डूबना

कभी किसने सोचा होगा कि वह डूब जायेगा. किसी ने भी नहीं. उन लोगों ने भी नहीं, जो एक दिन हमेशा के लिए डूब जायेंगे. उन्हें नदी नहीं डुबो रही. उसका पानी डुबो रहा है. इन दोनों में जो फ़र्क है वही हमें बताएगा, हम किस तरफ़ है. यहाँ ज़रूरी है, हमारा उनकी तरफ़ हो जाना. पर उनकी तरफ़ हो पाना इतना आसान नहीं है. एक दिन हम सबको यह सवाल ख़ुद से पूछना होगा. जब वह सब डूब रहे थे, हम किन ख्यालों में ख़ुद को रच रहे थे? हमने उनके साथ अपना भविष्य क्यों साझा नहीं किया? वह क्यों किसी हार जाने वाली लड़ाई में ख़ुद को हारा हुआ देखने के लिए लड़ रहे थे?

तब वह हमें बताएँगे, हर लड़ाई जीतने के लिए नहीं होती. किसी-किसी में हारा भी जाता है. जब इन काली रातों में उनकी यादें हमेशा के लिए जलमग्न हो रही होंगी, हम ऐसे ही किसी बांध से आ रही बिजली से चलने वाले उपकरणों के साए में चैन की नींद सो रहे होंगे. हमें उन अनदेखे अनजाने लोगों की डूबती जिंदगियों से कोई फ़र्क नहीं पड़ता. उनके स्मृति कोशों में उन जगहों की कोई याद भी उस इकठ्ठा हो रहे जलाशय में दिख नहीं पाएगी. सब एक दिन हमेशा के लिए डूब जायेगा. कैसा होता होगा उस ज़मीन को हमेशा के लिए छोड़ कर चले आना? उन डूबती जगहों में बचपन की यादों से किसी हिस्से को कुछ अपने साथ भी ले आने के लिए वह क्या कर रहे होंगे?

शायद वह कुछ सोच भी नहीं पा रहे होंगे. बदहवास से उन जगहों के डूबने से पहले ख़ुद उन यादों में डूबते जा रहे होंगे. तारों में झिलमिलाती रौशनियों के अक्स देखने की आदत उन्हें बदलनी होगी. उन्हे अब उस जगह से हटना होगा. हटकर उन जड़ों को सूखने से बचने के लिए एक और नदी तलाशनी होगी. तलाशनी होगी नयी ज़मीन.

पर सच कभी-कभी सोचता हूँ, यह नदियाँ भी बिलकुल गलत जगह से बहती हैं. कैसा हो, अगर इस बार उनकी बनायीं नदी हमें न दिखे. अच्छा है न दिखे. अगर दिख जायेगी, तब हम उन्हें उस जगह से भी खदेड़ देंगे.

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