बारिश

रात से बारिश हो रही है. बारिश. पता नहीं सूरज के सामने भाप बनते हुए नदियों की बूँदें क्या सोच रही होंगी. शायद अपनी नदी में वापस जाने की सोचते-सोचते सो गयी होंगी. सोना, सपनों में खो जाना है. उन्होंने सपनों में मुझे देखा होगा. हम सबको देखा होगा. हम सब भी कभी बूँद थे. छोटी-सी बूँद. यह बूँद हमारे पुरखों को भी उतना ही जानती है, जितना हमें. शायद हमसे भी जादा जानती होंगी. वह तब से हमारे साथ बरतते हुए आ रही हैं. आसमान से गिरती यह बूँदें हरबार कई चीज़ें टूटने से बचा ले जाती हैं. हो सकता है, ऐसा सिर्फ़ मुझे लगता हो. पर यह लगना मेरे लिए ज़रूरी है. शक्ल से भले कैसा भी लगता रहूँ, पर संभावनाओं को बचाए रखने के लिए मुझे इनकी ज़रूरत पड़ती है. इन बूँदों की ठंडक मौसम में घुलने के साथ उम्मीदों को जिंदा रखती है, जो भीगने के बाद साँसों में तैरने लगती हैं. इतना सोचते हुए एक पल बाद महसूस होता है कि बारिश किसी की ज़रूरत नहीं है. वह किसी के चाहने पर नहीं होती. वह सिर्फ़ होती है. ज़रूरत किसे लग रही है, किसे नहीं लग रही है, यह सब हमारी बनायीं सामजिक, मानसिक संरचनाओं से जादा कुछ नहीं है. उसका होना, उसके होने के लिए ज़रूरी है. वह सिर्फ़ नदियों को उनकी बूँदें वापस करने आती है. इस मिट्टी में घुलने आती है.

लेकिन जब यहाँ लिख रहा होता हूँ, तब, उन बने बनाये खाँचों में इन बरसती बूँदों को रख लेता हूँ. सोचता हूँ, तुम्हारे साथ इस बारिश को यहीं खिड़की के दोनों तरफ़ से देख सकूँ. तुम्हारे भीगे कपड़े नहीं देखना चाहता, तुम्हें साथ देखना चाहता हूँ. इस बारिश ने फ़िर मुझे थोड़ी देर के लिए बचा लिया है. पर इस तरह बिगड़ गए मन को और संभाल पाना इन बूँदों के बस के बाहर की बात है. इधर लगने लगा है, ऐसी बातें फ़िर करने लगा हूँ, जो किसी की समझ में नहीं आती. किसी की क्या ख़ुद मेरी समझ में नहीं आती. पर क्या करूँ? बताओ तो.

सोचता था, बारिश एक बहाना होगी. किन्हीं पुरानी यादों में जाने का चोर दरवाज़ा होगी. पर यह कोशिश भी आज काम नहीं कर रही. नहीं चाहता कि ऐसा लिखूं. पर अनमने ही सही, जो रात से चल रहा है, उसे कहने को बैठ गया. पता नहीं हमारी, हम दोनों की बारिश की पहली याद कब बनेगी? उस याद के इंतजार में यह बारिश भी चली गयी.

{अभी भी बारिश हो रही है और तुम पास नहीं हो. तब इससे ख़राब और क्या लिख सकता हूँ..}

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