न्यूटन

दो अक्टूबर की शाम सवा छह बजे, अँधेरा होने से कुछ पहले इस झुटपुटे में मुझे न्यूटन का खयाल आ रहा है। मैं सच में किसी फिल्म पर लिखने से बचने लगा हूँ। अक्सर तब, जब उन्हें सिर्फ़ बहाने की तरह इस्तेमाल करने जा रहा होता हूँ। अभी, इस पल भी मेरे मन में न्यूटन नहीं महात्मा गांधी की बात याद आ रही है। मैं कहूँगा नहीं, उन्होंने संसदीय प्रणाली के लिए किन शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उसकी आलोचना की है। जो जानने के इच्छुक होंगे, वह 'हिन्द स्वराज' खरीद कर पढ़ सकते हैं। नवजीवन ट्रस्ट अभी भी उसे बहुत कम कीमत पर छाप रहा है। दूसरी बात, जो यह कह रहे हैं, यह फिल्म अरुंधति रॉय के विचारों का 'विजुवल पिक्चराइजेशन' है, वह भी इसे समझने में थोड़ा पीछे रह गए। यह फिल्म उनसे कितना प्रेरित है, इसे बनाने वाले अमित ही बता पाएंगे। फ़िर जब हम किसी वैचारिक आग्रह से इसे देखना शुरू करते हैं, तब वह विचार ही हमारी कसौटी बन जाएगा, तब उससे आगे जाकर हम देख नहीं पाएंगे। इसलिए थोड़ा सावधानी से बरतते हुए चलना होगा। तब भी हम यह दावा नहीं कर रहे कि हम खुद किसी विचार से प्रेरित नहीं हैं।

बहरहाल, फिल्म नूतन कुमार की है। एक कायदे से चलने वाला व्यक्ति। जो किसी सरकारी महकमे में अभी जल्दी ही क्लर्क नियुक्त हुआ है। लोकसभा चुनाव सिर पर हैं। तय्यारियों की सरगर्मी दिख रही है। चुनाव की ट्रेनिंग में अफ़सर बताते हैं, हर चुनाव में हम अपना पिछला रिकॉर्ड तोड़ देते हैं। हर बार हम सबसे बड़े लोकतन्त्र के रूप में दुनिया के सामने आते हैं। उसे रिज़र्व में रखा गया है। किसी आपातकालीन स्थिति में उसे पीठासीन अधिकारी के रूप में भेजा जा सकता है। यह स्थिति आ भी जाती है। वह तीन लोग एक टीम के रूप में हेलिकॉप्टर से जंगलों के बीचोबीच उतरते हैं। यहाँ से कुछ घंटों दूर सेना का बेस है। रास्ता इतना लंबा है कि शाम रात में बदल जाती है। इस रात के बाद जो सुबह आएगी, तब उन्हें यहाँ से भी चल पड़ना है और छिहत्तर मतदाताओं के लिए एक स्कूल में पोलिंग बूथ बनाना है।

ट्रेलर देखकर फिल्म देखने का मन बिलकुल नहीं था। उसे देखते हुए तो यही एहसास भरता गया कि जिस लोकतन्त्र के बीच न चाहते हुए उसकी कितनी ही विसंगतियाँ दिख रही हैं, वहाँ एक और फिल्म आई है, जो इस मत आधारित व्यवस्था का प्रशस्ति गान कर रही है। लोग इसी लोकतन्त्र में डूब रहे थे। उनका सरमाबरदार राष्ट्र के नाम पर बाँध का उद्घाटन कर चुका था। मन जुगुप्सा से भर आया। फ़िर भी एक शाम हम चल पड़े।

न्यूटन जो एक साढ़े सोलह साल की लड़की से शादी करने से मना कर चुका है, वह अब पीठासीन अधिकारी है। उसकी निगरानी में मत डाले जाएँगे। स्कूल सिर्फ़ एक कमरे का है। जहाँ स्कूल है, उस गाँव में अब कोई नहीं रहता है। सब गाँव से निकलकर सब ग्रामीण दूर उनके लिए बनाए गए एक कैंप में रह रहे हैं। वह सेना का अधिकारी इसे 'शांति' कहता है। स्कूल की पीठ वाली दीवार पर सेना के गाँव जलाने के बाद माओवादियों ने लाल स्याही से अपनी बातें लिखी हैं। सामने सरकारी दावा है। सब पढ़े सब बढ़ें। कहीं किसी एक सीन में भी माओवादी नहीं हैं। जैसा अख़बार उन्हें फ़ौजी वर्दी में देखने के आदी हैं, वह यहाँ तो बिलकुल वैसे नहीं दिखाई देते। सिर्फ़ उनका ज़िक्र है। लोग बस ग्रामीण के रूप में सामने आते हैं।

