पैमाने

क्या हम अपनी उदासी को किसी तरह माप सकते हैं? या कुछ भी जिसे मन करे? यह दिन कितने पहरों में हमने कभी बाँट लिये होंगे। इसी में कुछ क्षण रहे होंगे, जब हम रौशनी में टटोलने से पहले उन्हें देखने लगते हैं। यह किसी को देर से सोकर देर में उठती हुई सुबह का भान भी करा सकता है। कुछ इसमें थकी हुई उस औरत की अकड़ी हुई पीठ भी देख सकते हैं। पीठ पर कोई सिलवट है या कपड़े का कोई निशान? शायद पसीना बने पानी की कोई धार होगी। इस पानी को हम अपनी प्यास से खाली करते रहे हैं। उसका लगना, उसे हमारे अंदर कहीं स्थित करता होगा। यह वैसा ही है, जैसे तकिये को देखकर भी किसी को कोई ख़याल न आया हो। उसकी रुई कहीं कपास बनकर खेत में सूख कर उगी होगी। हम इस पुरानी दुनिया में अभ्यस्त होने की अनकही तय्यारी करने में इतने व्यस्त हैं, कि कुछ भी देख नहीं रहे हैं।

मैं अपने खालीपन को, जो दरअसल इन दोपहरों में लंबी होती परछाईयों से परे मेरे मन में उतरता रहता है, यह उसे इस वक़्त की तुलना में बहुत तेज़ रफ्तार से काटने की गरज से भर आने के बाद, कोई काम न करने के बजाए, ऐसे ही खाली बैठे रहने की तरह है। क्या कोई होगा जो हर चीज़ के लिए ऐसे पैमाने बना पाया होगा? क्या वह हर भाव, क्षण, मनः स्थिति, घटना, अनुभूति, उसके गुज़र जाने के बात पैदा हुई रिक्तता, अतीत, भविष्य, कल्पना, ईर्ष्या, कुंठा, भय, सपनों, गीत, स्वर, जंगल, सड़क, मिट्टी, हवा, स्पर्श सबके लिए वह कुछ न कुछ तय करके गया होगा? उसके हर बीतते दिन में आती शाम और उसे अपने अंदर समा लेती रात ज़रूर कुछ बता जाती होगी। मुझे भी वही सब जानना है। यह कैसे संभव होगा, हम किसी भाषा के सीमित शब्दों में असीमित संभावनाओं को समेट पाएंगे? इनके बजाए अगर वह कुछ युक्तियाँ बता सके, तो बेहतर होगा। शब्दों में एक तरह की रूढ़ि है, जो नए अर्थों तक पहुँचने के रास्तों को ऊबड़ खाबड़ ही नहीं बनती बल्कि उस तक पहुँचने वाली नज़र भी तंग करती जाती है।

हो सकता है, यह पुरानी किसी बात के हवालों की तरफ़ ले जा रही हो, फ़िर भी अभी मैं कुछ और कहने से पहले वह सब जानना चाहता हूँ, जो नहीं जानता। इसमें जानना भले पुराने शब्दों के सहारे से कहा हो पर यह नए तरह से जानने की इच्छा है। यही वह रूढ़िबद्धता है, जिसकी बात ऊपर कर रहा था। कहा उसी पुरानी तरह, जिससे ख़ुद को एहसास हो सके, यह कितनी मुश्किल बात है। मैं ऐसे प्रेम करना चाहता हूँ, जिसे मैं भी ख़ुद न पहचान पाऊँ। जिससे करूँ, वह मुझमें खुलता बंद होता रहे। यह पानी और नदी जैसे होगा शायद। नहीं तो पेड़ और उसकी परछाईं हो। चाहता हूँ, ऐसी ईर्ष्या जिससे करूँ, वह उसे मेरा अनुराग समझे, पर तह में यह भाव किसी कुंठा की तरह मन में बनी हुई गांठ की तरह उसे नज़र ही न आए। इसी में कुछ ऐसे सपनों तक पहुँच जाना चाहता हूँ, जो सामने की तरह नहीं ज़िंदगी के विस्तार की तरह लगें। उनमें रंग बिलकुल गीले हो। उनसे मेरे हाथ रंग जाएँ। शायद अब आप कुछ कुछ उन नए पैमानों की तासीर तक पहुँच पा रहे होंगे और यह भी समझ पा रहे होंगे कि उनकी मुझे ज़रूरत क्यों है।

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