राकेश २०११

पता नहीं कबसे तुम्हारी तरह होना चाहता हूँ, पर सचमें हो नहीं पाता. तुम दिल्ली से गए तो पर दिल में और गहरे बैठ गए. यह जो तुम्हारी तरह होना है, बहुत अजीब सा है. क्या है तुममें जो ख़ुद में देख पाता? शायद सपनों को देखने की शिद्दत वह बात होगी. कुछ-कुछ जो सोचते हो, उसे उतनी ही साफ़गोई से कह जाने वाले राकेश की तरह कभी नहीं हो पाऊं, पर कोशिश हमेशा करता रहूँगा. पर इसबार तुम मेरी बात मान जाओ. यह जो तुम लिखने से भागते रहते हो, अब थोड़ा थम जाओ. थोड़ा ठहर कर सोचो. लिखने से कुछ भी नहीं टूटेगा. और जो अन्दर टूट रहा है, उसका सामना किये बिना नया कैसे बन सकता है? कभी समझ नहीं पाया.

तुम कभी-कभी मेरी यादों में वही पुराने वाले राकेश की तरह दिख आते हो, तो अच्छा लगता है. मैं भी ख़ुद को पुराने वाले लबादे में पसंद तो क्या ख़ाक करता रहा होऊँगा पर उसे मिस ज़रूर करता हूँ. हमारी दोस्ती उसी पुरानेपन में कई बार जाकर वापस ख़ुद को टटोलती होगी तो कैसा लगता होगा? पता नहीं. तुम्हारा दिल्ली से जाना पता नहीं कैसा कर गया. इतनी बाद तो ऐसा साथी मिला था, जिससे अपने मन की कोई भी बात कह सकता था.

तब से तुम्हें देख रहा हूँ. अन्दर सिमटते हुए. मैं भी इधर तुम्हारी तरह होता गया. कुछ कछुए की तरह. कुछ घोंघे की तरह. पर मैं लिख देता, तुम कुछ नहीं कहते. कैसे चला लेते हो, यह न कहना? इस सालगिरह पर थोड़ा लिखने लगोगे तो हम भी कुछ बेहतरीन हिस्से पढ़ लेंगे. सोचना. मिनट भर ही सही, पर सोचना. और तब बिन सोचे लिखना. 

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