ईर्ष्या

क्या मेरी असफलताएँ मेरे भीतर ईर्ष्या का निर्माण कर रही है? यह पंक्ति अभी एक मिनट पहले मेरे दिमाग में जुगनू की तरह टिमटिमाती हुई नज़र आई। दरअसल यह पंक्ति कम और एक सवाल ज़्यादा लग रही है। अगले ही पल तुम्हारे साथ न होने वाले इन दिनों में डूबता उबरता कहीं किसी साहिल पर कुछ देर संभलने की गरज से चुपचाप बैठा रहता हूँ। फ़िर लेटे-लेटे यह सवाल भी कौंधा कि घर में सबको देखना चाहिए, इस कमरे में अकेले बैठा मैं सारा दिन क्या करता रहता हूँ? मेरे इस कमरे में बैठे रहने की पूरे दिन की उपलब्धि क्या है? कई सारी बातें एक साथ दिमाग में गुज़र जाने की इच्छा से भर गयी हैं। शायद मेरी भी कुछ अनकही बातों की टोह लेती हुई अंदर कुछ तोड़ रही हैं। टूटने से कुछ नहीं होगा, ऐसा कह नहीं सकता। फ़िर भी इस भाव से भर जाना इसी तरह कर जाता है। इसकी क्या वजह हो सकती है? कोई एक वजह तो होगी। क्या कल जो नतीजा आया है, वही इस का सबसे बड़ा कारण नहीं है? इस बार भी परीक्षा में उस पार नहीं जा पाया। यह जो इस पार रह जाने वाली पीड़ा है, इसमें छटपटाने से कुछ नहीं होगा। इसी सबमें एक दिन ऐसा आएगा, जब मैं उन सबको खारिज कर दूंगा, जिन्होंने उन प्रचलित मानदंडों में सफल होने को ही सबकुछ मान लिया है। पता नहीं, उस सब दोस्तों के लिए मुझे क्या कहना है, जो नौकरी में लगने के बाद नौकरी में लगी हुई लड़कियों को अपने माता-पिता की रजामंदी से अपनी बीवी बनाना चाहते हैं? यह किसी तरह का अवसरवाद कहा भी जा सकता है या नहीं?

यह किस तरह का विचार है। कुछ समझ नहीं आता। वह शायद इस शहर को अपने ढंग से 'मैनेज' करना चाहते होंगे और बीवी की कमाई को अपनी कमाई में मिला लेने की उपलब्धि को एक युक्ति की तरह इस्तमाल करना चाहते होंगे? इसमें गलत क्या है? वह मुझसे तो कहीं बेहतर निर्णय लेकर मेरे सामने खड़े हैं। क्या मुझे ऐसे भावों से भर जाना चाहिए? बिलकुल नहीं। तब? तब मुझे यह समझना चाहिए, वह इस उपभोक्तावादी समय में उन चालाक लोगों में शामिल हैं, जो हमेशा कुछ बेहतर की तलाश में निकले हुए ग्राहक हैं। वह ज़िंदगी को 'सुपर मार्केट' बना लेने की गरज से भर गए हैं। इस पिछली पंक्ति में 'चालक' को 'काईयाँ' लिखना चाहता था। तब नहीं लिखा। अब आप वापस जाकर इस शब्द के साथ उसे दोबारा पढ़ते हुए लौटिए। देखिये, मेरे अंदर चलने वाली नसों में बहता हुआ खून आपको महसूस हो रहा है या नहीं? अगर नहीं हो रहा, तब यह मुझमें और आपमें पाये जाने वाले अंतर को साफ़ दिखा रहा होगा। छू पाना पास आजाने की तरह है। आप अभी मुझे छू भी नहीं पाये हैं। अभी एक दूरी बनी हुई है।

फ़िर मैं ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहता, जिससे मेरे अंदर का यह भाव कहीं छिप जाये या मैं इसे अपनी भाषा की ओट में छिपा ले जाऊँ। मुझे जैसा लग रहा है, वैसा कह देना चाहता हूँ। सच में मुझे ऐसा ही लग रहा है। बेकार, खाली, अनमना सा। मेरी इच्छाएँ क्या उनकी इच्छाओं से कुछ कमतर हैं? या मैंने ही उनके लिए कुछ कम कोशिशें की होंगी? कुछ भी हो सकता है। लेकिन इससे मेरे अंदर जो गुबार भर गया है, उसे बाहर कैसे निकालूँ? अपनी इच्छाओं को अपने से अलग कोई भी नहीं देख सकता। उनका अस्तित्व ही हमें बनाता है। तब इसी क्षण मुझे लगता है, यह जो एक खास तरह से ज़िंदगी जीना है, उसके लिए जिस साधन के लिए मैं अभी भी अपने आप को खाली पाता हूँ। उसका अनुवाद अगर पैसे में कर दिया जाये, तब मुझे लगता है, यह ऊपर कही बातें कितनी खोखली है। यह मेरे अंदर किसी तरह से भविष्य को नहीं अपने वर्तमान को अपने लिए गढ़ने की सिर्फ़ एक छोटी सी इच्छा है। मैं तुम्हारे साथ यह दिन, जिनमें तुम्हारे न होने का भाव, मुझमें दुख की तरह उतरता लगता है, उसका कसैलापन कुछ कम ज़रूर होता। अकेले में बैठा आदमी एकांत से भरा हुआ है। यह उन लोगों को कभी समझ नहीं आएगा। जिसके लिए सब कहाँ भाग रहे हैं, वह मेरे भीतर है। मैंने कहा न, मेरे अंदर सिर्फ़ एक इच्छा है। यह इच्छा तिलचिट्टे की तरह कभी नहीं मरेगी। लेकिन इनका दीमक बन जाना भी ठीक नहीं है।

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