे अंदर कहने, सुनने, ख़ुद को प्रकट करने के माध्यम के रूप में शब्दों या अन्य कलारूपों पर सोचते हुए इसी बात पर दोबारा आ जाता हूँ कि शब्द इसलिए भी जल्दी रूढ़िग्रस्त हो गए होंगे क्योंकि इनके अर्थों या उनकी व्याप्ति भी उतनी ही रूढ़िवादी है। मेरे कहने का सिर्फ़ और सिर्फ़ इतना मतलब है, यहाँ जो शब्दों से कहा जा रहा है, उसमें कल्पना, भ्रम, अस्पष्टता या स्पष्टता उतनी ही है, जितना हमारे शब्दकोशों ने उन शब्दों को अर्थों से भर दिया है। हम उन बिंबों, स्वप्नों, रूपकों को उतने भर से समझ लेने के लिए बाध्य हैं। हो सकता है, मेरा सीमित अनुभव में मुझे ऐसा दिख रहा हो और आपके अनुभवों में अभी यह स्थिति न आई हो। लेकिन यह शाब्दिक अर्थ व्याप्तियाँ इसलिए अधिक प्रचलन में हैं क्योंकि हम जानते हैं। हम जिन युक्तियों से इन्हें कह रहे हैं या जिनकी सहायताओं से हम अपनी बात को दूसरी तरफ़ भेज रहे हैं, वह सामने वाला समझ जाएगा। क्या इसलिए हम ने एक लिपि और अक्षरों को इसलिए सीखा होगा कि हम अस्पष्टताओं में भी इतने स्पष्ट या प्रकट हो जाते हैं कि सामने वाले को वह उसी रूप में नज़र आने लगता है। यह भाषा की अपनी ताकत है या सीमा मुझे नहीं पता पर कभी-कभी इसी से कोफ़्त होने लगती है।

फ़िर जिस बात से मैं शुरू हुआ था, वह सिर्फ़ इतनी सी है कि जैसा रंग, चित्र, रेखाएँ, ध्वनियाँ, अनुभूतियाँ अपने अंदर उन्हें समझने के लिए उतनी ही विविध युक्तियों के प्रयोग से समझ आती हैं, वैसा शब्दों के साथ महसूस क्यों नहीं होता। यह इतने स्थूल, इकहरे, एक रेखीय, और अपने विकास क्रम में इतने अविरुद्ध कैसे होते गए हैं? क्या साहित्य में विधाएँ इसलिए जन्मी होंगी या उनका विभाजन इसी ख़तरे को जानकार हुआ होगा? ऐसा सोचकर एक बार फ़िर से पिछले बने खाँचों में ख़ुद को घसीटे ले जा रहा हूँ। पर यह बात ध्यान देने लायक है, क्या विधाओं के बदलने से भाषिक अभिव्यक्ति का स्वरूप ही नहीं शब्दों की रूढ़ हो चुकी ध्वनियों में परिवर्तन ही नहीं आता बल्कि आस्वाद में भी वह गुणात्मक रूप से बदल जाती हैं? अगर ऐसी बात है, तब इस तक पहुँच जाने के बाद, इसका मेरे लिए व्यक्तिगत रूप से क्या लाभ? मेरे लिए, इस सैद्धांतिक समझ का एक भाषा के प्रयोक्ता और शब्दों को व्यवहार में लाने वाले व्यक्ति के रूप में क्या औचित्य? यह किस तरह मेरी मदद कर सकती हैं? क्या यह चेतावनी में छिपा हुआ वह सरल निर्देश है, जिसे पढ़ने के साथ ही मुझे भी दूसरी विधाओं की तरह बढ़ जाना चाहिए और देखना चाहिए वहाँ शब्दों के रूढ़ हो जाने के बाद भी क्या संभावनाएं बची हुई हैं या इसे सिर्फ़ गरम मौसम की मेरे दिमाग में पहली आहट मानकर संतोष कर लेना चाहिए?

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