पोलिंग स्टेशन बन चुका है। सब अपनी निर्धारित जगह बैठे हुए हैं। मतदाताओं का इंतज़ार हो रहा है। लेकिन कोई आएगा नहीं। माओवादियों ने चुनावों के बहिष्कार करने का ऐलान किया है। यहीं तक हमारी नगरीय समझ साथ देती है। यह पहले ही वह सेना अधिकारी बता चुका है। उसके बाद जो होता है, वह इसे एक विद्रुप रचते कथानक में तब्दील कर देती है। एक ऐसी कथा जो हमारे सामने कभी घटित नहीं हुई।

मैं यह सब लिखकर क्या कर रहा हूँ? मुझे इस कहानी को नहीं कहना। मैं सिर्फ़ उस न्यूटन के अहंकार को रेखांकित करना चाहता हूँ, जो अपनी ईमानदारी को घमंड की तरह ओढ़े हुए है। फिल्म के पाँच मिनट में ही एक वरिष्ठ अधिकारी उसे कह चुके हैं, ऐसा करना ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। यह ईमानदारी से काम करना ही इस व्यवस्था की उससे एकमात्र अपेक्षा है। अगर सब ऐसा करने लग जाएँ, तो कोई समस्या समस्या ही नहीं रह जाएगी। मुझे उसका यह भाव ही सबसे ज़्यादा खटक जाता है। उसे पता है, वह सही है। कितना सही है, इसका मूल्यांकन उसने कभी नहीं किया है। हम भी नहीं करते। वह उन रेवड़ों की तरह बटोर कर लाये गए गाँव वालों को इकट्ठा करके इस चुनाव में वोट डालने का महत्त्व बता रहा है। कहता है, इस वोट से विकास आएगा। उनके बच्चों के एक हाथ में मोबाइल और उसरे हाथ में लैपटॉप होगा।

उसकी विकास की समझ बस इसी नज़र तक जाती है। यह हमारे शहरों की परिभाषा में सिमट कर रह गया है। वह जब कहता है, इस वोट से उनका नेता दिल्ली जाएगा, तब ग्रामीण उस बुजुर्ग को आगे कर देते हैं, जो उस छोटे से समूह में सबसे उम्र दराज़ हैं और उनके नेता हैं। इसका कोई जवाब उस न्यूटन के पास नहीं हैं। हमारे पास भी नहीं हैं। सत्ता विकेन्द्रीकरण जैसे राजनीतिक विज्ञान के पारिभाषिक शब्द भी इसे नहीं समझा सकते ।

फ़िर वह किस बात का न्यूटन हैं? सिर्फ़ नाम बदलने से क्या होगा? उसने ऐसा क्या खोज लिया, जिससे हम उसे ऐसा व्यक्ति मान लें, जो हमसे अलग नज़र रखता है? शायद उसका अलग नज़र न रख पाना ही उसे न्यूटन बना रहा हो। कभी-कभी हम अलग होने के आग्रह में वह भी नहीं करते, जो हमें करना चाहिए। वह समय पर दफ़्तर आता है। उसे पुरस्कृत किया जाता है। उसका वक़्त पर आना ही उस कार्यालय में सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है। इस तरह वह सिर्फ़ अपना काम कर रहा है। वह यह करते हुए बड़े चुपके से बड़े से बड़े सत्ताधीश के कान में कह देता है, तुम अपना काम ठीक से नहीं कर रहे। कर रहे होते, तब हम एक विफल राष्ट्र की तरफ़ नहीं बढ़ रहे होते। वह कहता नहीं है, कितनी हत्याओं से हमारा वर्तमान रंग गया है। वह अदना सा कर्मचारी अपने कार्यक्षेत्र में कुछ करने की कोशिश कर रहा है। वह उसका अतिक्रमण नहीं कर रहा। न किसी को करने देता है।

यह साधारण सा दिखने वाला काम भी इस वर्तमान में कितना खतरनाक काम हो गया है, यह फिल्म हमें यही बताती है। इसलिए न्यूटन बनना कोई आसान काम नहीं है। यह आप भी जानते हैं। मैं भी जानता हूँ। इसलिए हम उस तरह बन नहीं पाते। सच बताऊँ, हम बनना ही नहीं चाहते।

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